आसिम अली | ज़मीनी हकीकत बदल चुकी है

‘द टेलीग्राफ’ में आसिम अली का यह विश्लेषणात्मक लेख 2011 से 2026 के बीच भारतीय राजनीति की 'वैधता के बदलते मानदंडों' को गहराई से रेखांकित करता है. अली राजनीति विज्ञान और दर्शन के सिद्धांतों के साथ लेख की शुरुआत करते हैं और महात्मा गांधी के विचारों का संदर्भ देते हुए कहते हैं कि मूल रूप से सभी राज्य (सरकारें) "आत्माहीन मशीनें" होती हैं, जिनका अंतिम नियंत्रण हिंसा और बल प्रयोग पर टिका होता है.

हालाँकि, समाजशास्त्री मैक्स वेबर के सिद्धांत के अनुसार, कोई भी आधुनिक राज्य केवल भय या ज़बरदस्ती के दम पर लंबे समय तक शासन नहीं चला सकता. इसके लिए 'वैधता' की आवश्यकता होती है, जिसका अर्थ है—शासित जनता की सक्रिय सहमति. यह सहमति केवल पांच साल में एक बार चुनाव करा देने से हासिल नहीं होती, बल्कि इसके लिए राज्य को रोज़मर्रा के स्तर पर समाज के विभिन्न वर्गों की मांगों के प्रति संवेदनशील होना पड़ता है, जनता की समस्याओं के प्रति सहानुभूतिपूर्वक जवाबदेही प्रदर्शित करनी पड़ती है और एक 'आत्माहीन संस्था' होने के बावजूद निरंतर यह नाटक या प्रदर्शन करना पड़ता है कि राज्य के पास एक नैतिक अंतरात्मा है.

नरेंद्र मोदी सरकार का दृष्टिकोण और जनता की बेरुखी

लेखक का तर्क है कि मौजूदा नरेंद्र मोदी सरकार पारंपरिक राज्य व्यवस्था के इस 'नैतिक दिखावे' की परवाह नहीं करती. यह सरकार पीड़ित और असंतुष्ट वर्गों की चीख-पुकार के प्रति एक अनूठी और निष्ठुर उदासीनता प्रदर्शित करती है. सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि इस बेपरवाह रवैये के बावजूद सरकार को कोई गंभीर राजनीतिक नुकसान या परिणाम नहीं भुगतना पड़ता.

इसके उदाहरण के रूप में लेखक अतीत की कई घटनाओं को रेखांकित करते हैं:

नोटबंदी: जनता को हुई भारी असुविधा के बावजूद राजनीतिक लाभ बरकरार रहा.

सीएए विरोधी आंदोलन और पहलवानों का प्रदर्शन: सरकार अपने रुख पर अड़ी रही और कोई बड़ी राजनीतिक क्षति नहीं हुई.

किसान आंदोलन: एक साल से अधिक समय तक चले कड़े विरोध के बाद ही सरकार ने कदम पीछे खींचे, लेकिन तब भी उसकी वैधता पर कोई संकट नहीं आया.

वर्तमान परिप्रेक्ष्य (2026) में जंतर-मंतर पर चल रहे कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के युवाओं के विरोध प्रदर्शन का उल्लेख है. नीट पेपर लीक और उसके कारण हुए कई छात्रों की आत्महत्याओं के बावजूद सरकार प्रदर्शनकारियों से बातचीत करने तक को तैयार नहीं है. अली सवाल उठाते हैं कि सरकार के इस अहंकारी और शाही व्यवहार के बाद भी जनता में कोई ऐसा बड़ा आक्रोश क्यों नहीं भड़का, जिससे सरकार के सामने 'वैधता का संकट' खड़ा हो जाता?

 2011 का अन्ना आंदोलन: एक ऐतिहासिक तुलना

इस अनुत्तरित प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए लेखक हमें 15 वर्ष पीछे, यानी 2011 की गर्मियों में ले जाते हैं, जब भारतीय राज्य को अंतिम बार एक वास्तविक 'वैधता के संकट' का सामना करना पड़ा था. आज की युवा पीढ़ी (जेन ज़ी) के लिए यह समझना कठिन हो सकता है कि कैसे अन्ना हजारे नामक एक गुमनाम गांधीवादी कार्यकर्ता और उनकी बेतरतीब टीम ने देश की सबसे शक्तिशाली तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार को घुटनों पर ला दिया था.

अन्ना आंदोलन ने भ्रष्टाचार के घोटालों (जैसे 2G, कोयला घोटाला आदि) पर जनता के गुस्से को सरकार के खिलाफ एक पूर्ण वैधता संकट में बदल दिया. इसके परिणामस्वरूप, संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार तकनीकी रूप से तीन साल और चली, लेकिन वह अपना शासन करने का नैतिक अधिकार पूरी तरह खो चुकी थी.

अन्ना आंदोलन की सफलता के तीन मुख्य स्तंभ

अन्ना आंदोलन केवल एक जन-विद्रोह नहीं था, बल्कि उसे तत्कालीन व्यवस्था के तीन प्रमुख सामाजिक अभिनेताओं (सोशल एक्टर्स) का भरपूर समर्थन प्राप्त था:

कॉरपोरेट टेलीविजन मीडिया: मुख्यधारा के टीवी मीडिया ने इस आंदोलन को 24 घंटे लगातार कवरेज दिया. उन्होंने इसे एक कमज़ोर नागरिक (डेविड) और एक महाशक्तिशाली व भ्रष्ट राज्य (गोलियत) के बीच की एक न्यायपूर्ण और शानदार लड़ाई के रूप में पेश किया.

नागरिक समाज के दिग्गज (सेलेब्रिटीज़): देश के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों, सैन्य अधिकारियों और आमिर खान, रजनीकांत व कपिल देव जैसी बड़ी हस्तियों ने आंदोलन को नैतिक विश्वसनीयता प्रदान की.

शिक्षित मध्यमवर्गीय युवा: मंडल आयोग के दौर के बाद पहली बार शिक्षित और मध्यमवर्गीय युवा नए-नए उभरते सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के माध्यम से बहुत बड़े पैमाने पर सड़कों पर लामबंद हुए.

लेखक का मानना है कि आज का सीजेपी आंदोलन भी एक तरह से अन्ना आंदोलन का ही सीक्वल है—वही आदर्शवादी युवा, भ्रष्टाचार का मुद्दा और भूख हड़ताल पर बैठा एक करिश्माई नेता. लेकिन वर्तमान में यह आंदोलन विफल है क्योंकि ऊपर वर्णित तीनों स्तंभों (मीडिया, हस्तियों और व्यापक युवाओं) की प्रतिक्रिया बेहद ठंडी है. मुख्यधारा के मीडिया ने इस आंदोलन का पूर्ण 'ब्लैकआउट' कर रखा है, हस्तियां मौन हैं, और युवाओं का सोशल मीडिया सपोर्ट ज़मीनी हकीकत में नहीं बदल पा रहा है.

वैधता के बदलते वैचारिक ढांचे

लेखक स्पष्ट करते हैं कि मीडिया या युवाओं की बेरुखी तो केवल ऊपरी लक्षण है; असली बदलाव बुनियादी वैचारिक ढांचे में आया है. किसी भी देश में राज्य की वैधता कुछ साझा विश्वासों पर टिकी होती है कि सरकार की शक्तियां क्या हैं और उसकी सीमाएं क्या हैं. जब सरकार इन स्थापित मानदंडों का उल्लंघन करती है, तभी घोटाला या संकट 'वैधता के संकट' में बदलता है.  इसे समझाने के लिए लेखक दो वैश्विक उदाहरण देते हैं:

ब्रिटेन (बोरिस जॉनसन का मामला): भारी बहुमत के बावजूद बोरिस जॉनसन को 'पार्टीगेट' (लॉकडाउन के दौरान पार्टी करने) के कारण इस्तीफा देना पड़ा, क्योंकि उन्होंने वहां कानून के शासन और संसदीय मर्यादा के गहरे मानदंडों का उल्लंघन किया था, जो ब्रिटिश समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं.

रूस (व्लादिमीर पुतिन का मामला): रूस में वैधता संस्थागत मर्यादा पर नहीं, बल्कि राजनीतिक स्थिरता, राष्ट्रीय ताकत और एक सुरक्षात्मक सामाजिक अनुबंध पर टिकी है. वहां की जनता भ्रष्टाचार और अधिनायकवाद को तब तक सह लेती है जब तक सरकार सामाजिक व्यवस्था और बेहतर जीवन स्तर देती रहे. लेकिन जब 2018 में सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाई गई, तो जनता भड़क गई क्योंकि इसने उस सुरक्षात्मक सामाजिक अनुबंध को तोड़ा, और पुतिन सरकार को पीछे हटना पड़ा.

यूपीए बनाम मोदी सरकार: वैधता के स्तंभों का खिसकना

लेखक के अनुसार, सुशासन या जवाबदेही का कोई सार्वभौमिक नियम नहीं होता. 2011 में मनमोहन सिंह ने संसद में सरकार की वैधता के दो मुख्य आधार बताए थे: पहला, वे लोकतांत्रिक रूप से चुने गए जनता के वास्तविक प्रतिनिधि हैं; दूसरा, वे अर्थव्यवस्था के विशेषज्ञ कर्णधार हैं जो जीवन स्तर सुधार रहे हैं. लेकिन क्रोनी कैपिटलिज्म (पूंजीपति-पक्षपात) और गठबंधन सरकारों की राजनीतिक सौदेबाज़ी के कारण ये स्तंभ ढह गए.

इसके विपरीत, मोदी सरकार ने राज्य की वैधता को एक बिल्कुल नए और अधिक मजबूत आधार पर स्थापित कर दिया है, जिसे 'हिंदू राष्ट्रवाद' कहते हैं. उदार विकासात्मकता की पुरानी धारणा को अब हिंदू राष्ट्रवाद के एक शक्तिशाली आवरण से ढक दिया गया है.

इस वैचारिक परिवर्तन की पूर्ण अभिव्यक्ति 22 जनवरी 2024 को राम मंदिर के उद्घाटन के समय हुई. संघ प्रमुख मोहन भागवत ने इसे भारत का "वास्तविक स्वतंत्रता दिवस" कहा और प्रधानमंत्री मोदी ने राम को भारत का आधार, विधान, चेतना और प्रतिष्ठा घोषित किया. इस आयोजन को कॉरपोरेट मीडिया ने एक युगांतकारी उत्सव की तरह दिखाया और देश के उद्योगपतियों, फिल्मी सितारों तथा क्रिकेटरों ने इसे ज़ोरदार समर्थन दिया. यानी, समाज के सभी प्रमुख मध्यस्थों ने अब इस नए वैचारिक ढांचे को स्वीकार कर लिया है.

लेख के अंत में आसिम अली एक अत्यंत महत्वपूर्ण निष्कर्ष पर पहुँचते हैं. जब तक हिंदू राष्ट्रवाद भारतीय राज्य की वैधता का मुख्य आधार बना रहेगा, तब तक जनता और सरकार के बीच बातचीत का संतुलन पूरी तरह एकतरफा (सरकार के पक्ष में) रहेगा.

जब कोई राज्य खुद को किसी दल या सरकार से ऊपर उठाकर एक पूरी 'सभ्यता के पारलौकिक प्रतिनिधि' के रूप में स्थापित कर लेता है, तो प्रवेश परीक्षाओं (जैसे नीट) में गड़बड़ी या पेपर लीक जैसे नीरस और प्रशासनिक मुद्दों के आधार पर उसके शासन की वैधता को चुनौती देना लगभग असंभव हो जाता है. अतः लेखक की स्पष्ट राय है कि यदि भविष्य में किसी भी सामाजिक आंदोलन को प्रभावी होना है, तो उसे अपनी 'अराजनीतिक' छवि के भ्रम से बाहर निकलना होगा और सरकार के शासन के इस मूल आधार—'हिंदू राष्ट्रवाद'—को सीधे वैचारिक और राजनीतिक चुनौती देनी होगी.

(आसिम अली एक राजनीतिक शोधकर्ता और स्तंभकार हैं)

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