भाजपा सरकार में भारत की अकादमिक स्वतंत्रता ‘गंभीर रूप से प्रतिबंधित’: रिपोर्ट
‘द हिंदू’ के मुताबिक, न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी से जुड़े अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क स्कॉलर्स एट रिस्क की वार्षिक ‘फ्री टू थिंक 2026’ रिपोर्ट ने भारत में अकादमिक स्वतंत्रता को ‘गंभीर रूप से प्रतिबंधित’ श्रेणी में रखा है. रिपोर्ट के अनुसार, भारत का अकादमिक स्वतंत्रता सूचकांक यानी एएफआई स्कोर 2015 में 0.41 से घटकर 2024 में 0.16 और 2026 में 0.14 हो गया. यह सूचकांक 0 से 1 के पैमाने पर अकादमिक और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शोध और शिक्षण की स्वतंत्रता, अकादमिक आदान-प्रदान, परिसर की स्वतंत्रता और संस्थागत स्वायत्तता जैसे मानकों को मापता है.
स्कॉलर्स एट रिस्क की स्थापना 1999 में हुई थी और इसके नेटवर्क में 40 देशों के 650 से ज्यादा विश्वविद्यालय, अकादमिक संगठन और शैक्षणिक संस्थान शामिल हैं. रिपोर्ट के अनुसार जुलाई 2025 से जून 2026 के बीच 59 देशों और क्षेत्रों में अकादमिक स्वतंत्रता से जुड़े 321 सत्यापित घटनाक्रमों में 382 हमले दर्ज किए गए. इनमें भारत में 42 मामले सामने आए, जो किसी भी देश के लिए सबसे अधिक थे. इनमें हिंसा, गिरफ्तारी और शिक्षकों या छात्रों का पद गंवाना शामिल था.
रिपोर्ट में कहा गया है कि केंद्र सरकार ने उच्च शिक्षा पर अपना प्रभाव बढ़ाया है और विश्वविद्यालयों के प्रशासन, नेतृत्व नियुक्तियों और अकादमिक प्राथमिकताओं को प्रभावित किया है. विश्वविद्यालय प्रशासन पर परिसर में बहस सीमित करने, शिक्षकों को हटाने, अकादमिक कार्यक्रम रद्द करने और छात्रों की अभिव्यक्ति पर नई पाबंदियां लगाने के आरोप दर्ज किए गए हैं. विरोध प्रदर्शनों और अन्य कैंपस गतिविधियों में छात्रों और पुलिस के बीच हिंसा के मामले भी सामने आए.
रिपोर्ट ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी को उच्च शिक्षा पर सरकारी प्रभाव का एक प्रमुख माध्यम बताया है. इसमें कुलपतियों की नियुक्ति के लिए अकादमिक योग्यता संबंधी नियमों में ढील और गैर-स्थायी तथा संविदा शिक्षकों पर 10 प्रतिशत की सीमा हटाने जैसी नीतियों को लेकर चिंता जताई गई है.
जम्मू-कश्मीर में 25 किताबों की बिक्री, वितरण और रखने पर प्रतिबंध का भी उल्लेख किया गया है. इन किताबों में कश्मीर के राजनीतिक-सामाजिक इतिहास, जबरन गायब किए जाने और महिला प्रतिरोध जैसे विषयों पर लिखी गई रचनाएं शामिल थीं.
शिक्षकों पर कार्रवाई के उदाहरणों में आईआईटी गांधीनगर के अतिथि प्रोफेसर मिशेल डैनिनो का मामला शामिल है. रिपोर्ट के मुताबिक, एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के संदर्भ को लेकर तीन शिक्षाविदों पर पाठ्यक्रम विकास के लिए सार्वजनिक फंडिंग पाने पर प्रतिबंध लगाया गया और डैनिनो को उनके पद से हटा दिया गया.
साउथ एशियन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर स्नेहाशीष भट्टाचार्य को 2025 में दो साल के निलंबन के बाद विश्वविद्यालय ने बर्खास्त कर दिया. उन्होंने 2022 में छात्र विरोध प्रदर्शनों से निपटने के विश्वविद्यालय के तरीके पर चिंता जताने वाले पत्र पर हस्ताक्षर किए थे. एसआरएम इंस्टीट्यूट के प्रोफेसर लोरा संथाकुमार को पाकिस्तान में भारतीय सैन्य कार्रवाई से हुई नागरिक मौतों पर आलोचनात्मक सोशल मीडिया पोस्ट के बाद नौकरी से हटाए जाने का उल्लेख भी रिपोर्ट में है. जामिया मिल्लिया इस्लामिया में प्रोफेसर वीरेंद्र बालाजी शाहरे को भारत में मुस्लिम अल्पसंख्यकों के खिलाफ अत्याचार पर सवाल पूछने के मामले में निलंबित किया गया.
छात्र आंदोलनों पर भी रिपोर्ट ने चिंता जताई है. टीआईएसएस और जामिया में शांतिपूर्ण प्रदर्शनों में शामिल छात्रों के खिलाफ कार्रवाई का उल्लेख किया गया है. दिल्ली विश्वविद्यालय ने एक समय सार्वजनिक बैठक, रैली और प्रदर्शन पर व्यापक रोक लगाई थी और बाद में प्रदर्शनों के लिए 72 घंटे पहले अनुमति लेना अनिवार्य किया.
रिपोर्ट के अनुसार पिछले दशक में 179 देशों में से 50 में अकादमिक स्वतंत्रता में महत्वपूर्ण गिरावट आई है. इस रिपोर्ट में नौ देशों या क्षेत्रों को ‘पूरी तरह प्रतिबंधित’ और भारत समेत छह को ‘गंभीर रूप से प्रतिबंधित’ श्रेणी में रखा गया है.

