नवल शुक्ल | तीजन बाई अंत तक अपने ही लोगों के बीच रहीं. इतना सम्मान और प्रसिद्धि मिलने के बाद भी उनकी सहजता कभी नहीं बदली.

‘हरकारा डीप डाइव’ के इस लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी ने हिंदी और आदिवासी लोककलाओं के विशेषज्ञ नवल शुक्ल के साथ पंडवानी की महान कलाकार तीजन बाई के जीवन, संघर्ष और सांस्कृतिक विरासत पर विस्तार से बातचीत की. रायपुर के एम्स में लंबी बीमारी के बाद तीजन बाई के निधन के साथ भारतीय लोककला ने एक ऐसे स्वर को खो दिया है, जिसने महाभारत की कथा को छत्तीसगढ़ की मिट्टी, बोली और अभिनय के जरिए विश्व मंच तक पहुंचाया.

नवल शुक्ल ने बताया कि वर्ष 1982-83 में, जब छत्तीसगढ़ अविभाजित मध्य प्रदेश का हिस्सा था, तब पंडवानी को व्यवस्थित रूप से खोजने और उसे बड़े मंच तक पहुंचाने की शुरुआत हुई. उन्होंने याद किया कि गांव-गांव खोजबीन के दौरान एक छोटे से गांव में पहली बार तीजन बाई से मुलाकात हुई. मिट्टी के साधारण घर में रहने वाली यह युवा कलाकार अपनी दमदार आवाज, सहज व्यवहार और अद्भुत मंचीय उपस्थिति के कारण पहली मुलाकात में ही अलग दिखाई दीं. बाद में भारत भवन, भोपाल में आयोजित 'पंडवानी प्रसंग' ने इस लोककला को राष्ट्रीय पहचान दिलाई और वहीं से तीजन बाई की यात्रा नई ऊंचाइयों तक पहुंची.

बातचीत में नवल शुक्ल ने स्पष्ट किया कि पंडवानी केवल महाभारत का गायन नहीं है, बल्कि संगीत, अभिनय, संवाद, आंगिक अभिव्यक्ति और कथा-वाचन का अनूठा संगम है. उनके अनुसार, तीजन बाई की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने इस कला में स्त्री स्वर को नई शक्ति दी. द्रौपदी चीरहरण जैसे प्रसंगों की उनकी प्रस्तुति केवल अभिनय नहीं होती थी, बल्कि दर्शकों को ऐसा महसूस होता था मानो स्वयं द्रौपदी मंच पर न्याय की पुकार लगा रही हों. यही कारण था कि उनकी प्रस्तुति लोककला की सीमाओं से निकलकर एक सांस्कृतिक अनुभव बन गई.

नवल शुक्ल ने यह भी रेखांकित किया कि तीजन बाई ने अपनी सफलता के बावजूद अपनी जड़ों को कभी नहीं छोड़ा. देश-विदेश में सम्मान, बड़े मंचों और शीर्ष नेताओं से मुलाकातों के बाद भी वे अपने गांव और अपने लोगों के बीच उसी सादगी से रहीं. उन्होंने कहा, "मैं तीजन बाई को एक महान भारतीय स्त्री और महान भारतीय कलाकार के रूप में याद करूंगा. उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं था और पाने के लिए सब कुछ था. अपनी कला के बल पर उन्होंने लगभग सब कुछ हासिल किया."

बातचीत के अंत में दोनों वक्ताओं ने इस चिंता को भी सामने रखा कि तीजन बाई जैसी विरासत केवल स्मृतियों के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती. पंडवानी की परंपरा, उसके विभिन्न रूपों और कलाकारों का व्यवस्थित डिजिटल दस्तावेजीकरण समय की आवश्यकता है. तीजन बाई का जाना केवल एक कलाकार का निधन नहीं, बल्कि भारतीय लोकस्मृति के एक युग का अवसान है. अब यह जिम्मेदारी समाज, सांस्कृतिक संस्थाओं और सरकारों की है कि इस विरासत को आने वाली पीढ़ियों तक उसी जीवंतता के साथ पहुंचाया जाए.पूरी बातचीत यहाँ सुन सकते हैं.

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