एसआईआर: मतदाता सूची से नाम हटने का मतलब नागरिकता खोना नहीं, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से दोहराया कि मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से बाहर किए जाने का यह अर्थ नहीं है कि उसने अपनी भारतीय नागरिकता भी खो दी है.

‘लाइव लॉ’ के मुताबिक, अदालत ने कहा कि वह पहले भी स्पष्ट कर चुकी है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण कर रहे निर्वाचन आयोग के पास किसी व्यक्ति की नागरिकता निर्धारित करने का अधिकार नहीं है.

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की पीठ पश्चिम बंगाल में अपीलीय न्यायाधिकरणों की सुनवाई प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने संबंधी एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी.

मार्च में सुप्रीम कोर्ट ने उन लोगों के लिए न्यायाधिकरण गठित किए थे, जो मतदाता सूची से अपने नाम हटाए जाने के फैसले को चुनौती देना चाहते हैं.

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने, रिपोर्टों का हवाला देते हुए, अदालत को बताया कि न्यायाधिकरणों में लगभग 34 लाख अपीलें लंबित हैं. उन्होंने कहा कि अब तक केवल लगभग 38 हजार मामलों का निपटारा हुआ है और जिन मामलों का फैसला हुआ है, उनमें कम से कम 70 प्रतिशत अपीलें स्वीकार की गई हैं.

वकील ने यह भी कहा कि अपीलें लंबित रहने के बावजूद पश्चिम बंगाल सरकार ने ऐसी अधिसूचनाएं जारी की हैं, जिनके तहत मतदाता सूची से अंतिम रूप से बाहर किए गए लोगों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के लाभ से वंचित किया जा रहा है.

लाइव लॉ के अनुसार, अदालत को यह भी बताया गया कि ऐसे लोगों को जाति प्रमाण पत्र जारी करने से भी इनकार किया जा रहा है.

सुनवाई के दौरान वकील ने यह दलील भी दी कि यदि किसी व्यक्ति के पास भारतीय पासपोर्ट है, तो उसे नागरिकता साबित करने के लिए पर्याप्त माना जाना चाहिए. हालांकि, पिछले कुछ सप्ताहों से विदेश मंत्रालय लगातार यह दोहरा रहा है कि पासपोर्ट एक यात्रा दस्तावेज है, नागरिकता का प्रमाण नहीं.

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को चुनौती देने वाली अन्य याचिकाओं के साथ सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर दिया.

बुधवार को भी सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा था कि विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं, वे अब भी सस्ता राशन सहित कुछ कल्याणकारी योजनाओं के लाभ पाने के हकदार रहेंगे.

गौरतलब है कि 27 मई को बिहार में वर्ष 2025 के विशेष गहन पुनरीक्षण को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया की वैधता बरकरार रखी थी. हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि मतदाता सूची में किसी व्यक्ति का नाम शामिल करने या हटाने के उद्देश्य से निर्वाचन आयोग द्वारा की जाने वाली जांच का अर्थ यह नहीं है कि आयोग किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता पर फैसला कर सकता है.

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