पीएम आवास के पास से सैकड़ों लोगों को बेदखल किया गया था; अब, दिल्ली ‘एसआईआर’ की हकीकत से उनका सामना हुआ है

यह मामला दिल्ली के रेस कोर्स (प्रधानमंत्री आवास के पास) से बेदखल किए गए सैकड़ों परिवारों की प्रशासनिक और नागरिक समस्याओं को रेखांकित करता है. दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्देश पर सुरक्षा और रक्षा बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए 14 जून को भाई राम (बीआर) कैंप, डीआईडी कैंप और मस्जिद कैंप में तोड़फोड़ अभियान चलाया गया था.

‘पीटीआई और टेलीग्राफ वेब डेस्क’ के अनुसार, इन विस्थापित परिवारों को वहां से लगभग 45 किलोमीटर दूर 'सावदा घेवरा' में दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड (डीयूएसआईबी) के फ्लैटों में बसाया गया है. पुनर्वास के दो महीने बाद भी ये लोग जीवन को सामान्य बनाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं. वर्तमान में इनकी सबसे बड़ी व्यावहारिक समस्या यह है कि दिल्ली में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान के तहत वे अपना नया पता कैसे पंजीकृत कराएं और उन्हें मतदाता फॉर्म कहाँ से मिलेगा.

77 वर्षीय बुजुर्ग दुकानदार लल्लू जाइक और उनकी 73 वर्षीय पत्नी उमा देवी इस प्रशासनिक भ्रम के बड़े भुक्तभोगी हैं. जाइक के सामने यह यक्ष प्रश्न है कि वे फॉर्म पर कौन सा पता दर्ज करें, क्योंकि उनका पुराना घर अब मलबे में तब्दील हो चुका है.

इस प्रक्रिया को पूरा करने में विस्थापितों के सामने गंभीर चुनौतियाँ आ रही हैं. मसलन, पुरानी बस्ती (रेस कोर्स) सावदा घेवरा से 45 किमी दूर है, जहाँ एक तरफ का किराया ही करीब 500 रुपये आता है. निर्धन परिवारों के लिए सिर्फ एक फॉर्म के चक्कर में इतनी बड़ी रकम खर्च करना मुमकिन नहीं है. उमा देवी जैसे वृद्ध और बीमार लोग (जो पैरों की सूजन के कारण चलने-फिरने में असमर्थ हैं) के लिए इतनी लंबी यात्रा करना असंभव है. उमा देवी पिछले साल भी विधानसभा चुनाव में वोट नहीं दे पाई थीं, क्योंकि उनका नाम उन्हें बिना बताए मतदाता सूची से काट दिया गया था. अब नए स्थान पर भी उनके सामने दोबारा यही खतरा मंडरा रहा है.

दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी आलोक कुमार ने पहले यह स्वीकार किया था कि हालिया तोड़फोड़ के कारण बूथ स्तर के अधिकारियों को खाली ज़मीन मिलेगी, जिससे सत्यापन मुश्किल होगा. उन्होंने इसे "विशेष मामला" मानकर निर्वाचन आयोग से चर्चा करने की बात कही थी, लेकिन ज़मीन पर कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं पहुंचे.

पुरानी बस्ती के एक बीएलओ (मोहन) के अनुसार, विस्थापित लोगों के नाम अभी तुरंत सूची से नहीं हटाए गए हैं. नियमों के मुताबिक, जिनके घर ढह चुके हैं या जिन्हें नए फ्लैट की अलॉटमेंट स्लिप मिल गई है, उन्हें पुरानी जगह पर गणना फॉर्म नहीं दिया जा सकता क्योंकि वे अब उस निर्वाचन क्षेत्र का हिस्सा नहीं रहे. मतदाताओं को स्वयं 'फॉर्म 8' (पता बदलने का फॉर्म) भरना होगा. जब नए पते का सत्यापन हो जाएगा, तो उनका नाम स्वचालित रूप से नए क्षेत्र में स्थानांतरित (शिफ्ट) कर दिया जाएगा.

अधिकारियों द्वारा उचित मार्गदर्शन न मिलने के कारण पुनर्वास कॉलोनी में भारी भ्रम की स्थिति है. इसके अतिरिक्त, सावदा घेवरा के कई हिस्सों में मोबाइल कनेक्टिविटी बेहद खराब है, जिससे लोग अधिकारियों से संपर्क नहीं कर पा रहे हैं. इस प्रशासनिक शून्यता के बीच लोग राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर निर्भर हैं.

कुलमिलाकर, कड़वी हकीकत यह है कि कागज़ पर 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (एसआईआर) का उद्देश्य मतदाता सूचियों को त्रुटिहीन और साफ-सुथरा बनाना है, लेकिन वास्तविक धरातल पर देश भर के लाखों नागरिक इसकी जटिलताओं के कारण अपने मताधिकार से वंचित हो जाते हैं.

इससे भी बड़ी विडंबना यह है कि मतदाता सूची से नाम कटना सिर्फ राजनीतिक अधिकार का नुकसान नहीं है, बल्कि इसके कारण गरीब लोग बुनियादी सरकारी योजनाओं और राशन/वित्तीय सहायता के लाभ से भी हाथ धो बैठते हैं. उदाहरण के तौर पर, बंगाल में सरकार ने उन महिलाओं को 'अन्नपूर्णा भंडार' की आर्थिक सहायता देने से मना कर दिया है, जिनके नाम इस एसआईआर प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से कट गए हैं. यह स्थिति दर्शाती है कि प्रशासनिक नीतियां किस प्रकार बेघर हुए कमज़ोर वर्ग को दोहरी मार देती हैं.

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