एशिया में भारतीय मुद्रा का सबसे खराब प्रदर्शन, निचले स्तर पर बना हुआ है भारतीय रुपया

वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और दुनिया भर में बॉन्ड यील्ड (प्रतिफल) में उछाल के कारण स्थानीय संपत्तियों पर दबाव बढ़ा है, जिससे भारतीय रुपया इस तिमाही और पिछले 30 दिनों में एशिया में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में शामिल रहा.

भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा लगातार किए गए हस्तक्षेपों के कारण मुद्रा बड़े नुकसान से बचने में काफी हद तक सफल रही, फिर भी इस महीने इसमें 0.7% और जुलाई-सितंबर तिमाही में 1.2% की गिरावट दर्ज की गई. बुधवार को यह डॉलर के मुकाबले 95.83 पर बंद हुआ, जो पिछले सत्र के 95.98 के स्तर से थोड़ा सुधार दर्शाता है. दक्षिण एशियाई मुद्रा ने एक उथल-पुथल भरी तिमाही का सामना किया, जिसमें अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते-घटते तनाव के कारण बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें $70 प्रति बैरल से लगभग $110 के बीच झूलती रहीं.

मध्य पूर्व में सात महीनों से जारी संघर्ष ने वैश्विक स्तर पर मुद्रास्फीति (महंगाई) की चिंताओं को भी बढ़ा दिया है, जिसने विकसित बाजारों की सरकारी वित्तीय स्थिति की चिंताओं के साथ मिलकर बॉन्ड यील्ड को बहु-वर्षीय उच्च स्तर पर पहुँचा दिया, जिससे उभरते बाजारों की संपत्तियों को नुकसान पहुँचा.

जसप्रीत कालरा के अनुसार, भारतीय शेयर बाजार का प्रदर्शन भी क्षेत्रीय स्तर पर कमजोर रहा, क्योंकि विदेशी निवेशकों ने ऐसे बाजार से दूरी बनाए रखी जहाँ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) से जुड़े स्पष्ट अवसर नहीं हैं. भारत का प्रमुख शेयर सूचकांक 5% गिर गया, जबकि एमएससीआई का क्षेत्रीय शेयरों का सूचकांक लगभग 1% मजबूत हुआ.

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