कीमतों की मार के बीच ब्याज दरों में कटौती की उम्मीदें हुईं हवा; दोबारा सिर उठाती महंगाई बनी बड़ा खतरा

‘द टेलीग्राफ’ में परन बालकृष्णन ने भारत और वैश्विक स्तर पर दोबारा सिर उठा रही महंगाई तथा उसके कारण उत्पन्न होने वाली आर्थिक चुनौतियों का विश्लेषण किया है. उनका मानना है कि वर्तमान स्थितियों को देखते हुए आम जनता के लिए सस्ते कर्ज की उम्मीदें पूरी तरह समाप्त होती दिख रही हैं और रिजर्व बैंक द्वारा आगामी दिनों में ब्याज दरों को बढ़ाने के संकेत मिल रहे हैं.

जून महीने में भारत की खुदरा महंगाई (कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स) बढ़कर 4.38 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो मई में 3.93 प्रतिशत थी. यह आंकड़ा अर्थशास्त्रियों के अनुमानों से कहीं अधिक है और पिछले 18 महीनों में पहली बार इसने भारतीय रिजर्व बैंक के 4 प्रतिशत के संतोषजनक लक्ष्य को पार किया है.

इस वृद्धि का सबसे प्रमुख कारण खाद्य महंगाई है, जो जून में बढ़कर 5.32 प्रतिशत हो गई. चूंकि भारत के कंज्यूमर बास्केट में खाद्य पदार्थों का हिस्सा एक-तिहाई से अधिक है, इसलिए इस उछाल ने आम परिवारों के बजट को बुरी तरह प्रभावित किया है. इसके साथ ही, देश में दक्षिण-पश्चिम मानसून के असमान रहने के कारण फसलों की आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका है, जिससे खाद्य कीमतें आगे भी ऊंची रह सकती हैं. कोटक महिंद्रा बैंक की मुख्य अर्थशास्त्री उपासना भारद्वाज के अनुसार, इस वर्ष की दूसरी छमाही में आरबीआई द्वारा ब्याज दरों में 50 आधार अंकों की बढ़ोतरी की जा सकती है.

महंगाई बढ़ने में अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों की भी बड़ी भूमिका है.  अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण वैश्विक तेल बाजार में भारी अनिश्चितता पैदा हो गई है. होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल की आपूर्ति बाधित होने के डर से ब्रेंट क्रूड 6 प्रतिशत से अधिक उछलकर 80 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है.

मुथूट फिनकॉर्प के मुख्य अर्थशास्त्री अपूर्व जावड़ेकर के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में आए इस उछाल से उत्पादक और थोक महंगाई बढ़ेगी. इसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं पर पड़ना शुरू भी हो चुका है, क्योंकि एफएमसीजी कंपनियों ने लागत का 5 से 7 प्रतिशत बोझ ग्राहकों पर डालना शुरू कर दिया है. स्थिति को देखते हुए आरबीआई ने चालू वित्त वर्ष के लिए महंगाई का अनुमान बढ़ाकर 5.1 प्रतिशत कर दिया है.

वैश्विक स्तर पर, अमेरिकी फेडरल रिजर्व के गवर्नर क्रिस्टोफर वालर ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि वे महंगाई के कम होने का हाथ पर हाथ धरकर इंतजार नहीं कर सकते. यदि मूल्य दबाव ऐसे ही बना रहा, तो अमेरिकी केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में फिर से बढ़ोतरी करेगा.

अमेरिका में मुख्य उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) 4.2 प्रतिशत पर है, जो उनके 2 प्रतिशत के लक्ष्य से दोगुने से भी अधिक है. वालर का मानना है कि महंगाई केवल तेल की कीमतों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे टैरिफ, माल की बढ़ती कीमतें और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) क्रांति के कारण पैदा हुई भारी मांग जैसे बुनियादी कारण भी शामिल हैं. बाजार के जानकारों का अनुमान है कि अमेरिका में अगले साल अप्रैल तक दो बार ब्याज दरें बढ़ाई जा सकती हैं.

भारत पर प्रभाव और 'दोहरी मुसीबत'

इस वैश्विक और घरेलू संकट का भारत पर दोहरा असर पड़ रहा है. एक तो व्यापार घाटा बढ़ रहा है और दूसरा, भारतीय रुपये पर दबाव में भी वृद्धि होने की संभावना है. भारी आयात के कारण जून में भारत का व्यापार घाटा उम्मीद से कहीं अधिक बढ़कर $30.4 बिलियन (अरब डॉलर) ह  गया है, जो मई में $28.2 बिलियन था. अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने और भारत के साथ उसका अंतर बढ़ने से भारतीय रुपये की कीमत में गिरावट आ सकती है.

चूंकि भारत अपनी जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए रुपये के कमजोर होने से कच्चा तेल, फर्टिलाइजर और इलेक्ट्रॉनिक्स का आयात और महंगा हो जाएगा, जिससे देश में महंगाई का एक नया चक्र शुरू हो सकता है.

कुलमिलाकर, वैश्विक तेल संकट, अमेरिका में बढ़ती ब्याज दरें और भारत का बढ़ता व्यापार घाटा मिलकर एक बेहद चुनौतीपूर्ण स्थिति का निर्माण कर रहे हैं. इन विपरीत परिस्थितियों के कारण भारतीय रिजर्व बैंक के लिए निकट भविष्य में ब्याज दरों में कटौती करना असंभव प्रतीत होता है, जिसके चलते आम उपभोक्ताओं के लिए सस्ता कर्ज मिलना अब बहुत दूर की बात हो गई है.

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