फैसल सी.के. | सिर्फ जज बढ़ाने से नहीं सुधरेगी न्याय व्यवस्था

भारत के सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या को देखते हुए संसद ने सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 पारित कर न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 33 से बढ़ाकर 37 करने का फैसला किया है. लेकिन विधि विशेषज्ञ और लेखक फैसल सी.के. का तर्क है कि यह कदम समस्या का स्थायी समाधान नहीं है. उनके अनुसार न्यायपालिका का संकट केवल न्यायाधीशों की कमी का नहीं, बल्कि पूरी न्यायिक संरचना का संकट है.

सिर्फ संख्या नहीं, संरचनात्मक सुधार की जरूरत

लेखक बताते हैं कि 1 जनवरी 2026 तक सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या 92,101 पहुंच चुकी थी. वर्ष 2025 में 75,410 नए मामले दर्ज हुए, जबकि केवल 65,615 मामलों का निपटारा हो सका. ऐसे में चार नए न्यायाधीश नियुक्त करना केवल अस्थायी राहत है. असली समस्या यह है कि भारतीय न्यायपालिका पर मुकदमों का बोझ लगातार बढ़ रहा है और अदालत अपनी मूल भूमिका से भटकती जा रही है.

सर्वोच्च न्यायालय की पहचान का संकट

फैसल सी.के. का सबसे बड़ा तर्क यह है कि सुप्रीम कोर्ट धीरे-धीरे एक संवैधानिक न्यायालय से सामान्य अपीलीय अदालत में बदल गया है. संविधान निर्माताओं ने इसे मौलिक अधिकारों की रक्षा, केंद्र-राज्य विवादों और राष्ट्रीय महत्व के संवैधानिक प्रश्नों के समाधान के लिए बनाया था. लेकिन आज अदालत मकान-मालिक और किरायेदार के विवाद, सेवा संबंधी मामले, वैवाहिक विवाद, सड़क दुर्घटना मुआवजा और हजारों विशेष अनुमति याचिकाओं (एसएलपी) की सुनवाई में व्यस्त रहती है.

अनुच्छेद 136, जिसे असाधारण परिस्थितियों के लिए बनाया गया था, अब नियमित अपील का माध्यम बन चुका है. इसका परिणाम यह हुआ कि संविधान पीठों द्वारा सुने जाने वाले महत्वपूर्ण मामलों की संख्या लगातार घटती गई और कई बड़े संवैधानिक प्रश्न वर्षों तक लंबित रहने लगे.

तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य

लेखक भारत की तुलना अमेरिका और ब्रिटेन की सर्वोच्च अदालतों से करते हैं. उनके अनुसार अमेरिका और ब्रिटेन की सर्वोच्च अदालतें केवल सीमित संख्या में राष्ट्रीय महत्व के मामलों की सुनवाई करती हैं. इसके विपरीत भारत का सुप्रीम कोर्ट लगभग हर तरह के मुकदमे सुनने की कोशिश करता है. इससे उसकी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका—संविधान की रक्षा—कमजोर पड़ जाती है.

भौगोलिक असमानता

लेख में एक और बड़ी समस्या की ओर ध्यान दिलाया गया है. सुप्रीम कोर्ट केवल नई दिल्ली में स्थित है. इससे दक्षिण, पश्चिम और पूर्वोत्तर भारत के नागरिकों के लिए वहां तक पहुंचना महंगा और कठिन हो जाता है. दिल्ली आना, वरिष्ठ वकीलों की फीस देना और मुकदमे का खर्च उठाना हर व्यक्ति के लिए संभव नहीं है. इस तरह न्याय तक पहुंच भी आर्थिक और भौगोलिक असमानता से प्रभावित होती है.

राष्ट्रीय अपीलीय न्यायालयों की स्थापना

फैसल सी.के. का समाधान है कि संवैधानिक मामलों और सामान्य अपीलों को अलग कर दिया जाए. इसके लिए चार क्षेत्रीय राष्ट्रीय अपीलीय न्यायालय स्थापित किए जाएं, जो सामान्य दीवानी, फौजदारी, श्रम, वैवाहिक और अन्य अपीलों की सुनवाई करें. वहीं सुप्रीम कोर्ट केवल संवैधानिक प्रश्नों, केंद्र-राज्य विवादों और राष्ट्रीय महत्व के मामलों पर ध्यान दे. लेखक याद दिलाते हैं कि न्यायमूर्ति के.के. मैथ्यू, न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती, विधि आयोग और पूर्व अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल भी इस व्यवस्था का समर्थन कर चुके हैं.

फैसल सी.के. निष्कर्ष निकालते हैं कि न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना एक जरूरी लेकिन अस्थायी कदम है. यदि उसी पुरानी व्यवस्था में केवल कुछ नए न्यायाधीश जोड़ दिए जाएंगे, तो समस्या की जड़ नहीं बदलेगी. भारत की 140 करोड़ आबादी को समयबद्ध, सुलभ और किफायती न्याय दिलाने के लिए न्यायपालिका की संरचना में व्यापक सुधार आवश्यक है. उनके अनुसार क्षेत्रीय राष्ट्रीय अपीलीय न्यायालयों की स्थापना ही सुप्रीम कोर्ट को उसके मूल संवैधानिक दायित्व की ओर वापस ले जाने का सबसे प्रभावी रास्ता हो सकता है.

फैसल सी.के. केरल सरकार के विधि विभाग में उप सचिव हैं. साउथ फर्स्ट में अंग्रेजी प्रकाशित उनके मूल लेख का हिंदी में अनुदित अंश है.

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