8 साल में 84 हजार से ज्यादा स्कूल कम हुए, सरकारी स्कूलों की हिस्सेदारी घटी

‘बिज़नेस स्टैंडर्ड’ के मुताबिक, देश में पिछले आठ वर्षों के दौरान स्कूलों की संख्या में 84 हजार से अधिक की कमी दर्ज की गई है. यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (यूडीआईएसई) की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, 2018-19 में देश में 15.5 लाख स्कूल थे, जो 2025-26 में घटकर 14.6 लाख रह गए. इस दौरान छात्र नामांकन में गिरावट आई है और सरकारी स्कूलों की हिस्सेदारी भी कम हुई है, जबकि निजी स्कूलों की संख्या और हिस्सेदारी बढ़ी है.

'कॉकरोच जनता पार्टी' के 'स्कूल ठीक करो' अभियान ने ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों की जर्जर होती स्थिति की ओर ध्यान खींचा है. अभियान में स्कूलों के बुनियादी ढांचे की कमी, शिक्षकों की कमी, घटते नामांकन, डिजिटल सुविधाओं के अभाव और निजी संस्थानों पर बढ़ती निर्भरता जैसे मुद्दे प्रमुखता से उठाए गए हैं.

यूडीआईएसई के आंकड़ों के मुताबिक, 2018-19 में देश में कुल 15.5 लाख स्कूल थे, जबकि 2025-26 में यह संख्या घटकर 14.6 लाख रह गई. यानी इस अवधि में कुल 84,318 स्कूल कम हुए.

छात्र नामांकन में भी उतार-चढ़ाव देखने को मिला. 2018-19 में करीब 26 करोड़ छात्र स्कूलों में नामांकित थे. यह संख्या 2021-22 में बढ़कर 26.5 करोड़ तक पहुंची, लेकिन इसके बाद गिरावट शुरू हुई और 2025-26 में नामांकन घटकर 24.7 करोड़ रह गया.

इस अवधि में छात्र-शिक्षक अनुपात 2018-19 के 27 से सुधरकर 2025-26 में 24 हो गया. हालांकि, रिपोर्ट के अनुसार यह सुधार मुख्य रूप से शिक्षकों की संख्या बढ़ने के कारण नहीं, बल्कि छात्र नामांकन में कमी के कारण हुआ.

2025-26 में लगभग 31 प्रतिशत पात्र बच्चे स्कूलों में नामांकित नहीं थे. यह संख्या करीब 11.1 करोड़ बच्चों की है, जिनकी उम्र 3 से 17 वर्ष के बीच है. यह स्थिति 2018-19 से लगातार बनी हुई है.

सरकारी स्कूलों की हिस्सेदारी घटी, निजी स्कूल बढ़े

आंकड़ों के अनुसार, कुल स्कूलों में सरकारी स्कूलों की हिस्सेदारी 2018-19 में 69.8 प्रतिशत थी, जो 2025-26 में घटकर 68.54 प्रतिशत रह गई. इसी अवधि में सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों की हिस्सेदारी 5.46 प्रतिशत से घटकर 5.4 प्रतिशत हो गई.

इसके विपरीत, निजी स्कूलों की हिस्सेदारी बढ़ी है. 2018-19 में निजी स्कूलों की हिस्सेदारी 21 प्रतिशत थी, जो 2025-26 में बढ़कर 23 प्रतिशत हो गई. इस अवधि में निजी स्कूल ही एकमात्र ऐसी श्रेणी रहे, जिनकी हिस्सेदारी में वृद्धि दर्ज की गई.

क्षेत्रों में सरकारी और निजी स्कूलों की स्थिति अलग-अलग

क्षेत्रवार आंकड़ों में भी बड़ा अंतर दिखाई देता है. 2025-26 में पूर्वी क्षेत्र में सरकारी स्कूलों की हिस्सेदारी सबसे अधिक करीब 82 प्रतिशत रही, जबकि निजी स्कूलों की हिस्सेदारी केवल 8 प्रतिशत थी.

उत्तरी क्षेत्र में सरकारी स्कूलों की हिस्सेदारी करीब 57 प्रतिशत रही, जबकि निजी स्कूलों की हिस्सेदारी 36 प्रतिशत तक पहुंच गई. दक्षिणी क्षेत्र में सरकारी स्कूलों की हिस्सेदारी 65 प्रतिशत और निजी स्कूलों की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत दर्ज की गई.

बुनियादी सुविधाएं बेहतर, डिजिटल व्यवस्था कमजोर

रिपोर्ट के अनुसार, अधिकांश सरकारी स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हैं. करीब 99 प्रतिशत सरकारी स्कूलों में कार्यरत पेयजल सुविधा, 94 प्रतिशत में बिजली और 96 प्रतिशत में शौचालय मौजूद हैं.

हालांकि, डिजिटल शिक्षा के मामले में स्थिति कमजोर बनी हुई है. केवल 25 प्रतिशत स्कूलों में कार्यरत डेस्कटॉप कंप्यूटर हैं. करीब 16 प्रतिशत स्कूलों में प्रोजेक्टर और सिर्फ 6 प्रतिशत स्कूलों में डिजिटल लाइब्रेरी उपलब्ध है.

माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट चिंता का विषय

2025-26 में माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर 7 प्रतिशत दर्ज की गई. मिडिल स्तर पर यह 3.6 प्रतिशत और प्रिपरेटरी स्तर पर 1.8 प्रतिशत रही, जबकि फाउंडेशनल स्तर पर ड्रॉपआउट नगण्य बताया गया है.

छात्रों को स्कूलों में बनाए रखने की दर माध्यमिक स्तर पर केवल 44 प्रतिशत रही. मिडिल स्तर पर यह 75 प्रतिशत, प्रिपरेटरी स्तर पर 90 प्रतिशत और प्राथमिक स्तर पर 92 प्रतिशत दर्ज की गई.

शिक्षा बजट की हिस्सेदारी में भी कमी

सरकारी स्कूलों की संख्या और नामांकन में गिरावट के साथ शिक्षा पर बजटीय हिस्सेदारी में कमी का मुद्दा भी सामने आया है. केंद्रीय बजट में स्कूल शिक्षा और साक्षरता की हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2010 में 1.9 प्रतिशत थी, जो वित्त वर्ष 2026 में घटकर 1.4 प्रतिशत रह गई.

इसी अवधि में उच्च शिक्षा विभाग की बजटीय हिस्सेदारी भी 1.4 प्रतिशत से घटकर 1 प्रतिशत हो गई.

आंकड़े संकेत देते हैं कि देश की स्कूल शिक्षा व्यवस्था एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है. सरकारी स्कूलों की संख्या और हिस्सेदारी में गिरावट, छात्रों के घटते नामांकन और निजी स्कूलों पर बढ़ती निर्भरता के बीच डिजिटल सुविधाओं और शिक्षा पर सार्वजनिक खर्च को लेकर चुनौतियां लगातार बनी हुई हैं.

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