भारत में इलेक्ट्रिक वाहन हर सड़क के लिए उपयुक्त नहीं, बहु-ईंधन परिवहन रणनीति की आवश्यकता

द एनर्जी एंड रिसोर्सेस इंस्टीट्यूट (टीईआरआई) और पेट्रोलियम एंड नेचुरल गैस रेगुलेटरी बोर्ड (पीएनजीआरबी) की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सड़क परिवहन को कार्बन-मुक्त बनाने के लिए एक समान नहीं, बल्कि बहु-ईंधन (मल्टी फ्यूल) रणनीति अपनानी होगी.

‘पीटीआई’ के मुताबिक, छह प्रमुख वाहन श्रेणियों और 10 शहरों के विश्लेषण के बाद रिपोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई भी एकल ईंधन तकनीकी, आर्थिक और पर्यावरणीय मापदंडों पर पूरी तरह खरा नहीं उतरता. इसलिए वाहनों के उपयोग और क्षेत्र के हिसाब से चरणबद्ध बदलाव जरूरी है: दोपहिया व तीन-पहिया: कम परिचालन लागत के कारण लंबी अवधि में विद्युतीकरण (ईवी) सबसे उपयुक्त है. यात्री कारें व हल्के वाणिज्यिक वाहन: वर्तमान में सीएनजी किफायत और उपयोगिता का सबसे व्यावहारिक विकल्प है.  इंफ्रास्ट्रक्चर सुधरने पर ईवी की भूमिका बढ़ेगी. भारी मालवाहक वाहन: लंबी दूरी के परिवहन के लिए एलएनजी और क्षेत्रीय माल ढुलाई के लिए सीएनजी अधिक कारगर है, जबकि भारी इलेक्ट्रिक ट्रकों में बैटरी के वजन के कारण पेलोड क्षमता घटने जैसी सीमाएँ हैं.

टीईआरआई की महानिदेशक विभा धवन और पीएमओ सलाहकार तरुण कपूर के अनुसार, भारत की परिवहन संबंधी जरूरतें बेहद विविध हैं. ऐसे में 'सबके लिए एक ही समाधान' लागू नहीं हो सकता.

प्रमुख चुनौतियाँ                       

बुनियादी ढाँचा: ईवी चार्जिंग में लगने वाला समय और असमान चार्जिंग नेटवर्क बड़ी बाधा हैं.

पर्यावरण व ऊर्जा सुरक्षा: वर्तमान बिजली उत्पादन ढाँचे में सीएनजी का जीवन-चक्र प्रभाव ईवी से कम है. इसके अलावा, ईवी को तेजी से अपनाने पर कच्चे तेल पर निर्भरता तो घटेगी, लेकिन लिथियम जैसे महत्वपूर्ण खनिजों के आयात पर निर्भरता बढ़ जाएगी.

अध्ययन कहता है कि भारत के 2070 तक 'नेट-जीरो' लक्ष्य को पाने के लिए लास्ट-माइल मोबिलिटी में ईवी, लंबी दूरी के गलियारों में एलएनजी और व्यापक स्तर पर सीएनजी व संपीड़ित बायोगैस (सीबीजी) के संतुलित उपयोग की आवश्यकता है.

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