मणिपुर के कुकी-ज़ो समूह ने जनगणना में देरी पर उठाए सवाल, राष्ट्रपति शासन वापस लागू करने की मांग की

मणिपुर के एक कुकी-ज़ो संगठन ने राज्य में जनगणना टालने के केंद्र सरकार के फैसले पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि यह फैसला उनके समुदाय की आवाज को नजरअंदाज करके लिया गया है.

‘पीटीआई’ के अनुसार, कुकी-ज़ो काउंसिल (केज़ेडसी) ने मणिपुर में फिर से राष्ट्रपति शासन लागू करने की मांग की और आरोप लगाया कि वर्तमान सरकार लोगों को सुरक्षा प्रदान करने में विफल रही है. केज़ेडसी ने एक बयान में कहा कि जनगणना स्थगित करने का निर्णय नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई एक उच्च स्तरीय बैठक में लिया गया.  इस बैठक में मैतेई और नागा समुदायों का प्रतिनिधित्व करने वाले 14 नागरिक समाज संगठनों द्वारा उठाई गई "एनआरसी से पहले जनगणना नहीं" की मांग पर विचार किया गया.

काउंसिल ने कहा, "इस मांग में एक भी कुकी-ज़ो संगठन शामिल नहीं था. फिर भी, मणिपुर के लोगों की भावनाओं और आकांक्षाओं का हवाला देकर इस फैसले को सही ठहराया गया." एनआरसी लागू करने की मांग मैतेई और नागा समुदायों की इस आशंका से पैदा हुई थी कि बिना एनआरसी के जनगणना कराने से राज्य में "जनसांख्यिकीय बदलाव" हो सकता है, क्योंकि पड़ोसी म्यांमार से कथित तौर पर अवैध अप्रवासी घुस रहे हैं, जिनके कुकी लोगों के साथ जातीय (एथनिक) संबंध हैं.

केज़ीसी ने कहा कि उसे उम्मीद थी कि सरकार बदलने से सुरक्षा और सामान्य स्थिति वापस आएगी, लेकिन हमले और हत्याएं जारी हैं. बयान में कहा गया, "हमारे लोग वर्तमान राज्य सरकार की तुलना में राष्ट्रपति शासन के दौरान अधिक सुरक्षित महसूस करते थे. यदि राज्य सरकार अपने नागरिकों की रक्षा नहीं कर सकती है, तो केंद्र को कदम उठाना होगा."

उल्लेखनीय है कि घाटी में रहने वाले मैतेई और पहाड़ी जिलों में रहने वाले कुकी समुदाय के बीच मई 2023 से जारी जातीय हिंसा के कारण कम से कम 260 लोग मारे जा चुके हैं और हजारों लोग बेघर हो चुके हैं.

लगातार जातीय संघर्षों और मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के इस्तीफे के बाद, 13 फरवरी 2025 को राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया गया था. इसे लगभग एक साल बाद 4 फरवरी को हटा लिया गया और वाई. खेमचंद सिंह मुख्यमंत्री बने.

Previous
Previous

7.8% जीडीपी की ‘पहेली’: मुख्य विकास दर आम जनजीवन की आर्थिक हकीकत से इतनी अलग क्यों दिखती है?

Next
Next

ज्यादा भारतीय छात्र उच्च शिक्षा छोड़ रहे हैं, क्योंकि अब डिग्री लागत के लायक नहीं लगती