नंदन नीलेकणी भारत के शिक्षा संकट को क्यों नहीं सुलझा सकते?

‘मकतूब मीडिया’ में पायस फोजान लिखते हैं कि सरकार की नीतियों में एक पैटर्न बार-बार दिखाई देता है. चाहे कल्याणकारी योजनाओं में गड़बड़ी हो या परीक्षाओं के पेपर लीक होने का संकट, संस्थागत विफलताओं को अक्सर तकनीकी समस्या मानकर समाधान खोजा जाता है. सोच यह है कि प्लेटफॉर्म सुरक्षित कर दिया जाए, डेटाबेस डिजिटल हो जाए और प्रबंधन तकनीकी विशेषज्ञों के हाथ में दे दिया जाए, तो समस्या हल हो जाएगी.

लेकिन यह सोच प्रशासनिक दक्षता और सामाजिक समानता को एक मान लेने की भूल करती है. शिक्षा और परीक्षा का मौजूदा संकट केवल सर्वर, सॉफ्टवेयर या सुरक्षा की समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और संस्थागत संकट भी है.

आधार मॉडल से क्या सबक मिला?

नंदन नीलेकणी के नेतृत्व में आधार बनाते समय दावा था कि सुरक्षित डिजिटल व्यवस्था भ्रष्टाचार कम करेगी और कल्याणकारी योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाएगी. लेकिन आधार के अनुभव ने तकनीकी व्यवस्था की सीमाएं भी उजागर कीं.

अर्थशास्त्री रीतिका खेड़ा और ज्यां द्रेज़ ने कल्याणकारी योजनाओं में दो तरह की त्रुटियों की ओर ध्यान दिलाया है. पहली, अपात्र लोगों का लाभार्थी बन जाना और दूसरी, वास्तविक पात्र लोगों का व्यवस्था से बाहर हो जाना. तकनीकी व्यवस्था पहली समस्या रोकने पर ज्यादा जोर देती है, जबकि दूसरी गलती किसी जरूरतमंद को राशन या पेंशन से वंचित कर सकती है.

‘रीथिंक आधार’ जैसे समूहों ने ऐसे मामले दर्ज किए हैं, जहां बुजुर्गों, मेहनतकश लोगों के फिंगरप्रिंट या ग्रामीण क्षेत्रों में खराब कनेक्टिविटी के कारण प्रमाणीकरण नहीं हो सका और लोगों को राशन या पेंशन नहीं मिली.

तकनीकी व्यवस्था विफल होने पर जिम्मेदारी भी अक्सर नागरिक पर आ जाती है. आधार सर्वर काम न करे या परीक्षा पोर्टल क्रैश हो जाए, तो नागरिक को ही दोबारा सत्यापन और सुधार की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है.

एक छात्र के लिए परीक्षा का मतलब

तकनीकी विशेषज्ञ के लिए परीक्षा लाखों उम्मीदवारों की छंटनी और रैंकिंग की व्यवस्था हो सकती है. लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश के छोटे किसान की बेटी, लातूर के दलित युवा या बिहार के सरकारी कॉलेज में पढ़ने वाले पहली पीढ़ी के विद्यार्थी के लिए परीक्षा सामाजिक गतिशीलता की सीढ़ी है.

जाति, वर्ग और क्षेत्रीय असमानताओं वाले समाज में प्रतियोगी परीक्षाएं वंचित पृष्ठभूमि के विद्यार्थियों को बेहतर भविष्य की उम्मीद देती हैं. इसलिए पेपर लीक होने पर केवल परीक्षा की गोपनीयता नहीं टूटती, बल्कि युवाओं और व्यवस्था के बीच भरोसा भी टूटता है.

भारतीय परीक्षा व्यवस्था के संकट के पीछे तीन बड़ी समस्याएं हैं.

पहली, शिक्षा और परीक्षाओं का अत्यधिक केंद्रीकरण. अलग-अलग राज्यों की शैक्षणिक परिस्थितियों को विशाल राष्ट्रीय परीक्षाओं में समेटकर एक केंद्रीय संस्था के जरिए संचालित करने से एक विफलता लाखों छात्रों को प्रभावित कर सकती है.

दूसरी, व्यावसायिक कोचिंग उद्योग का विस्तार. छात्रों की चिंता और प्रतिस्पर्धा पर खड़ा यह उद्योग शिक्षा को सीखने की प्रक्रिया से हटाकर रैंक हासिल करने की दौड़ में बदल रहा है.

तीसरी, संस्थागत कमजोरी. विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता, सार्वजनिक शिक्षा की स्थिति और शैक्षणिक नियुक्तियों से जुड़े सवालों के बीच लाखों विद्यार्थियों का भविष्य कुछ घंटों की परीक्षा पर निर्भर होता जा रहा है.

क्या एन्क्रिप्शन कोचिंग उद्योग का दबाव खत्म कर सकता है? क्या एल्गोरिदम विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता बहाल कर सकता है? यही वे सवाल हैं जिन्हें केवल तकनीकी समाधान से नहीं सुलझाया जा सकता.

सुधार की मेज पर कौन नहीं है?

प्रधानमंत्री की उच्चस्तरीय टास्क फोर्स की संरचना पर भी सवाल उठते हैं. इसमें तकनीक, विज्ञान, खुफिया तंत्र और नौकरशाही से जुड़े बड़े नाम हैं, लेकिन शिक्षा व्यवस्था से सीधे जुड़े कई वर्गों का प्रतिनिधित्व नहीं दिखाई देता.

शिक्षाविद, छोटे शहरों के विश्वविद्यालयों में पढ़ाने वाले शिक्षक, समाजशास्त्री और सबसे महत्वपूर्ण छात्र इस प्रक्रिया में कहां हैं? अगर शिक्षा सुधार में उसके मुख्य हितधारकों की भागीदारी नहीं होगी, तो सुधार का जोर शिक्षा को बेहतर बनाने के बजाय निगरानी और प्रबंधन मजबूत करने तक सीमित रह सकता है.

शिक्षा सुधार का रास्ता क्या हो?

परीक्षा व्यवस्था में भरोसा लौटाने के लिए केवल तकनीकी सुधार पर्याप्त नहीं होगा. इसके लिए लोकतांत्रिक भागीदारी, विकेंद्रीकरण और मूल्यांकन की पद्धति में बदलाव जरूरी है.

सरकार नौकरशाहों और तकनीकी विशेषज्ञों तक सीमित समिति के बजाय शिक्षाविदों, सार्वजनिक विश्वविद्यालयों के शिक्षकों, छात्र प्रतिनिधियों, राज्य परीक्षा बोर्डों और नागरिक समाज को शामिल करते हुए राष्ट्रीय शिक्षा एवं मूल्यांकन आयोग जैसी व्यवस्था बना सकती है. राज्यों में छात्रों और अभिभावकों के अनुभवों को सुनकर नीति निर्माण में शामिल किया जाना चाहिए.

दूसरा, केंद्रीकरण के बजाय विकेंद्रीकरण जरूरी है. ‘वन नेशन, वन एग्जाम’ जैसे मॉडल में परीक्षा की शक्ति एक केंद्रीय संस्था में केंद्रित होने से एक विफलता का असर लाखों विद्यार्थियों पर पड़ता है. राज्य विश्वविद्यालयों और क्षेत्रीय बोर्डों को अधिक अधिकार देकर राष्ट्रीय स्तर की कुछ परीक्षाओं पर निर्भरता कम की जा सकती है.

तीसरा, परीक्षाओं के मूल्यांकन का तरीका बदलना होगा. रटने और रैंक हासिल करने पर आधारित व्यवस्था में प्रश्नपत्र ऐसी वस्तु बन जाता है, जिसकी चोरी पूरी परीक्षा को प्रभावित कर सकती है. निरंतर मूल्यांकन, आलोचनात्मक सोच, ओपन-बुक परीक्षा और कई चरणों वाली मूल्यांकन प्रणाली जैसे विकल्पों पर विचार जरूरी है.

शिक्षा कोई सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म नहीं

लोकतांत्रिक व्यवस्था में भरोसा केवल सुरक्षित सर्वर से नहीं बनता. इसके लिए पारदर्शिता, संवेदनशीलता, संस्थागत जवाबदेही और भागीदारी जरूरी है.

दिल्ली, पटना और जयपुर की सड़कों पर प्रदर्शन करने वाले युवा केवल बेहतर तकनीकी प्लेटफॉर्म नहीं मांग रहे. उनकी मांग निष्पक्ष परीक्षा, गरिमा और जवाबदेह व्यवस्था की है.

नंदन नीलेकणी डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के कुशल प्रबंधक हो सकते हैं, लेकिन शिक्षा कोई सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म नहीं है और विद्यार्थी ऐसे ‘यूजर’ नहीं हैं जिन्हें बेहतर तकनीक से जोड़कर संकट खत्म किया जा सके. भारत के शिक्षा संकट का समाधान संस्थानों में भरोसा बहाल करने, जवाबदेही तय करने और छात्रों-शिक्षकों को सुधार प्रक्रिया में वास्तविक हिस्सेदारी देने में है.

लेखक: पायस फोजान, फोटो जर्नलिस्ट और पॉलिटिकल टेक समिट के सलाहकार.

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