31 अक्टूबर को महाराष्ट्र सरकार का पूरा शीर्ष नेतृत्व नासिक में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के हाथों सिंहस्थ कुंभ के उद्घाटन समारोह में व्यस्त था. लगभग 20 करोड़ रुपये की लागत से आयोजित इस भव्य समारोह के दौरान मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने सोशल मीडिया पर 23 पोस्ट किए. इनमें से 19 पोस्ट भव्य आयोजनों और उत्सवों से जुड़े थे, लेकिन राज्य में मंडरा रहे भीषण सूखे के संकट पर एक भी शब्द नहीं था.
कुणाल पुरोहित की रिपोर्ट के अनुसार, उसी रात 11:08 बजे मुख्यमंत्री ने नासिक के राम कुंड पर 6,233 आदिवासियों द्वारा गोदा आरती कर बनाए गए एक नए ‘गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड’ की बधाई दी. लेकिन ठीक उसी रात, यवतमाल जिले के 45 वर्षीय किसान टीकाराम चव्हाण ने फांसी लगाकर अपनी जान दे दी. आठ एकड़ जमीन के मालिक टीकाराम ने इस साल खेती के लिए बैंक से 3 लाख रुपये का कर्ज लिया था. मानसून की बेरुखी, लंबे सूखे दौर और फसल की तबाही के कारण चढ़ते कर्ज के बोझ ने उन्हें खुदकुशी के रास्ते पर धकेल दिया.
महाराष्ट्र वर्तमान में पिछले पांच दशकों के सबसे गंभीर सूखे का सामना कर रहा है. किसान नेता किशोर तिवारी के आँकड़ों के अनुसार, विदर्भ में केवल छह दिनों के भीतर 10 किसानों ने जान दी है. इस साल जनवरी से जून के बीच अकेले अमरावती संभाग में 815 किसानों ने आत्महत्या की. वहीं, मराठवाड़ा में जनवरी से सितंबर तक 760 किसान अपनी जीवन लीला समाप्त कर चुके हैं, जिनमें से 108 मौतें अकेले सितंबर के महीने में हुईं.
सरकारी दावों और ज़मीनी हकीकत में भारी अंतर
विपक्ष ने इस मानवीय संकट के बीच कुंभ मेले के बुनियादी ढाँचे के लिए 35,000 करोड़ रुपये आवंटित करने और करोड़ों के भव्य आयोजनों की कड़ी आलोचना की है. कांग्रेस विधायक दल के नेता विजय वडेट्टीवार ने सवाल उठाया कि कुंभ की चकाचौंध पर खर्च करने के बजाय सरकार किसानों की दिवाली संवारने पर ध्यान क्यों नहीं देती? उन्होंने तंज कसते हुए पूछा, "क्या खुदकुशी करने वाले किसान हिंदू नहीं हैं?"
यद्यपि राज्य सरकार ने 358 में से 305 तहसीलों (राज्य का लगभग 85% हिस्सा) को सूखाग्रस्त घोषित किया है और प्रभावित किसानों को 5,000 रुपये की अग्रिम सहायता, फसल ऋण पुनर्गठन तथा बिजली बिलों में छूट का वादा किया है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है.
तिरज़ादा गाँव की 36 वर्षीय वैशाली येड़े का मामला इस तंत्र की खामियों को उजागर करता है. 2011 में 75,000 रुपये के कर्ज के कारण उनके पति ने आत्महत्या कर ली थी. पंद्रह साल बाद वैशाली फिर उसी मोड़ पर खड़ी हैं. दो एकड़ खेत में कपास बोने के लिए उन्होंने 1 लाख रुपये लगाए थे, लेकिन 10 क्विंटल की उम्मीद के मुकाबले महज 1.5 क्विंटल उपज हुई, जिससे उन्हें केवल 10,000 रुपये ही मिल सके. सरकार द्वारा मंजूर 5,000 रुपये की राहत राशि भी उनकी सास के खाते में जाएगी, क्योंकि ज़मीन का मालिकाना हक उन्हीं के नाम पर है. वैशाली कहती हैं, "यदि सरकार हमारे जैसे वास्तविक खेती करने वालों का ध्यान नहीं रखेगी, तो हमारे पास भूखों मरने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा."
इसके अलावा, कृषि विशेषज्ञ विजय जावंधिया का कहना है कि सरकारी राहत योजनाएँ केवल भूमिस्वामी किसानों तक सीमित हैं. राज्य के करीब 1.34 करोड़ भूमिहीन कृषि मजदूर—जो सूखे के कारण मजदूरी न मिलने से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं—इन योजनाओं के दायरे से पूरी तरह बाहर छूट गए हैं.
तेजी से सूखते जलस्रोत और गहराता संकट
पुरोहित की रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य में जल संकट तेजी से विकराल रूप ले रहा है. 3 नवंबर तक महाराष्ट्र के जलाशयों में जल स्तर सिमटकर कुल क्षमता का केवल 67% रह गया है, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 90.35% था. संकट के मुख्य केंद्र अमरावती (55%) और मराठवाड़ा (54%) में स्थिति बेहद चिंताजनक है.
भूजल सर्वेक्षण एवं विकास एजेंसी (जीएसडीए) के अनुसार, मराठवाड़ा के 875 कुओं का अध्ययन करने पर पाया गया कि अकेले अक्टूबर महीने में भूजल स्तर औसतन 4.39 मीटर नीचे गिर गया. धाराशिव जैसे जिलों में तो यह गिरावट 30 दिनों के भीतर 8.86 मीटर तक दर्ज की गई.
जल संकट और आर्थिक तंगी के चलते इस बार कई किसान रबी फसलों (गेहूँ और चना) की बुआई करने की स्थिति में भी नहीं हैं. सिंचाई की सुविधाओं के अभाव और सूखते कुओं के कारण किसान अब और वित्तीय जोखिम उठाने से डर रहे हैं. दिवाली के इस कठिन समय में आर्थिक बदहाली से जूझ रहे ग्रामीण परिवारों के लिए यह सूखा किसी युद्ध से कम साबित नहीं हो रहा है.

