पुष्पेंद्र सिंह | गृह मंत्री अमित शाह को इस्तीफा क्यों देना चाहिए
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद के मौजूदा सत्र में अब तक हिस्सा नहीं लिया है और 20 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई पर भी कोई बयान नहीं दिया है. विपक्ष की ओर से जवाबदेही की मांग के बावजूद दोनों नेताओं की चुप्पी बनी हुई है. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने पुलिस कार्रवाई के लिए सीधे अमित शाह को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि बल प्रयोग की अनुमति केवल गृह मंत्री या प्रधानमंत्री दे सकते हैं. बाद में उन्होंने शाह से जिम्मेदारी स्वीकार करने और इस्तीफा देने की मांग की.
सुरक्षा के लिए बने मंत्रालय का सवाल
संविधान के तहत गृह मंत्रालय की जिम्मेदारी नागरिकों के जीवन, स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा करना है. लेकिन पिछले छह वर्षों में किसान आंदोलन, दिल्ली दंगे, लखीमपुर खीरी, महिला पहलवानों का आंदोलन, मणिपुर की हिंसा और हाल के छात्र प्रदर्शनों में गृह मंत्रालय की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं. इन घटनाओं को राज्य की शक्ति के नागरिक विरोध के खिलाफ इस्तेमाल के व्यापक पैटर्न के रूप में देखा गया है.
किसान आंदोलन
2020-21 के किसान आंदोलन के दौरान दिल्ली की सीमाओं पर हजारों किसानों ने तीन कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन किया. राजधानी की ओर जाने वाले रास्तों पर बड़े कंक्रीट अवरोध, कंटीले तार और सड़कों पर लोहे की कीलें लगाकर रास्ते बंद किए गए. प्रदर्शनकारियों को एक साल से अधिक समय तक दिल्ली में प्रवेश से रोका गया.
सर्दी और गर्मी के लंबे दौर में प्रदर्शन जारी रहा. पुलिस ने पानी की बौछार, आंसू गैस और लाठीचार्ज का इस्तेमाल किया. अंततः सरकार को तीनों कृषि कानून वापस लेने पड़े. आंदोलन के दौरान 700 से अधिक किसानों की मौत का दावा किया गया. इन मौतों में ठंड, स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों और अन्य कारणों का उल्लेख किया गया है.
दिल्ली दंगे
फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों में 50 से अधिक लोगों की मौत हुई. यह हिंसा नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ चल रहे प्रदर्शनों के बीच हुई. उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी भारत दौरे पर थे.
अमित शाह के नेतृत्व वाले गृह मंत्रालय पर हिंसा के शुरुआती 72 घंटों में पर्याप्त सुरक्षा बल तैनात नहीं करने और स्थिति को नियंत्रित करने में विफल रहने के आरोप लगे. सत्ता पक्ष के नेताओं के भड़काऊ भाषणों के बावजूद हिंसा की आशंका को लेकर पर्याप्त कार्रवाई नहीं किए जाने पर भी सवाल उठे. नागरिक समाज की रिपोर्टों में अर्धसैनिक बलों की तैनाती में देरी और पुलिस की कथित भूमिका का मुद्दा उठाया गया.
लखीमपुर खीरी
अक्टूबर 2021 में उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में किसानों के प्रदर्शन के दौरान एक वाहन काफिले ने प्रदर्शनकारियों को कुचल दिया. घटना में चार किसानों और एक स्थानीय पत्रकार समेत पांच लोगों की मौत हुई. काफिले में तत्कालीन केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी से जुड़ी एसयूवी भी शामिल थी. उनके बेटे आशीष मिश्रा को मामले में मुख्य आरोपी बनाया गया.
घटना के बाद निष्पक्ष जांच और राजनीतिक जवाबदेही को लेकर सवाल उठे. गृह मंत्रालय की ओर से प्रभावी कार्रवाई और राजनीतिक संरक्षण के आरोपों ने भी विवाद को बढ़ाया.
पहलवानों का आंदोलन
2023 में देश की प्रमुख महिला पहलवानों ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर भारतीय कुश्ती महासंघ के तत्कालीन अध्यक्ष और भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ प्रदर्शन किया. महिला पहलवानों ने उन पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए और प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की.
दिल्ली पुलिस गृह मंत्रालय के अधीन है, लेकिन प्राथमिकी दर्ज करने में देरी हुई और सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद मामला दर्ज किया गया. 28 मई 2023 को नए संसद भवन के उद्घाटन के दौरान प्रदर्शनकारी पहलवानों को पुलिस ने हिरासत में लिया और उनके साथ बल प्रयोग किया. ओलंपिक पदक विजेता महिला खिलाड़ियों को सड़क पर घसीटे जाने की तस्वीरों ने व्यापक प्रतिक्रिया पैदा की.
मणिपुर का जातीय संकट और सुरक्षा की विफलताएं
अमित शाह के कार्यकाल की सबसे गंभीर चुनौतियों में मणिपुर की जातीय हिंसा शामिल है. मई 2023 से जारी हिंसा ने राज्य को अलग-अलग जातीय क्षेत्रों में बांट दिया. सैकड़ों लोगों की मौत हुई और 60 हजार से अधिक पुरुष, महिलाएं और बच्चे विस्थापित हुए.
राज्य के शस्त्रागारों से हजारों हथियार लूटे गए. बड़ी संख्या में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की तैनाती के बावजूद हिंसा और विस्थापन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ. आंतरिक सुरक्षा के स्तर पर गृह मंत्रालय की भूमिका और राज्य में सामान्य स्थिति बहाल करने की क्षमता पर लगातार सवाल उठते रहे.
जम्मू-कश्मीर में पहलगाम में पर्यटकों पर हुए आतंकी हमले में 26 लोगों की मौत और उसके बाद मई 2025 में भारत-पाकिस्तान के बीच सैन्य तनाव का भी उल्लेख किया गया है. दिल्ली में लाल किले के सामने हुए विस्फोट में कम से कम आठ लोगों की मौत ने राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए.
जंतर-मंतर पर छात्रों का आंदोलन
20 जुलाई 2026 को हजारों छात्रों ने परीक्षा में अनियमितताओं और लगातार हो रहे प्रश्नपत्र लीक के खिलाफ दिल्ली में प्रदर्शन किया. छात्रों की मांग शिक्षा व्यवस्था में संरचनात्मक सुधार और जवाबदेही की थी.
प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस ने लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया. आसपास के मेट्रो स्टेशन के निकास बंद किए गए ताकि प्रदर्शन में और लोग शामिल न हो सकें. पुलिस द्वारा पेलेट गन जैसे हथियारों के इस्तेमाल का भी आरोप लगाया गया, जिसमें कम से कम एक प्रदर्शनकारी की आंख घायल होने की बात कही गई.
छात्रों, महिलाओं और शिक्षा कार्यकर्ताओं के साथ मारपीट और उन्हें सड़क पर घसीटे जाने के आरोप भी सामने आए. महिला प्रदर्शनकारियों के साथ पुलिसकर्मियों द्वारा कथित दुर्व्यवहार के आरोपों ने कार्रवाई की गंभीरता पर और सवाल खड़े किए.
जवाबदेही का सवाल
पुष्पेंद्र सिंह ने अमित शाह के गृह मंत्री के रूप में छह साल के कार्यकाल को किसान आंदोलन, दिल्ली दंगों, लखीमपुर खीरी, पहलवानों के आंदोलन, मणिपुर हिंसा और छात्र प्रदर्शनों के संदर्भ में देखते हुए उनकी राजनीतिक जवाबदेही पर सवाल उठाया है. उनका निष्कर्ष है कि इन घटनाओं में राज्य की शक्ति का इस्तेमाल नागरिक विरोध को नियंत्रित करने के लिए हुआ और गृह मंत्रालय नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने में विफल रहा.
संवैधानिक लोकतंत्र में मंत्री अपने मंत्रालय की कार्रवाई के लिए राजनीतिक रूप से जिम्मेदार होता है. इसी आधार पर अमित शाह के इस्तीफे की मांग की गई है. लेख में कहा गया है कि शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बाद अब गृह मंत्री को भी पद छोड़ना चाहिए.
लेखक किसान नेता हैं और किसान तथा पहलवानों के आंदोलनों में सक्रिय रूप से शामिल रहे हैं. यह उनके ‘द वायर’ में प्रकाशित मूल अंग्रेजी लेख का हिन्दी में अनुदित अंश है.

