एक समुदाय, सौ नाम: जातीय जनगणना में सही गिनती कैसे होगी?

'द मूकनायक' में दुंद्रा कुमार स्वामी ने प्रस्तावित जातीय जनगणना में जाति पहचान दर्ज करने की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि एक ही समुदाय अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है. ऐसे में यदि हर नाम को अलग प्रविष्टि के रूप में दर्ज किया गया तो राष्ट्रीय स्तर पर उस समुदाय की वास्तविक संख्या तय करना मुश्किल हो सकता है.

भारत की जाति व्यवस्था सामाजिक, भाषाई और क्षेत्रीय स्तर पर बेहद जटिल है. एक ही समुदाय की पहचान अलग-अलग राज्यों, जिलों और यहां तक कि पड़ोसी गांवों में अलग नामों से हो सकती है. कहीं लोग व्यापक जाति समूह का नाम इस्तेमाल करते हैं तो कहीं उपजाति या स्थानीय पहचान का. नाम अलग हो सकते हैं, लेकिन सामाजिक समूह एक ही हो सकता है.

समस्या तब और बढ़ जाती है जब उच्चारण, वर्तनी और स्थानीय इस्तेमाल में अंतर भी जुड़ जाता है. यदि एक ही सामाजिक समूह के 10 लोग अपनी पहचान 10 अलग-अलग नामों से दर्ज करते हैं तो आंकड़ों की व्यवस्था कैसे तय करेगी कि ये 10 अलग समुदाय हैं या एक ही समुदाय के अलग नाम?

खुले सवाल और आंकड़ों की चुनौती

प्रस्तावित जातीय जनगणना में खुले तौर पर जाति का नाम लिखने की व्यवस्था को लेकर कांग्रेस ने चिंता जताई है. सवाल केवल यह नहीं है कि व्यक्ति से जाति का नाम कैसे पूछा जाएगा, बल्कि यह भी है कि उसके जवाब को राष्ट्रीय डेटाबेस में किस तरह दर्ज, वर्गीकृत और जोड़ा जाएगा.

व्यक्ति को अपनी सामाजिक पहचान खुद बताने का अधिकार महत्वपूर्ण है. इससे भारत की वास्तविक सामाजिक विविधता सामने आ सकती है. लेकिन केवल स्व-पहचान से सांख्यिकीय समस्या हल नहीं होती. एक ऐसी व्यवस्था भी जरूरी होगी जो अलग-अलग नामों को पहचान सके, उनकी पुष्टि कर सके और समान सामाजिक समूहों को एक साथ वर्गीकृत कर सके.

यदि कोई व्यक्ति अपनी पहचान बिल्कुल सही तरीके से दर्ज करता है, लेकिन डेटाबेस उस नाम को उसी समुदाय की दूसरी प्रविष्टियों से जोड़ नहीं पाता, तो गलती व्यक्ति की नहीं बल्कि व्यवस्था की होगी.

एक नाम की गलती, पूरे आंकड़े पर असर

जनगणना में दर्ज हर व्यक्ति की जानकारी अंततः राष्ट्रीय आंकड़ों का हिस्सा बनती है. शुरुआती स्तर पर हुई छोटी-सी गलती भी बाद में बड़े स्तर पर वर्गीकरण और आंकड़ों के जोड़ पर असर डाल सकती है.

यदि एक ही जाति के लोग अलग-अलग नामों के तहत दर्ज होते हैं और उन नामों को सही तरीके से एक साथ नहीं जोड़ा जाता, तो उस समुदाय की कुल आबादी वास्तविक संख्या से कम दिखाई दे सकती है. इसके बाद उस आंकड़े के आधार पर बनने वाली नीतियों और फैसलों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठेंगे.

खास तौर पर सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े तथा छोटे समुदायों के लिए यह समस्या महत्वपूर्ण है. किसी समुदाय का अस्तित्व केवल इसलिए खत्म नहीं हो जाता कि उसके लोग अलग-अलग नामों से दर्ज किए गए हैं. लेकिन यदि आधिकारिक आंकड़ों में उसे सही तरीके से पहचाना नहीं गया तो उसकी सामाजिक स्थिति, आबादी और जरूरतों को समझना कठिन हो जाएगा.

उपजाति और व्यापक जाति में अंतर

जातीय जनगणना में एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी होगा कि किसी स्थानीय या उपजातीय पहचान को व्यापक जाति श्रेणी से कैसे जोड़ा जाएगा. अलग-अलग राज्यों में इस्तेमाल होने वाले नामों को एक समान राष्ट्रीय वर्गीकरण में कैसे लाया जाएगा?

इसके लिए एक स्पष्ट और वैज्ञानिक वर्गीकरण व्यवस्था की जरूरत होगी. सवाल यह है कि क्या जनगणना शुरू होने से पहले एक मानकीकृत संदर्भ सूची तैयार की जाएगी या लोगों को अपनी पहचान स्वतंत्र रूप से दर्ज करने दी जाएगी और बाद में वैज्ञानिक प्रक्रिया के जरिए अलग-अलग नामों को एक साथ जोड़ा जाएगा.

इस प्रक्रिया में सांख्यिकीविदों, समाजशास्त्रियों, सामाजिक वैज्ञानिकों, समुदायों के प्रतिनिधियों और राज्य सरकारों की भागीदारी महत्वपूर्ण हो सकती है.

पारदर्शिता और वैज्ञानिक व्यवस्था जरूरी

एक विश्वसनीय राष्ट्रीय जातीय जनगणना के लिए केवल करोड़ों लोगों के जवाब इकट्ठा करना पर्याप्त नहीं होगा. ऐसी तकनीकी और पारदर्शी व्यवस्था चाहिए जो अलग-अलग नामों के पीछे मौजूद समान सामाजिक वास्तविकता को पहचान सके.

क्षेत्रीय नाम, उपजातियां, भाषाई अंतर और स्थानीय पहचान अगर अलग-अलग सामाजिक समूहों के रूप में दर्ज हो गईं तो देश की जातीय संरचना की तस्वीर खंडित और गलत हो सकती है. इसलिए वर्गीकरण के मानक पहले से स्पष्ट होना जरूरी है.

संसद में होने वाली बहस को केवल सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक टकराव तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए. असली सवाल प्रक्रिया से जुड़े हैं. जाति के नाम कैसे दर्ज होंगे? अलग-अलग प्रविष्टियों की जांच कैसे होगी? कौन तय करेगा कि कई नाम एक ही सामाजिक समूह को दर्शाते हैं? राज्यों के बीच मौजूद अंतर को कैसे जोड़ा जाएगा? और जनता को यह भरोसा कैसे दिलाया जाएगा कि अंतिम आंकड़े भारत की सामाजिक विविधता को सही ढंग से दिखाते हैं?

जातीय जनगणना किसी फॉर्म में केवल एक कॉलम भरने की प्रक्रिया नहीं है. यह आंकड़ों के माध्यम से भारत की जटिल सामाजिक संरचना को समझने का प्रयास है. इसलिए इसकी प्रक्रिया और तकनीकी व्यवस्था उतनी ही महत्वपूर्ण है जितना स्वयं जातीय जनगणना कराने का फैसला.

यदि एक ही समुदाय जनगणना में सौ अलग-अलग नामों में बंट जाता है, तो नुकसान केवल उसकी संख्या का नहीं होगा. आधिकारिक रिकॉर्ड में उस समुदाय की सामूहिक पहचान और उसकी वास्तविक सामाजिक मौजूदगी भी कमजोर पड़ सकती है.

(दुंद्रा कुमार स्वामी हाई कोर्ट के अधिवक्ता हैं.)

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