डेटा | क्या भारत में क्षेत्रीय दल अपनी प्रासंगिकता खो रहे हैं?
हाल के दिनों के दो राजनीतिक घटनाक्रम भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों के भविष्य पर विचार करने के लिए मजबूर करते हैं: 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की हार और कई क्षेत्रीय दलों में देखी गई दलबदल की लहर. यहां तक कि इस बात पर भी सवाल उठे हैं कि क्या क्षेत्रीय दल प्रासंगिक स्थिति में बने रह सकते हैं, खासकर प्रस्तावित "एक राष्ट्र, एक चुनाव" ढांचे के संदर्भ में.
‘द हिंदू’ में विभा अत्री और संजय कुमार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि क्षेत्रीय दलों की चुनावी हार को समग्र रूप से उनके पतन के प्रमाण के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. वोट शेयर शायद किसी पार्टी के आधारभूत समर्थन का सबसे अच्छा संकेतक होता है. पिछले चार लोकसभा चुनावों के साथ-साथ राज्य विधानसभा चुनावों में भी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के वोट शेयर में बहुत अधिक बदलाव नहीं आया है. मतदाता लोकसभा चुनावों की तुलना में विधानसभा चुनावों में क्षेत्रीय दलों के लिए बहुत अधिक प्राथमिकता दिखाना जारी रखते हैं, जो राज्य-स्तरीय राजनीतिक पहचान के स्थायी महत्व को रेखांकित करता है.
इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि हाल के वर्षों में कई क्षेत्रीय दलों को दलबदल का सामना करना पड़ा है. तृणमूल में हार के बाद कई दलबदल देखे गए. इसी तरह, आम आदमी पार्टी के भी कई राज्यसभा सांसदों ने दलबदल किया, जबकि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार) ने भी महाराष्ट्र में दलबदल देखा. हालांकि ये घटनाक्रम संगठनात्मक कमजोरियों की ओर इशारा करते हैं, लेकिन दलबदल अपने आप में सिकुड़ते चुनावी समर्थन आधार का संकेत नहीं देता है.
बदलता राजनीतिक परिदृश्य
जहां तक वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य का सवाल है, भारतीय जनता पार्टी 11 राज्यों में अपने दम पर सत्तारूढ़ पार्टी है, जबकि कांग्रेस की तीन राज्यों में सरकारें हैं. क्षेत्रीय दल स्वतंत्र रूप से चार राज्यों में शासन कर रहे हैं. 10 अन्य राज्य ऐसे हैं जहां गठबंधन सरकारें सत्ता में हैं. इनमें से चार राज्यों में क्षेत्रीय दल प्रमुख भागीदार हैं, जबकि भाजपा सहयोगी भूमिका निभाती है (आंध्र प्रदेश, मेघालय, नागालैंड और पुडुचेरी). शेष छह राज्यों में, भाजपा क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन में सरकारों का नेतृत्व करती है (बिहार, उत्तर प्रदेश, असम, गोवा, महाराष्ट्र और त्रिपुरा). तीन राज्य ऐसे भी हैं जहां कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन सरकारों का हिस्सा है. झारखंड तथा जम्मू और कश्मीर में कांग्रेस छोटी गठबंधन साझेदार है. केरल में, कांग्रेस अन्य दलों के साथ गठबंधन सरकार का नेतृत्व करती है.
लगभग ढाई दशकों में क्षेत्रीय दलों द्वारा स्वतंत्र रूप से शासित राज्यों की यह सबसे कम संख्या है. 2015 और 2020 के बीच, क्षेत्रीय दलों ने किसी अन्य पार्टी के समर्थन की आवश्यकता के बिना स्वतंत्र रूप से नौ राज्यों पर शासन किया. ये आंकड़े निश्चित रूप से इस धारणा को समर्थन देते हैं कि क्षेत्रीय दल चुनावी और संगठनात्मक तनाव के दौर का सामना कर रहे हैं. हालांकि, भारत की 'फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट' (सबसे आगे रहने वाले की जीत) चुनावी प्रणाली अक्सर चुनावी जीत और हार को बड़ा करके दिखाती है. परिणामस्वरूप, क्षेत्रीय दलों के नेतृत्व वाली सरकारों की संख्या में गिरावट का मतलब यह नहीं है कि उनके चुनावी समर्थन में भी वैसी ही गिरावट आई है.
पिछले चार लोकसभा चुनावों के दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों को मिले वोटों का विश्लेषण अधिक सूक्ष्म तस्वीर प्रस्तुत करता है. पिछले चार लोकसभा चुनावों के दौरान राष्ट्रीय दलों का संयुक्त वोट शेयर 60.04% और 68.15% के बीच रहा है, जो दर्शाता है कि राजनीतिक परिणामों में बड़े बदलावों के बावजूद उनका समग्र चुनावी समर्थन अपेक्षाकृत स्थिर रहा है.
राष्ट्रीय दलों का सबसे कम संयुक्त वोट शेयर 2014 के लोकसभा चुनाव में दर्ज किया गया था, जब उन्हें कुल वोटों का 60.04% मिला था, जबकि सबसे अधिक 2019 के लोकसभा चुनाव में दर्ज किया गया था, जब बालाकोट हवाई हमलों की पृष्ठभूमि में हुए चुनाव में उन्होंने 68.15% वोट हासिल किए थे. महत्वपूर्ण बात यह है कि 2014 का चुनाव दर्शाता है कि भारत की चुनावी प्रणाली के तहत वोट शेयर और चुनावी परिणाम हमेशा एक साथ नहीं चलते. इन चार चुनावों में राष्ट्रीय दलों का सबसे कम संयुक्त वोट शेयर दर्ज करने के बावजूद, भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन ने निर्णायक बहुमत हासिल किया. सभी राष्ट्रीय दलों ने मिलकर 2009 और 2024 के लोकसभा चुनावों में क्रमशः 63.59% और 62.72% वोट हासिल किए, जो बताता है कि उनकी समग्र चुनावी उपस्थिति व्यापक रूप से स्थिर रही है.
क्षेत्रीय दलों ने लोकसभा चुनावों में डाले गए कुल वोटों का लगभग एक-तिहाई हिस्सा लगातार हासिल किया है, हालांकि विभिन्न चुनावों में इसमें थोड़ा उतार-चढ़ाव देखने को मिला है. 2009 और 2014 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने मिलकर क्रमशः 31.22% और 35.86% वोट हासिल किए. सबसे हालिया लोकसभा चुनाव में, क्षेत्रीय दलों को मिलाकर 33.52% वोट मिले; इसमें केवल 2019 का चुनाव अपवाद रहा, जब उन्हें 28.1% वोट मिले थे. ये आंकड़े बताते हैं कि भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों के अंत की बात करना अभी बहुत जल्दबाज़ी होगी. कुछ राज्यों में चुनावी झटकों के बावजूद, क्षेत्रीय दलों का एक बड़ा समर्थन आधार बना हुआ है. वोट शेयर का राज्यवार वितरण यह भी दिखाता है कि चुनावी प्रदर्शन में उतार-चढ़ाव के बावजूद कई राज्यों में क्षेत्रीय दल महत्वपूर्ण चुनावी समर्थन बनाए हुए हैं.
यह भी नहीं भूलना चाहिए कि तमिलनाडु में जहां द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) को चुनावी झटका लगा, वहीं उसकी जगह एक अन्य क्षेत्रीय दल ने ले ली. भारतीय राजनीति में राष्ट्रीय दलों का एक स्थिर स्थान है और यही बात क्षेत्रीय दलों के लिए भी सच प्रतीत होती है. क्षेत्रीय दलों के सामने चुनौती मतदाताओं के घटते समर्थन की नहीं, बल्कि सांगठनिक नवीनीकरण की है.

