निर्वासित लेखिका तस्लीमा नसरीनकी 19 साल बाद कोलकाता वापसी

बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन 19 साल के लंबे अंतराल के बाद कोलकाता लौटने वाली हैं. वह 1 अगस्त को रवींद्र सदन में 'सेक्युलर मिशन एंड ह्यूमन राइट्स' और 'बांग्लादेश फ्रीडम फाइटर्स फाउंडेशन' द्वारा धार्मिक कट्टरपंथ के खिलाफ आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में भाग लेंगी. आयोजकों ने उन्हें कट्टरपंथ के खिलाफ प्रतिरोध का प्रतीक बताया है. पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेन्दु अधिकारी ने उनकी सुरक्षा का आश्वासन दिया है, और वे स्वयं वित्त मंत्री स्वपन दासगुप्ता के साथ कार्यक्रम में मंच पर उपस्थित रहेंगे.

अग्निवो नियोगी के अनुसार, तस्लीमा नसरीन महिलाओं के अधिकारों और धार्मिक कट्टरपंथ पर अपने बेबाक लेखन के कारण 1994 से ही बांग्लादेश से निर्वासित हैं. स्वीडन की नागरिकता मिलने के बाद वे यूरोप और अमेरिका में रहीं, लेकिन बंगाल से सांस्कृतिक जुड़ाव के कारण वे 2004 में रेसिडेंस परमिट मिलने पर कोलकाता में बस गईं. हालांकि, उनका प्रवास हमेशा विवादों में घिरा रहा. 2003 में उनकी पुस्तक 'द्विखंडितो' पर तत्कालीन वामपंथी सरकार ने प्रतिबंध लगाया था, जिसे बाद में हाई कोर्ट ने हटा दिया.

कट्टरपंथी संगठनों द्वारा लगातार विरोध के बीच, साल 2007 में विवाद चरम पर पहुंच गया. हैदराबाद में उन पर हमला हुआ और नवंबर 2007 में कोलकाता में उनके खिलाफ बड़े पैमाने पर हिंसक प्रदर्शन हुए. शहर में कानून-व्यवस्था बहाल करने के लिए सेना तैनात करनी पड़ी. बढ़ते राजनीतिक दबाव के कारण बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार ने उन्हें चुपचाप कोलकाता से बाहर भेज दिया. उन्हें पहले जयपुर और फिर दिल्ली ले जाया गया. बाद में, तत्कालीन विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी के अनुरोध पर वे 2008 में स्वीडन चली गईं.

तस्लीमा बाद में लॉन्ग-टर्म वीजा पर भारत तो लौटीं, लेकिन ममता बनर्जी की सरकार ने उन्हें कोलकाता आने की अनुमति नहीं दी, जिसके कारण उन्हें दिल्ली में रहना पड़ा. बांग्लादेश में आज भी उनकी किताबें प्रतिबंधित हैं. अब पश्चिम बंगाल में हुए हालिया सत्ता परिवर्तन (तृणमूल कांग्रेस की विदाई और भाजपा के सत्ता में आने) के बाद तस्लीमा की कोलकाता वापसी संभव हो सकी है.

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