ऑपरेशन सिंदूर में शहीद अग्निवीर के माता-पिता की लड़ाई. सम्मान मिला, लेकिन पेंशन अब भी नहीं
अग्निवीरों के एक सैन्य समारोह में मुरलीनायक अपने माता-पिता के साथ. | फोटो: श्रीरामनायक
‘स्क्रोल’ के मुताबिक, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान 9 मई 2025 को भारत-पाकिस्तान सीमा पर हुई गोलाबारी में शहीद हुए अग्निवीर मूड मुरलीनायक का नाम राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर दर्ज किया जा चुका है. उन्हें मरणोपरांत सेना मेडल से भी सम्मानित किया गया. लेकिन उनके माता-पिता का कहना है कि केवल सम्मान से उनका जीवन नहीं चलेगा. उनका सवाल है कि जब उनके बेटे ने नियमित सैनिकों की तरह सीमा पर लड़ते हुए जान दी, तो उसके परिवार को भी वही अधिकार और सुविधाएं क्यों नहीं मिलनी चाहिए जो अन्य शहीद सैनिकों के परिवारों को मिलती हैं. इसी मांग को लेकर उन्होंने बॉम्बे हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. यह मामला एक बार फिर अग्निपथ योजना और उसमें अग्निवीरों के अधिकारों को लेकर बहस के केंद्र में आ गया है.
एक सैनिक की परवरिश
मुरलीनायक अग्निपथ योजना के तहत 2022 में भर्ती होने वाले पहले बैच के अग्निवीरों में शामिल थे. उनका परिवार आंध्र प्रदेश के श्री सत्य साई जिले के एक आदिवासी गांव पुडागुंडलापल्ली थांडा में रहता है और अनुसूचित जनजाति समुदाय से आता है. बचपन में मुरलीनायक अपने दादा-दादी के साथ गांव में रहे, जबकि उनके माता-पिता मुंबई में मजदूरी कर परिवार चलाते थे. उनकी मां ज्योतिबाई घरेलू कामगार थीं और पिता श्रीरामनायक घर-घर जाकर अनाज बेचने का काम करते थे.
बेटे के सेना में भर्ती होने के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति कुछ बेहतर हुई और माता-पिता ने काम कम कर दिया. परिवार का कहना है कि मुरलीनायक ही उनका एकमात्र सहारा थे. 9 मई 2025 को ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सीमा पार से हुई गोलाबारी में उनकी मौत हो गई. इसके बाद सरकार ने अग्निपथ योजना के प्रावधानों के तहत आर्थिक सहायता की घोषणा की. सरकार का कहना है कि परिवार को लगभग 1.2 करोड़ रुपये की सहायता दी गई है और राज्य सरकार ने पांच एकड़ जमीन देने की भी घोषणा की है. हालांकि परिवार का दावा है कि उन्हें अब तक करीब 76 लाख रुपये ही मिले हैं. उनका कहना है कि एकमुश्त राशि से पूरी जिंदगी नहीं चल सकती. इसलिए उन्हें आजीवन पेंशन या परिवार के किसी सदस्य को सरकारी नौकरी दी जानी चाहिए.
कानूनी लड़ाई और संवैधानिक सवाल
मुरलीनायक की मां ज्योतिबाई ने बॉम्बे हाई कोर्ट में याचिका दायर कर मांग की है कि युद्ध में शहीद होने वाले अग्निवीरों के परिवारों को नियमित सैनिकों के परिवारों के समान पेंशन और अन्य सभी सुविधाएं मिलनी चाहिए. याचिका में कहा गया है कि जो सैनिक एक ही मोर्चे पर, समान जोखिम उठाकर देश की रक्षा करते हैं, उनके परिवारों के साथ केवल भर्ती की श्रेणी के आधार पर अलग व्यवहार नहीं किया जा सकता.
सरकार ने अदालत में कहा है कि अग्निवीर और नियमित सैनिक अलग-अलग सेवा शर्तों के तहत भर्ती किए जाते हैं. अग्निवीर चार वर्ष की निश्चित अवधि के लिए नियुक्त होते हैं और भर्ती के समय वे इन शर्तों को स्वीकार करते हैं. सरकार का यह भी तर्क है कि पेंशन कोई मौलिक अधिकार नहीं है और नियमित सैनिक भी निर्धारित सेवा अवधि पूरी करने के बाद ही इसके पात्र बनते हैं.
दूसरी ओर, याचिकाकर्ताओं का कहना है कि युद्ध में शहीद होने वाले सैनिकों के मामले में सेवा अवधि नहीं, बल्कि उनके बलिदान को आधार बनाया जाना चाहिए. उनका तर्क है कि समान परिस्थितियों में जान देने वाले सैनिकों के परिवारों के साथ अलग व्यवहार संविधान के समानता के अधिकार के खिलाफ है.
सम्मान का सवाल
सेना ने मुरलीनायक के बलिदान को राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर उनका नाम अंकित कर और मरणोपरांत सेना मेडल देकर सम्मानित किया है. लेकिन उनके माता-पिता का कहना है कि सम्मान तभी सार्थक होगा जब उसके साथ परिवार की सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा भी सुनिश्चित की जाए.
ज्योतिबाई कहती हैं कि अगर अग्निवीरों को नियमित सैनिकों से अलग माना जाता है, तो उन्हें युद्ध जैसी परिस्थितियों में क्यों भेजा जाता है. उनके पति श्रीरामनायक का कहना है कि सरकार ऑपरेशन सिंदूर के शहीदों पर गर्व करती है, लेकिन शहीदों के परिवारों की दीर्घकालिक जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है.
मामला अभी बॉम्बे हाई कोर्ट में लंबित है. अदालत का फैसला केवल मुरलीनायक के परिवार के भविष्य को ही प्रभावित नहीं करेगा, बल्कि यह भी तय कर सकता है कि युद्ध में शहीद होने वाले अग्निवीरों के अधिकार और उनके परिवारों की सामाजिक सुरक्षा को भविष्य में किस तरह देखा जाएगा.

