दिल्ली दंगों की कथित बड़ी साजिश से जुड़े मामले में जेल में बंद कार्यकर्ता उमर खालिद और शरजील इमाम ने जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है. दोनों ने दिल्ली हाई कोर्ट के 30 सितंबर के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें उनकी जमानत याचिकाएं खारिज कर दी गई थीं. इस मामले में गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है, लेकिन अब तक सुनवाई शुरू नहीं हुई है.
'बार एंड बेंच' की रिपोर्ट के मुताबिक, शरजील इमाम ने अपनी याचिका में कहा है कि छह साल से अधिक समय तक विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में रहने के बावजूद अभियोजन पक्ष अब तक 47 संरक्षित गवाहों में से एक की भी गवाही दर्ज नहीं कर पाया है. उन्होंने तर्क दिया कि इस स्थिति में सुप्रीम कोर्ट की ओर से जमानत के लिए दोबारा आवेदन करने के संबंध में तय की गई शर्त पूरी होने की संभावना नहीं दिखती.
इस साल 5 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं. हालांकि, अदालत ने गुलफिशा फातिमा, मीरा हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को राहत दी थी. अपने आदेश में शीर्ष अदालत ने कहा था कि खालिद और इमाम अन्य आरोपियों की तुलना में अलग स्थिति में हैं. अदालत ने यह भी कहा था कि दोनों संरक्षित गवाहों की गवाही पूरी होने के बाद या एक साल बीतने पर, जो भी पहले हो, जमानत के लिए दोबारा आवेदन कर सकते हैं.
इसके बाद 30 सितंबर को दिल्ली हाई कोर्ट ने दोनों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं. हाई कोर्ट ने कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट के 5 जनवरी के आदेश में तय शर्तों को बदलने की स्थिति में नहीं है और न्यायिक अनुशासन के तहत उस आदेश का पालन करने के लिए बाध्य है. इसी फैसले को अब खालिद और इमाम ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है.
18 मई को सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने जनवरी में दिए गए अपने आदेश पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि आतंकवाद विरोधी कानून के तहत दर्ज मामलों में भी जमानत नियम है और जेल अपवाद. अदालत की यह टिप्पणी जमानत से जुड़े कानूनी सिद्धांतों और पूर्व में दिए गए फैसलों के संदर्भ में आई थी.
उमर खालिद, शरजील इमाम और अन्य कार्यकर्ताओं को जनवरी से सितंबर 2020 के बीच गिरफ्तार किया गया था. ये गिरफ्तारियां फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई सांप्रदायिक हिंसा के सिलसिले में की गई थीं. यह हिंसा नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के समर्थन और विरोध में प्रदर्शन कर रहे समूहों के बीच हुई थी. इस दौरान 53 लोगों की मौत हुई और सैकड़ों लोग घायल हुए थे. मृतकों में अधिकांश मुस्लिम थे.
इस मामले में आरोपियों पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के अलावा सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान से बचाने संबंधी कानून, शस्त्र अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप लगाए गए हैं.
दिल्ली पुलिस का आरोप है कि फरवरी 2020 की हिंसा एक बड़ी साजिश का हिस्सा थी. पुलिस के मुताबिक, नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ प्रदर्शनों का आयोजन करने वाले लोगों ने नरेंद्र मोदी सरकार की छवि खराब करने के उद्देश्य से हिंसा की योजना बनाई थी. यह पुलिस का आरोप है और मामले की सुनवाई अभी शुरू नहीं हुई है.
इमाम की याचिका में लंबे समय से हिरासत में रहने और संरक्षित गवाहों की गवाही शुरू नहीं होने को जमानत पर विचार के लिए अहम आधार बताया गया है. अब सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई के बाद ही स्पष्ट होगा कि दोनों को राहत मिलती है या नहीं.

