आसिम अली | न्यूक्लियर बटन
‘द टेलीग्राफ’ में आसिम अली ने लिखा है कि देश “अभूतपूर्व स्थिति” में प्रवेश कर चुका है, जहाँ “वोट, कानून और संविधान को जोड़ने वाली मुख्य कड़ी टूट चुकी है.” मुख्य चुनाव आयुक्त की देखरेख में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़े विवादित कदमों पर दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों की मीडिया रिपोर्ट आने के बाद, विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने यह तीखी प्रतिक्रिया दी थी.
भारतीय राजनीति के लोकतांत्रिक दायरों से भटककर एक हाइब्रिड 'चुनावी-सत्तावादी' दौर में चले जाने की चिंता पूरे 'इंडिया' विपक्षी गठबंधन में व्याप्त है. उदाहरण के लिए, जून में गठबंधन के 23 नेताओं ने उच्चतम न्यायालय को एक संयुक्त पत्र लिखकर मुख्य चुनाव आयुक्त के “पक्षपातपूर्ण आचरण” और बिहार व पश्चिम बंगाल में एसआईआर के क्रियान्वयन में हुई कथित गड़बड़ियों की ओर ध्यान आकर्षित किया. पत्र में आगाह किया गया था कि यदि न्यायपालिका ने इस पर हस्तक्षेप नहीं किया, तो यह “गणराज्य के पूरी तरह से चरमराने” का संकेत होगा.
हालाँकि, विपक्ष के आक्रामक बयानों और उसकी व्यावहारिक कार्यशैली के बीच एक बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है. गठबंधन के सभी दल यह दावा करते हैं कि चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह दूषित हो चुकी है और संस्थागत तंत्र ऐसा रूप ले चुका है जहाँ सुधारात्मक कदम उठाना असंभव है. इसके बावजूद, किसी भी प्रमुख विपक्षी दल ने आगामी चुनावों के बहिष्कार की घोषणा नहीं की है और न ही चुनाव में भाग लेने के लिए कोई सख्त शर्तें रखी हैं.
इस विरोधाभास का सीधा कारण यह है कि चुनाव का बहिष्कार करना एक अत्यंत जोखिम भरा रणनीतिक कदम है, जिसमें अनिश्चित लाभों के मुकाबले भारी नुकसान उठाने की संभावना ज्यादा होती है.
बहिष्कार को सफल बनाने की चुनौतियाँ
किसी भी राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर चुनावी बहिष्कार को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए मुख्य रूप से दो बड़ी शर्तें पूरी होनी चाहिए:
1. विपक्षी दलों के बीच पूर्ण समन्वय और विश्वास
पहली आवश्यकता यह है कि सभी प्रमुख विपक्षी दलों के बीच ऐसा गहरा तालमेल हो कि वे सामूहिक रूप से चुनाव से बाहर रहने पर सहमत हों. लेकिन अवसरवादी राजनीति और चुनावी मैदान खाली देखकर मिलने वाले लाभ के प्रलोभन के कारण ऐसा कर पाना व्यावहारिक रूप से बेहद कठिन है.
उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश को लें. यदि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस गठबंधन करके चुनाव का बहिष्कार भी कर दें, तो इस बात की प्रबल संभावना है कि बहुजन समाज पार्टी (बसपा) मैदान में उतर आए. बसपा इसे अपने खिसकते हुए दलित वोट बैंक को वापस पाने के एक सुनहरे अवसर के रूप में देखेगी.
इसके अलावा, किसी एक राज्य में अलग से किया गया बहिष्कार तब तक बेमानी है, जब तक कि वह भविष्य के सभी चुनावों के लिए बनाई गई एक दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा न हो. यदि समाजवादी पार्टी एसआईआर के विरोध में उत्तर प्रदेश चुनाव का बहिष्कार करती है, तो वह कांग्रेस से भी यह उम्मीद करेगी कि वह उन राज्यों में ऐसा ही करे जहाँ वह मुख्य विपक्षी दल है. लेकिन इस तरह के पारस्परिक समझौते को निष्पक्षता से कौन लागू कराएगा? इसे ही राजनीति विज्ञान में 'विश्वसनीय प्रतिबद्धता' की समस्या कहा जाता है.
2. दल के भीतर अनुशासन और सहमति
दूसरी चुनौती प्रत्येक दल को अपनी आंतरिक संरचना और कैडर के भीतर अनुशासन बनाए रखने की होगी. कांग्रेस का उदाहरण लें; राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा होता है. यहाँ बहिष्कार का फैसला सैद्धांतिक रूप से आसान लग सकता है. परंतु, राज्य स्तरीय बड़े नेता और स्थानीय विधायक—जो अपनी राजनीतिक सत्ता और समर्थकों के तंत्र को बचाए रखने के लिए चुनाव पर निर्भर हैं—बहिष्कार का विरोध करेंगे. पार्टी में बिना किसी टूट या बगावत के ऐसे फैसले को लागू करना लगभग असंभव चुनौती साबित होगा.
इसी कारण भारतीय राजनीति में चुनावी बहिष्कार की घटनाएँ न के बराबर रही हैं. पंजाब और कश्मीर जैसे क्षेत्रों में भी बहिष्कार का मार्ग मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों के बजाय मुख्य रूप से अलगाववादी समूहों द्वारा ही अपनाया जाता रहा है.
'परमाणु विकल्प' और निवारण की राजनीति
एक तरह से, चुनाव का बहिष्कार विपक्ष के लिए एक 'न्यूक्लियर ऑप्शन' (परमाणु विकल्प) की तरह है. इसका अर्थ यह है कि इसकी राजनीतिक कीमत इतनी अधिक है कि इसका प्रयोग केवल अंतिम हथियार के रूप में ही किया जा सकता है.
तथापि, अपने शस्त्रागार में इस 'परमाणु विकल्प' का होना और इसकी धमकी को प्रभावी रूप से पेश करना सत्तापक्ष पर दबाव बनाने के लिए आवश्यक है, ताकि वह लोकतांत्रिक सीमाओं का सम्मान करे. यदि बहिष्कार से विपक्ष को नुकसान होता है, तो यह सरकार की नैतिक वैधता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर सकता है. निष्पक्ष और प्रतिस्पर्धी चुनावों के बिना कोई भी सरकार अपने सामाजिक आधार और प्रशासनिक व्यवस्था को बनाए रखने में संघर्ष करेगी.
यहाँ मुख्य प्रश्न यह नहीं है कि 'बहिष्कार किया जाए या नहीं', बल्कि यह है कि: विपक्ष किस प्रकार बहिष्कार की धमकी को एक विश्वसनीय निवारक के रूप में इस्तेमाल कर सकता है? परमाणु रणनीति के प्रसिद्ध सिद्धांतकार थॉमस शेलिंग के अनुसार, एक प्रभावी निवारण तंत्र तीन स्तंभों पर टिका होता है: क्षमता : निर्णय को लागू करने की वास्तविक शक्ति, विश्वसनीयता: कठिन परिस्थितियों में भी उस कदम को उठाने की इच्छाशक्ति और संचार: अपनी सीमाओं (रेड लाइंस) को स्पष्ट रूप से निर्धारित करना.
विपक्ष को इन तीन स्तंभों को मजबूत करने के लिए दो प्रमुख कदम उठाने होंगे: पहला, 'इंडिया' ब्लॉक का संस्थागत पुनरुद्धार. गठबंधन को महज एक अनौपचारिक मंच न रखकर एक ऐसे संस्थान का रूप देना होगा जो सामूहिक निर्णयों की निगरानी और प्रवर्तन कर सके. इसके लिए शीर्ष नेताओं की नियमित बैठकें होनी चाहिए, जिनमें चुनाव आयोग की निष्पक्षता और एसआईआर जैसे मुद्दों पर न्यूनतम संस्थागत मानक तय किए जाएँ. दूसरा, जन लामबंदी और आंतरिक सहमति. पार्टी नेतृत्व को अपने कैडर और जनता के बीच यह संदेश देना होगा कि यह लड़ाई एक बड़े राष्ट्रीय उद्देश्य के लिए है. बहिष्कार की रणनीति केवल तभी सफल हो सकती है जब इसे सड़कों पर विरोध प्रदर्शनों और जन-आंदोलनों से जोड़ा जाए.
लक्ष्य चुनाव का बहिष्कार करना नहीं, बल्कि एक विश्वसनीय दबाव तंत्र विकसित करना है. जैसा कि थॉमस शेलिंग ने कहा था: “किसी प्रतिद्वंद्वी को विवश करने की क्षमता अक्सर खुद को एक कठोर प्रतिबद्धता में बाँधने की शक्ति पर निर्भर करती है.”
(आसिम अली एक राजनीतिक शोधकर्ता और स्तंभकार हैं. अंग्रेजी में उनके मूल लेख का यह हिंदी में अनूदित संपादित अंश है.)

