महाराष्ट्र के किसान ने वीडियो में पहले पूछा- ‘उसे सरकारी सूखा राहत क्यों नहीं मिली’, और फिर आत्महत्या कर ली
महाराष्ट्र के नांदेड़ में सूखे के कारण फसल नष्ट होने के बावजूद सरकारी राहत न मिलने पर एक 46 वर्षीय किसान ने ऑनलाइन वीडियो क्लिप पोस्ट करने के बाद सोमवार को आत्महत्या कर ली.
वीडियो में, शंकर आबनराव क्षीरसागर ने जिला कलेक्टर से भावुक अपील करते हुए पूछा कि उन्हें किसी भी ऋण-माफी योजना का लाभ क्यों नहीं मिला और आवेदन करने के बावजूद उनकी बेटी की मेडिकल कॉलेज की फीस क्यों माफ नहीं की गई.
‘पीटीआई और टेलीग्राफ वेब डेस्क’ के मुताबिक, महाराष्ट्र सरकार ने सूखा प्रभावित किसानों के बच्चों के लिए फीस में छूट की घोषणा की है, लेकिन क्षीरसागर की बेटी को इसका लाभ नहीं मिला.
नागपुर से लगभग 357 किमी दक्षिण में स्थित लिंबगांव पुलिस स्टेशन के सहायक पुलिस निरीक्षक बोधनकर ने बताया कि फसल की बर्बादी, बकाया कर्ज और बेटी की पढ़ाई के खर्च से पैदा हुए वित्तीय बोझ के कारण क्षीरसागर परेशान थे.
उन्होंने बताया कि क्षीरसागर सोमवार दोपहर अपने खेत पर गए, अपने मोबाइल फोन पर वीडियो रिकॉर्ड किया और उसे सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया. वीडियो सामने आने के बाद किसान के परिजनों और पुलिस ने उनकी तलाश शुरू की. अधिकारी ने बताया कि क्षीरसागर बोरगांव स्थित अपने खेत में फांसी के फंदे से लटके पाए गए.
अधिकारियों के अनुसार, किसान ने अपनी छोटी सी जमीन पर सोयाबीन की खेती की थी, लेकिन बारिश में लंबे अंतराल (सूखे) के कारण फसल को नुकसान पहुंचा था.
महाराष्ट्र के 85 प्रतिशत से अधिक तालुकाओं को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया गया है. राज्य के 358 उप-प्रभागों में से 305 प्रभाग इससे प्रभावित हुए हैं. 14 अक्टूबर को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने घोषणा की थी कि दिवाली से पहले किसानों के बैंक खातों में ₹5,000 की शुरुआती राहत राशि सीधे जमा की जाएगी.
रिपोर्ट किए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, मराठवाड़ा—महाराष्ट्र का वह क्षेत्र जिसमें नांदेड़ सहित आठ जिले शामिल हैं—ने 2026 के पहले छह महीनों में 465 किसान आत्महत्याएं दर्ज की हैं. 2025 में, इस क्षेत्र में 1,131 किसानों की आत्महत्याएं दर्ज की गई थीं.
बता दें कि ‘स्क्रॉल’ में तबस्सुम बरनागरवाला ने अपनी रिपोर्ट में भी बताया है कि महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त बीड जिले में ग्रामीण रोजगार योजना के तहत बड़े पैमाने पर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं. उन्हें जांच में ऐसे कार्यस्थल मिले, जहां मजदूरों की डिजिटल हाजिरी दर्ज थी, लेकिन मौके पर कोई काम नहीं हो रहा था. कई मजदूरों ने बताया कि उन्हें अपने नाम पर जारी कार्यादेशों की जानकारी तक नहीं थी और कुछ के खातों में जमा रकम स्थानीय नेताओं द्वारा निकाल लिए जाने का आरोप है.

