सुदीप ठाकुर | बगल के कमरे में कोई पिट रहा है!
अपनी हालिया किताब ‘मदर मैरी कम्स टू मी’ (Mother Mary Comes To Me) को लेकर खासी चर्चा में रहने वाली अरुंधति रॉय की धमक हिंदी में भी कम नहीं है. अब इस किताब का तर्जुमा 'मेरी मां, मेरी गैंगस्टर' के रूप में राजकमल प्रकाशन समूह से आया है और सोमवार को इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में खचाखच भरे हाल में हुए कार्यक्रम में भी अरुंधति की धमक दिखाई दी.
यों तो ‘द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ (The God of Small Things) में अरुंधति रॉय के निजी जीवन के अक्स नजर आते हैं, लेकिन मेरी मां, मेरी गैंगस्टर अरुंधति और उनकी मां के रिश्ते को जिस तरह खोलती है, वह सिर्फ एक मां और बेटी की कहानी नहीं रह जाती, बल्कि दो इंडिविजुअल के तल्ख रिश्ते के रूप में भी सामने आती है. खुद अरुंधति ने कहा कि यह न तो उनकी ऑटोबायोग्राफी है और न ही उनकी मां की बायोग्राफी है.
दरअसल, यहीं से इस किताब को देखने का नजरिया भी बदल जाता है. मेरी रॉय का जब चाय बागान में बड़े ओहदे पर काम करने वाले पति से तलाक हुआ था, तब अरुंधति महज दो साल की थीं. उनके तकरीबन हमउम्र भाई को लेकर उनकी मां ने अपने गृह राज्य केरल का रुख कर लिया था और फिर कोट्टयम में ही बस गईं. कोट्टयम जाने से पहले वह ऊटी गई थीं और फिर वहां से उन्हें केरल का रुख करना पड़ा.
पूरी किताब में उनकी मां एक रिबेल के रूप में नजर आती हैं और शायद अरुंधति के भीतर भी यह देखा जा सकता है, बल्कि देखा ही गया है.
अपने दो बच्चों के साथ मैरी रॉय को अपने मायके में भी कोई खास तवज्जो नहीं मिली थी. खुद उनके भाई जी इसाक से उनके रिश्ते बेहतर नहीं थे. बल्कि मैरी रॉय ने उनके खिलाफ सीरियाई क्रिश्चियन उत्तराधिकार की लड़ाई तक लड़ी और सुप्रीम कोर्ट से जीती भी.
मैरी रॉय की जिंदगी में जितनी जटिलताएं रहीं, उससे कम कॉम्प्लेक्स अरुंधति का जीवन नहीं रहा है. किताब में एक खूबसूरत लाइन है. मैंने किताब अंग्रेजी में पढ़ रखी है. हिंदी में जल्द ही पढ़ूंगा. वह लिखती हैं,
"I left my mother not because I didn't love her, but in order to be able to continue to love her." (मैंने अपनी मां को इसलिए नहीं छोड़ा क्योंकि मैं उनसे प्यार नहीं करती थी, बल्कि इसलिए छोड़ा ताकि मैं उनसे प्यार करना जारी रख सकूं.)
यकीनन, इससे किसी भी रिश्ते को परखा जा सकता है. दरअसल, अपनी मां को लेकर अरुंधति को आज कोई दुविधा नहीं है. शायद पहले भी नहीं थीं. उन्हें उन्होंने उसी रूप में स्वीकार किया, जैसी वह थीं.
असल में दो छोटे बच्चों के साथ उनकी जिंदगी जिस तरह आगे बढ़ी, उसमें खासे उतार-चढ़ाव हैं. आर्थिक तंगी है, बावजूद इसके कि उनके पिता आर्थिक रूप से संपन्न थे. अपना स्कूल खोलने के लिए उन्होंने खासी मशक्कत की. स्कूल की बस से ही सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाए. एक वक्त था, जब वह बच्चों के साथ अपने स्कूल में ही रह रही थीं. उनके जीवट का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि मैरी रॉय ने सात बच्चों के साथ स्कूल शुरू किया था. इनमें से दो बच्चे तो उनके खुद के थे.
इस किताब का एक खासा भावुक कर देने वाला हिस्सा वह है, जब अरुंधति के भाई को स्कूल की परीक्षा में अच्छे अंक न मिलने पर मां ने उनकी पिटाई की थी. अरुंधति और उनके भाई रात को सो रहे थे. अचानक उनकी मां आईं और उनके भाई को चुपके से उठाकर दूसरे कमरे में ले गईं. वहां उन्होंने उसे रूल से तब तक पीटा, जब तक कि वह टूट नहीं गया. वजह थी,
"No Son of mine comes home with a report card that says, "average student" (मेरा कोई भी बेटा ऐसा रिपोर्ट कार्ड लेकर घर नहीं आएगा, जिस पर लिखा हो, 'औसत छात्र'.)
अरुंधति ने अच्छे अंक हासिल किए थे. मां ने उन पर लाड़ जताया.
अरुंधति के जेहन में यह वाकया जैसे एक गहरी पीड़ा के रूप में दर्ज है. किताब पर चर्चा के दौरान उनसे इस बारे में पूछा गया तो उनका जवाब था, "मुझे आज बुकर पुरस्कार तक मिल चुका है, लेकिन हर बार जब पुरस्कृत होती हूं तो लगता है कि बगल के कमरे में कोई पिट रहा है. यह उसकी कीमत पर है. जैसे कोई कश्मीर में पिट रहा हो, या फलस्तीन में... या बस्तर में..."
इस चर्चा के दौरान अरुंधति ने दिल्ली के जंतर-मंतर में हुए आंदोलन से अपने जुड़ाव के बारे में भी खुलकर कहा और खुद को कॉकरोच कहने से भी गुरेज नहीं किया.
इस किताब से इतर यह बात जाहिर है कि अरुंधति से आप सहमत हों या न हों, लेकिन वह जो कहती हैं या लिखती हैं, उसे आप नजरअंदाज नहीं कर सकते.
इस शानदार कार्यक्रम का संचालन कर रहे वरिष्ठ पत्रकार और लेखक उर्मिलेश जी ने अरुंधति से पूछा कि हिंदी के अनेक अंग्रेजी लेखकों की तरह उन्होंने पेरिस या किसी दूसरे मुल्क में जाकर बसना क्यों पसंद नहीं किया, या फिर केरल ही क्यों नहीं चली गईं. दिल्ली को ही क्यों चुना. इसका जवाब अरुंधति ने अपने अंदाज में ही दिया. उन्होंने कहा कि जंगल को नहीं कह सकते कि वह कहीं और चले जाए. पेड़ को किसी दूसरी जगह जाने को नहीं कह सकते.
महज 18 बरस की उम्र में अपनी मां की बड़ी बहन के नाम का एक पुर्जा लेकर निजामुद्दीन स्टेशन पर उतरने वाली अरुंधति ने दिल्ली को जिस शिद्दत से अपनाया है और उसके बारे में जितनी खूबसूरती से इस किताब में लिखा है, वह अपने आप में इस सवाल का जवाब भी है.
किताब पढ़ते हुए एक सवाल मेरे जेहन में भी था कि मैरी रॉय का तलाक तब हुआ था, जब अरुंधति दो बरस की थीं और उनके भाई शायद पांच साल के. यानी अरुंधति की स्मृति में पिता के कोई अक्स नहीं थे. इसके बावजूद बरसों बाद, जब दिल्ली में वह अपने पिता से पहली बार मिलीं, तो उनका अनुभव कैसा रहा होगा?
यह सवाल मंच साझा कर रहीं अर्जुमंद आरा ने उनसे किया और उनकी तरह शायद सबको लगा हो कि यह भावुक कर देने वाला क्षण होगा. मगर ऐसा नहीं था. अरुंधति ने इसे बस एक मुलाकात जैसा ही देखा. उनके लिए इसमें भावुकता जैसी कोई बात नहीं थी.
मेरी मां, मेरी गैंगस्टर का तर्जुमा पत्रकार और इन दिनों अनुवाद के लिए खासे जाने जा रहे प्रभात सिंह ने किया है. इस किताब के उनके अनुवाद की खासी चर्चा है और खुद मंच से अरुंधति ने इसे सराहा है. प्रभात जी ने कहा कि उन्होंने इसका तर्जुमा हिंदुस्तानी में किया है. भाषायी संकीर्णता के इस दौर में यह एक महत्त्वपूर्ण बात भी है.

