बांग्लादेश और चीन तीस्ता नदी प्रबंधन पर सहमत, भारत के लिए नई कूटनीतिक चुनौती

बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की बीजिंग यात्रा के दौरान बांग्लादेश और चीन तीस्ता तथा अन्य नदियों के प्रबंधन में सहयोग बढ़ाने पर सहमत हुए हैं. चीनी जल संसाधन मंत्री ली गुओयिंग के साथ हुई बैठक में पीएम रहमान ने बांग्लादेश में बाढ़ नियंत्रण, पर्यावरण संरक्षण, नदी तट के कटाव को रोकने, सिंचाई प्रणालियों में सुधार और अंतर्देशीय जल नौपरिवहन के लिए चीन से तकनीकी सहायता मांगी.  जवाब में, चीनी मंत्री ने पूर्ण सहयोग का आश्वासन देते हुए दोनों देशों के बीच 2005 के समझौता ज्ञापन (एमओयू) का हवाला दिया और बांग्लादेशी विशेषज्ञों को चीन में प्रशिक्षण के लिए आमंत्रित किया.

भारत के लिए रणनीतिक और कूटनीतिक संवेदनशीलता: तीस्ता नदी परियोजना भारत और बांग्लादेश के संबंधों में एक अत्यंत संवेदनशील और रणनीतिक मुद्दा है. तीस्ता नदी पूर्वी हिमालय से निकलकर सिक्किम और पश्चिम बंगाल से होते हुए बांग्लादेश में प्रवेश करती है, जहाँ यह लाखों लोगों की आजीविका का आधार है. चीन इस क्षेत्र में 'तीस्ता नदी व्यापक प्रबंधन और बहाली परियोजना' को विकसित करने में लंबे समय से गहरी रुचि दिखा रहा है.

‘पीटीआई’ के अनुसार, भारत के लिए चिंता की बात यह है कि यह परियोजना भारत के अत्यंत संवेदनशील सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के करीब स्थित है, जो मुख्य भूभाग को पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ता है. इस क्षेत्र में चीनी पैठ को रोकने और सीमा पार नदी प्रबंधन को मजबूत करने के उद्देश्य से भारत ने भी 2024 में तीस्ता बेसिन के लिए तकनीकी और संरक्षण सहायता की पेशकश की थी.

बहरहाल, बांग्लादेश में मुहम्मद युनुस की अंतरिम सरकार के बाद सत्ता में आई रहमान सरकार के तहत भारत-ढाका संबंधों में सुधार तो दिखा है, लेकिन बांग्लादेश का तीस्ता परियोजना के लिए चीन की ओर हाथ बढ़ाना नई दिल्ली के लिए एक नई कूटनीतिक चुनौती है. यह मुद्दा इसलिए भी गंभीर है क्योंकि शुष्क मौसम में पानी के बंटवारे को लेकर 1996 में हुई 30 वर्षीय 'भारत-बांग्लादेश गंगा जल संधि' भी इसी वर्ष समाप्त हो रही है.

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