कुंभ में चरम पर पहुंची लूट, चंपत राय को पहले से पता था — मगर एफ़आईआर नहीं हुई

राम मंदिर दान चोरी मामले में अयोध्या पुलिस की जांच ने एक अहम मोड़ ले लिया है. द इंडिया केबल की रिपोर्ट के मुताबिक़ जांच में पता चला है कि चंदे की कथित हेराफेरी 2025 की शुरुआत में कुंभ मेले के दौरान अपने चरम पर पहुंची, जब मंदिर में चढ़ावे की बाढ़ आ गई थी. जो कुंभ से पहले छोटी-मोटी चोरी के तौर पर शुरू हुआ, वह दान बरसते ही एक बड़े और संगठित ऑपरेशन में तब्दील हो गया. इंडिया केबल ने इस मामले में कई खबरों को ट्रैक कर ये सार बनाया है.  

जांचकर्ताओं का मानना है कि साले-बहनोई की जोड़ी — लवकुश मिश्रा और अनुकल्प मिश्रा — ने सबसे बड़ा हिस्सा चुराया. पुलिस के अनुसार दोनों ने चोरी के पैसों से संपत्तियां ख़रीदीं और अब तक आधा दर्जन से ज़्यादा संपत्तियों का पता लगाया जा चुका है. जांच के दायरे में भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के कुछ कर्मचारी भी आ गए हैं.

लेकिन घोटाला सिर्फ़ आरोपियों तक सीमित नहीं है. श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने जांचकर्ताओं को बताया है कि चंदे की चोरी की जानकारी उन्हें ख़बर सार्वजनिक होने से पहले ही थी. और जो बात भव्य मंदिर परियोजना के संरक्षक दबाए रखना चाहेंगे, वह यह है कि इस कथित खुलासे के बाद तुरंत कोई एफ़आईआर दर्ज नहीं कराई गई. द टेलीग्राफ़ से राय ने कहा, "मुझे मई के आख़िर में चोरी का पता चला और मैंने तुरंत आंतरिक जांच शुरू कर दी. चोरी में शामिल लोगों को परोक्ष रूप से वॉल्ट रूम से दूर रहने को कहा गया, बिना उन्हें यह एहसास कराए कि हमें उनकी गतिविधियों की जानकारी है." यानी ट्रस्ट को पता था — या कम से कम राय कहते हैं कि उन्हें पता था — मगर पुलिस को फ़ौरन नहीं बुलाया गया.

चंदा गबन के आरोपी लोग नक़दी गिनने जैसी संवेदनशील भूमिकाओं में कैसे पहुंचे, इस सवाल पर राय ने अकेले जवाबदेही लेने से पल्ला झाड़ लिया है. डेक्कन हेराल्ड के मुताबिक़ उन्होंने एसआईटी को बताया कि नियुक्तियां उनका व्यक्तिगत फ़ैसला नहीं थीं और ट्रस्ट के दूसरे सदस्य भी उनमें शामिल थे. जवाबदेही, ग़ायब हुए चंदे की तरह, बंट गई लगती है — और बड़े सवाल खड़े हैं कि राम मंदिर की दान व्यवस्था कैसे चलाई जा रही थी, उस तक पहुंच किसके नियंत्रण में थी और 'संस्थागत' निगरानी की ज़िम्मेदारी आख़िर किसकी थी.

भाजपा शासित उत्तर प्रदेश सरकार ने अब एसआईटी को 15 दिन का विस्तार दे दिया है. इस बीच राम मंदिर के रेडियो मेंटेनेंस अधिकारी अर्जुन देव को पद से हटाकर गोरखपुर भेज दिया गया है. देव की मुख्य ज़िम्मेदारियों में मंदिर के विशाल सीसीटीवी कैमरा नेटवर्क और वायरलेस संचार व्यवस्था की निगरानी शामिल थी — दोनों अब जांच के घेरे में हैं, ताकि पता चल सके कि चोरी इतने लंबे समय तक कैसे चलती रही. ग़ौरतलब है कि राज्य पुलिस के देव इस अचानक तबादले से पहले पिछले 17 वर्षों से लगातार अयोध्या में ही तैनात थे.

भर्ती की पाइपलाइन भी सवालों में है. हिंदुस्तान टाइम्स ने कॉरपोरेट सुरक्षा एजेंसियों और मंदिर ट्रस्ट के बीच एक पेचीदा भर्ती तंत्र का ख़ुलासा किया है. रिपोर्ट के अनुसार दानपेटियों से गबन के आरोप में गिरफ़्तार आठ में से छह लोग वाराणसी की कंपनी सैनिक सिक्योरिटी सर्विसेज़ के पेरोल पर थे, जिसे एसबीआई की नया घाट शाखा ने नक़दी गिनने की प्रक्रिया में मदद के लिए रखा था. यानी अब मामले की कड़ियां ट्रस्ट, एक बैंक शाखा, एक निजी सुरक्षा एजेंसी और मंदिर की अपनी निगरानी व्यवस्था — सबसे होकर गुज़रती हैं.

विश्व हिंदू परिषद ने फ़ैज़ाबाद बार एसोसिएशन के उस प्रस्ताव की आलोचना की है जिसमें वकीलों को आरोपियों की पैरवी करने से रोका गया है. परिषद ने इसे असंवैधानिक और अनैतिक बताया है, हालांकि चंदा चोरी विवाद में वह राय से भी हाथ झाड़ चुकी है. बार ने कथित तौर पर धमकी दी है कि आरोपियों के लिए पेश होने वाले किसी भी वकील पर पांच लाख रुपये का जुर्माना लगेगा. इस मामले ने एक पुराना सवाल फिर खोल दिया है — क्या जनाक्रोश सबसे 'दुष्ट' आरोपी के भी निर्भीक बचाव के अधिकार पर भारी पड़ सकता है?

हिंदुत्ववादी संगठन के लिए राम मंदिर में कथित गबन उसके अपने अभियान में एक शर्मिंदा करने वाला 'सेल्फ़ गोल' है — वही अभियान जिसमें हिंदू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से "मुक्त" कराने की मांग की जाती रही है. मंदिरों को श्रद्धालुओं को सौंपने की मांग के बाद अब उसे समझाना पड़ रहा है कि सरकारी निगरानी से जुड़े एक ट्रस्ट के तहत चंदा कैसे ग़ायब हो गया. ट्रस्ट में चार पदेन वरिष्ठ सरकारी अधिकारी इसे सीधे केंद्र सरकार — प्रधानमंत्री कार्यालय और गृह मंत्रालय समेत — से जोड़ते हैं, जबकि एक सदस्य उत्तर प्रदेश सरकार का प्रतिनिधित्व करता है.

लेकिन सियासी साया संभालना और मुश्किल है. ब्लूमबर्ग का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से क़रीबी तौर पर जुड़े एक हिंदू मंदिर में कथित वित्तीय अनियमितताएं उनकी पार्टी की एक प्रमुख परियोजना की छवि पर दाग़ लगाने का ख़तरा बन गई हैं.

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