"कोई शर्त नहीं": नारीवादी कार्यकर्ताओं ने जनगणना और परिसीमन से अलग तत्काल महिला आरक्षण लागू करने की मांग की
'द मूकनायक' की रिपोर्ट के मुताबिक, देशभर के नारीवादी संगठनों और महिला नेताओं ने केंद्र सरकार से मांग की है कि महिला आरक्षण अधिनियम, 2023 को बिना किसी शर्त के तुरंत लागू किया जाए. उनका कहना है कि संसद और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण लागू करने के लिए न तो जनगणना का इंतजार जरूरी है और न ही परिसीमन की प्रक्रिया का. मौजूदा संसद और विधानसभाओं की संरचना में भी यह आरक्षण लागू किया जा सकता है.
राष्ट्रीय महिला आरक्षण गठबंधन (नेशनल कोएलिशन फॉर वीमेंस रिजर्वेशन) की ओर से आयोजित एक ऑनलाइन प्रेस कॉन्फ्रेंस में वक्ताओं ने कहा कि यदि केंद्र सरकार महिला आरक्षण को परिसीमन और सीटों के विस्तार से जोड़ने की कोशिश करती है, तो देश की प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष ताकतें इसका संयुक्त रूप से विरोध करेंगी. उनका आरोप था कि लंबे समय से लंबित महिला आरक्षण कानून का इस्तेमाल राजनीतिक लाभ, निर्वाचन क्षेत्रों की मनमानी पुनर्संरचना और संघीय ढांचे को कमजोर करने के लिए किया जा रहा है.
वक्ताओं ने कहा कि लगभग चार दशक के संघर्ष के बाद 2023 में संविधान (106वां संशोधन) अधिनियम पारित हुआ, लेकिन इसके बावजूद संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 14 से 16 प्रतिशत और राज्य विधानसभाओं में लगभग 10 प्रतिशत ही है. उन्होंने यह भी कहा कि अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी), घुमंतू और विमुक्त जनजातियों, धार्मिक अल्पसंख्यकों, ट्रांसजेंडर और नॉन-बाइनरी समुदाय, दिव्यांग महिलाओं तथा अन्य वंचित वर्गों की राजनीतिक भागीदारी लगभग नगण्य है. उनका आरोप था कि मौजूदा कानून इन समूहों की समुचित भागीदारी सुनिश्चित नहीं करता.
प्रेस कॉन्फ्रेंस का स्पष्ट संदेश था कि महिला आरक्षण को जनगणना, परिसीमन और सीटों के विस्तार जैसी शर्तों से अलग किया जाए और मौजूदा संसद की सीटों पर ही इसे लागू किया जाए. इसके साथ ही वंचित महिलाओं के लिए संवैधानिक आरक्षण और चुनाव लड़ने के लिए सरकारी आर्थिक सहायता की व्यवस्था की भी मांग की गई, ताकि राजनीति में समान अवसर सुनिश्चित हो सकें.
बिहार विधान परिषद सदस्य और ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वीमेंस एसोसिएशन (एआईपीडब्ल्यूए) की नेता शशि यादव ने कहा कि राजनीतिक दलों पर वंचित महिलाओं को प्रतिनिधित्व देने की जिम्मेदारी छोड़ना उचित नहीं है, क्योंकि अधिकांश दल परिवारवाद से प्रभावित हैं. उनके अनुसार, इससे ओबीसी, ट्रांसजेंडर और अन्य हाशिये के समुदायों की महिलाओं के राजनीति में आने की संभावना और कम हो जाती है.
ट्रांस फेमिनिस्ट कलेक्टिव की अक्कई पद्मशाली ने कहा कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की संसद में ट्रांसजेंडर समुदाय का एक भी प्रतिनिधि नहीं है, जबकि उनकी आबादी लगभग 4 से 5 प्रतिशत मानी जाती है. इंडियन क्रिश्चियन वीमेंस मूवमेंट की अनीता चेरिया ने कहा कि महिला आरक्षण केवल संख्या बढ़ाने का सवाल नहीं है, बल्कि राजनीतिक व्यवस्था में सभी वंचित समुदायों की पहचान और भागीदारी सुनिश्चित करने का भी मुद्दा है.
मुंबई के बेबाक कलेक्टिव की हसीना खान ने धार्मिक अल्पसंख्यकों के सामाजिक और आर्थिक अनुभवों को ध्यान में रखते हुए विविधता आधारित आरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया. वहीं ऑल इंडिया दलित महिला अधिकार मंच की अभिरामी जोथीश्वरन ने कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षण होने के बावजूद इन समुदायों की महिलाओं की निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी बेहद सीमित है. उन्होंने कहा कि दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा जैसे मुद्दे संसद में प्रभावी ढंग से नहीं उठ पाते, इसलिए इन समुदायों की महिलाओं की प्रत्यक्ष राजनीतिक भागीदारी जरूरी है.
झारखंड जनाधिकार महासभा और आदिवासी महिला नेटवर्क की एलिना होरो ने कहा कि आदिवासी महिलाएं प्रकृति, जल, जंगल और जमीन से जुड़े अपने अनुभवों के आधार पर नीति निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती हैं. वहीं समान अधिकार आंदोलन की प्रोफेसर कुसुमम जोसेफ और राष्ट्रीय दलित मानवाधिकार अभियान की बीना पल्लीकल ने भी आरक्षण के भीतर सामाजिक विविधता और अंतरविभागीय प्रतिनिधित्व की आवश्यकता पर बल दिया.
राष्ट्रीय महिला आरक्षण गठबंधन ने जनप्रतिनिधियों को सौंपे जाने वाले ज्ञापन में संविधान (106वां संशोधन) अधिनियम, 2023 में संशोधन की मांग करते हुए कहा है कि महिला आरक्षण को जनगणना, परिसीमन और सीटों के विस्तार से पूरी तरह अलग किया जाए. राज्यों के मौजूदा सीट अनुपात को बनाए रखते हुए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जाए. ओबीसी, घुमंतू और विमुक्त जनजातियों, धार्मिक अल्पसंख्यकों, ट्रांसजेंडर, नॉन-बाइनरी और अन्य वंचित महिलाओं के लिए अलग आरक्षण का प्रावधान किया जाए. पंचायत राज संस्थाओं की तर्ज पर पारदर्शी प्रक्रिया से आरक्षित सीटों का निर्धारण हो और वंचित वर्गों के उम्मीदवारों के लिए चुनावी खर्च में सरकारी सहायता की व्यवस्था भी की जाए.
वक्ताओं ने कहा कि अप्रैल 2026 में महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ने की एक कोशिश विपक्ष के विरोध के कारण सफल नहीं हो सकी थी, लेकिन अब ऐसे प्रयास फिर तेज हो रहे हैं. इसलिए संविधान में संशोधन कर महिला आरक्षण को सभी शर्तों से मुक्त किया जाना चाहिए. राष्ट्रीय महिला आरक्षण गठबंधन ने सभी प्रगतिशील राजनीतिक दलों, महिला संगठनों और जन आंदोलनों से अपील की है कि वे संसद के आगामी मानसून सत्र में इन मांगों का समर्थन करें और महिला आरक्षण को बिना किसी देरी के लागू कराने के लिए एकजुट होकर आवाज उठाएं.

