7.8% जीडीपी की ‘पहेली’: मुख्य विकास दर आम जनजीवन की आर्थिक हकीकत से इतनी अलग क्यों दिखती है?

‘द टेलीग्राफ’ में अर्नब चटर्जी की रिपोर्ट से यह स्पष्ट होता है कि कागजी आंकड़ों और आम जनता की वित्तीय स्थिति में बड़ा अंतर है. तमाम पहलुओं का विश्लेषण करने के बाद यह रिपोर्ट कहती है कि उनके अनुसार, गिरती क्रय शक्ति, घटती घरेलू बचत और असंगठित क्षेत्र के सुस्त विकास के कारण 7.8% की जीडीपी वृद्धि का लाभ समाज के बड़े हिस्से तक नहीं पहुंच पा रहा है. सतत विकास के लिए केवल आंकड़ों के समायोजन के बजाय सरकार को व्यापक और पारदर्शी सुधार करने की आवश्यकता है.

रिपोर्ट भारत की 7.8 प्रतिशत की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्धि दर, सरकारी दावों, तथा अर्थशास्त्रियों और विशेषज्ञों द्वारा उठाए गए सवालों के बीच के विरोधाभास का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करती है. जैसे: ईरान युद्ध और प्रतिकूल मौसम जैसी चुनौतियों के बावजूद भारत ने 7.8% की जीडीपी वृद्धि दर्ज की है.

इंसिग्निया पॉलिसी रिसर्च के प्रबंध निदेशक अभिषेक आनंद ने जीडीपी गणना की तकनीकी खामियों पर प्रकाश डाला है. आनंद का मानना है कि 86 लाख करोड़ रुपये का पुराना आंकड़ा पुरानी पद्धति पर आधारित था और 80 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा नई पद्धति पर, इसलिए दोनों की सीधी तुलना करके 2.6% वृद्धि का निष्कर्ष निकालना भी पूरी तरह सही नहीं है. हालांकि, वे मानते हैं कि 6 लाख करोड़ रुपये का यह संशोधन एक बड़ा अंतर प्रस्तुत करता है. वे कहते हैं कि आंकड़ों की तेज वृद्धि के बावजूद धरातल पर कई विसंगतियां दिखाई दे रही हैं. मसलन, अगस्त में मैन्युफैक्चरिंग पीएमआई गिरकर 52.8 (5 साल का निचला स्तर) पर आ गया. जीडीपी में दर्शाई गई विनिर्माण वृद्धि आईआईपी के आंकड़ों से मेल नहीं खाती. नॉमिनल जीडीपी (10.3%) और रियल जीडीपी (7.8%) के अंतर से निकला जीडीपी डिफ्लेटर (2.3%) असामान्य रूप से कम है. आनंद के अनुसार यह सीपीआई और डब्ल्यूपीआई के बीच (4% से 9%) होना चाहिए था. सरकार का तर्क है कि आयातित कच्चे तेल की उच्च कीमतें डब्ल्यूपीआई बढ़ाती हैं लेकिन जीडीपी से घट जाती हैं.

प्रोफेसर अभिजीत सरकार और अरविंद सुब्रमण्यम (शोध पत्र के माध्यम से) ने अर्थव्यवस्था के असंगठित क्षेत्र की उपेक्षा को उजागर किया है. भारत की 80% आबादी असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है. जीडीपी मापन में संगठित क्षेत्र के डेटा को अनौपचारिक क्षेत्र का प्रतिनिधि मान लिया जाता है, जबकि नोटबंदी, जीएसटी और कोविड का सबसे बुरा असर असंगठित क्षेत्र पर पड़ा था.

मुंडले समिति ने 2004-2011 के दौरान यूपीए कार्यकाल की औसत वृद्धि 8.36% आंकी थी, जिसे बाद में नीति आयोग और सीएसओ ने घटाकर 6.82% कर दिया. इस संशोधन की प्रक्रिया पर कई शिक्षाविदों ने सवाल उठाए थे.

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