एआई की ओर झुकाव और कमजोर मांग के कारण भारतीय आईटी कंपनियों की पहली तिमाही सुस्त रहने के आसार

‘एआई’ आधारित प्राइसिंग के दबाव, वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव (विशेषकर मध्य पूर्व का संकट) और ग्राहकों द्वारा कम खर्च किए जाने के कारण भारत के 315 बिलियन डॉलर के आईटी क्षेत्र की पहली तिमाही काफी सुस्त रहने की उम्मीद है. ‘रॉयटर्स’ के लिए हरिप्रिया सुरेश और भरत राजेश्वरन की रिपोर्ट के अनुसार, आमतौर पर मजबूत मानी जाने वाली इस तिमाही (अप्रैल-जून) के धीमे रहने से बाजार में सुधार (रिकवरी) की उम्मीदों को झटका लगा है.

हालांकि शीर्ष छह आईटी कंपनियों के राजस्व में 14% और शुद्ध लाभ में 12%-13% की वार्षिक वृद्धि दिखने का अनुमान है, लेकिन यह केवल रुपये के अवमूल्यन (मूल्य में गिरावट) के कारण है. यदि विनिमय दर के असर को हटाकर 'कॉन्स्टेंट-करेंसी' के रूप में देखा जाए, तो वास्तविक राजस्व वृद्धि केवल 2.8% ही रहने के आसार हैं. सिटी और जेपीमॉर्गन जैसे वैश्विक वित्तीय संस्थानों का मानना है कि निकट भविष्य में यह सुस्ती बरकरार रहेगी.

रिपोर्ट कहती है कि दुनिया भर में एआई टूल्स और एजेंट्स के बढ़ते उपयोग के कारण पारंपरिक, श्रम-प्रधान बिजनेस मॉडल खतरे में है. कंपनियों ने नई नियुक्तियों की गति धीमी कर दी है. टीसीएस के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन के अनुसार, भविष्य में कंपनी में मानव कर्मचारियों और एआई एजेंट्स की संख्या बराबर हो सकती है.

एआई के इस व्यवधान और मंदी के डर से 2026 में अब तक निफ्टी आईटी इंडेक्स लगभग 28% टूट चुका है, जिससे यह भारत का सबसे खराब प्रदर्शन करने वाला सेक्टर बन गया है. धीमी निर्णय प्रक्रिया के कारण राजस्व मिलने में देरी हो रही है. अब निवेशकों की नजरें कंपनियों के वार्षिक राजस्व अनुमानों पर हैं, जबकि अमेरिका में उच्च ब्याज दरों का खतरा भी बना हुआ है, जो भारतीय आईटी राजस्व का 60% हिस्सा देता है.

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