भारतीय महिलाएं फिर सड़कों पर हैं | सब कुछ बदला, लेकिन कुछ नहीं बदला

‘स्क्रोल’ में शिल्पा फड़के ने महिलाओं की सार्वजनिक स्थानों तक पहुंच, यौन हिंसा और विरोध के अधिकार पर टिप्पणी की है. उनका कहना है कि महिलाएं अब केवल सुरक्षा की मांग नहीं कर रहीं, बल्कि शहरों और सड़कों पर अपने बराबर के अधिकार का दावा कर रही हैं. इसके बावजूद, उनके अनुसार, संस्थागत और सामाजिक प्रतिक्रियाएं इस बदलाव को स्वीकार करने के बजाय कई बार पीछे ले जाने वाली दिखाई देती हैं.

फड़के लिखती हैं कि सितंबर में महिलाओं और लड़कियों पर हमलों की कई घटनाएं सामने आईं, जबकि वास्तविक हिंसा इससे अधिक हो सकती है. निजी हिंसा अक्सर दर्ज ही नहीं होती और सार्वजनिक चर्चा से बाहर रह जाती है. लेखिका के लिए यह निराशाजनक है कि 2026 में भी महिलाओं की सुरक्षा और सार्वजनिक जीवन में उनकी मौजूदगी पर वही सवाल उठ रहे हैं, जिन पर उन्होंने 2003 में शोध शुरू किया था.

महिलाओं के सार्वजनिक स्थानों के अधिकार पर अपने काम के दौरान फड़के की मुलाकात जस्मीन पथेचा से हुई, जिन्होंने सड़क पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ ‘ब्लैंक नॉइज़’ परियोजना शुरू की थी. 2005 में मरीन ड्राइव पर एक पुलिस कांस्टेबल द्वारा बलात्कार की घटना के बाद उन्होंने सड़कों पर एक हस्तक्षेप भी आयोजित किया. लेखिका ने दिल्ली में महिलाओं की सुरक्षा पर काम कर रहीं कल्पना विश्वनाथ और जगोरी के साथ हुए संवाद का भी उल्लेख किया है.

शिल्पा रणाडे, समीरा खान और फड़के ने इस विषय पर दो वर्षों से अधिक समय तक काम किया, जिसके बाद 2011 में उनकी पुस्तक Why Loiter? Women and Risk on Mumbai Streets प्रकाशित हुई. इसमें महिलाओं के सार्वजनिक स्थानों पर बिना किसी विशेष उद्देश्य के समय बिताने, यानी ‘लोइटरिंग’, को नागरिक अधिकार के रूप में प्रस्तुत किया गया. उनका तर्क था कि महिलाएं सार्वजनिक स्थानों पर बिना शर्त अपना अधिकार तभी स्थापित कर सकती हैं, जब वे वहां केवल किसी काम से आने-जाने के बजाय अपनी इच्छा से भी मौजूद रहें.

फड़के के अनुसार, पिछले दो दशकों में इस विचार को अकादमिक शोध, नीतिगत वकालत और आंदोलनों का समर्थन मिला है. महिलाओं की भाषा भी बदली है. वे अब केवल सुरक्षा के लिए याचिका नहीं दे रहीं, बल्कि शहरों और सड़कों पर अपने अधिकार का दावा कर रही हैं. हालांकि, लेखिका का कहना है कि कई राजनेता और सामाजिक समूह इस बदलाव को स्वीकार नहीं कर पाए हैं. महिलाओं का सार्वजनिक जगहों पर घूमना, प्रदर्शन करना या अपनी पसंद से जीवनसाथी चुनना अब भी कुछ लोगों को आपत्तिजनक लगता है.

लेख में फड़के ने नैतिक पुलिसिंग, बलात्कार के दोषियों को मिली रिहाई या पैरोल, बलात्कार की घटनाओं के बाद पार्कों में प्रवेश सीमित करने और परिसर के आसपास हुई हिंसा के बाद कक्षाएं ऑनलाइन करने जैसे कदमों का उल्लेख किया है. उनके अनुसार, ऐसे उपाय महिलाओं की स्वतंत्रता और सार्वजनिक स्थानों तक उनकी पहुंच के सवाल को हल करने के बजाय प्रतिबंधों का बोझ उन्हीं पर डालते हैं.

वह 2012 में दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार के बाद सड़कों पर उतरे प्रदर्शनों और उसके बाद बने आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम, 2013 को भी याद करती हैं. इसके बाद शोध, याचिकाओं, नीतिगत बदलावों की मांग और विरोध प्रदर्शनों के बावजूद महिलाओं को फिर सड़कों पर उतरना पड़ रहा है.

हाल के दिनों में ‘वाय लोइटर’ अभियान से जुड़ी महिलाओं ने मुंबई में करीब एक दर्जन सामूहिक वॉक आयोजित कीं. सोशल मीडिया पर साझा किए गए आह्वान के बाद बेंगलुरु, अहमदाबाद और नागपुर सहित अन्य शहरों में भी ऐसी गतिविधियां हुईं. मुंबई के एक समूह में सदस्यों की संख्या एक दिन में 100 से कम से बढ़कर 800 से अधिक हो गई. फड़के इसे महिलाओं के बीच साझा जिम्मेदारी, एकजुटता और आक्रोश की अभिव्यक्ति के रूप में देखती हैं.

लेखिका का निष्कर्ष है कि महिलाएं जानती हैं कि सड़कें और शहर उनके भी हैं, लेकिन संस्थाएं और उन्हें चलाने वाले लोग इस समझ के अनुरूप जरूरी सुविधाएं और नीतियां विकसित करने में पीछे हैं. वह चाहती हैं कि उनका शोध और विचार पुराने पड़ जाएं, न कि हर नई हिंसक घटना और उसके बाद की प्रतिगामी प्रतिक्रिया उन्हें फिर सही साबित करे. तब तक, उनके शब्दों में, महिलाएं सड़कों पर आती रहेंगी.

(शिल्पा फड़के शिक्षिका, लेखिका और शोधकर्ता हैं. यह उनके मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनूदित सारांश है.)

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