राजेंद्र यादव | मोदी का शासन: प्रशासनिक प्रदर्शन से ज्यादा राजनीतिक छवि पर जोर 

'वंदे मातरम्' विवाद भाजपा सरकार के लिए सुर्खियां बटोरने और राजनीतिक विमर्श को दूसरी दिशा में मोड़ने से ज्यादा कुछ नहीं है. पहले राष्ट्रीय ध्वज के रंगों को लेकर विवाद खड़ा हुआ और अब 'वंदे मातरम्' के गायन को लेकर बहस शुरू हो गई है. यह भाजपा की ओर से चल रहे नागरिक प्रदर्शनों और सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति के सामने आने से ध्यान हटाने की एक स्पष्ट कोशिश है.

हाल के विरोध प्रदर्शनों की सबसे खास बात यह है कि प्राथमिक स्तर से लेकर आगे की कक्षाओं तक की युवा छात्राएं इसमें आगे आ रही हैं. इसके बावजूद भाजपा सरकार ने इन मुद्दों पर कोई ठोस जवाब नहीं दिया, यहां तक कि माफी तक नहीं मांगी. इसके उलट राजस्थान सरकार ने अनधिकृत लोगों के स्कूलों में प्रवेश पर रोक लगा दी और राजनीतिक आंदोलनकारियों पर नियमित प्रशासनिक व्यवस्था बाधित करने का आरोप लगाया.

आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक दशक में देशभर में हजारों सरकारी स्कूल बंद हुए हैं. इनमें बड़ी संख्या मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में बंद हुए, जहां मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व में सरकार चल रही है. इन स्कूलों के बंद होने का मुख्य कारण स्पष्ट है.अभिभावकों का सार्वजनिक शिक्षा की गिरती गुणवत्ता से भरोसा उठ रहा है और वे अपने बच्चों को निजी अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में भेज रहे हैं. यह उस 'गुरुकुल' मॉडल के जरिए शिक्षा के भारतीयकरण के बड़े वादों पर भी सवाल खड़ा करता है.

अभिभावक यह विकल्प चुनने के लिए मजबूर महसूस करते हैं, जबकि कई निजी संस्थानों की स्थिति भी बहुत बेहतर नहीं है. लेकिन यह व्यवस्था नीति निर्माताओं और निर्णय लेने वालों को बहुत अधिक परेशान करती हुई नहीं दिखती. राजनीतिक अभिजात वर्ग इस संकट से काफी हद तक अछूता रहता है, क्योंकि जर्जर सरकारी स्कूल अक्सर ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में हैं, जबकि उनके अपने बच्चे महंगे निजी संस्थानों या विदेशों में पढ़ते हैं.

हालांकि, बुनियादी ढांचे का कुप्रबंधन तब सार्वजनिक ध्यान खींचता है, जब उसकी स्थिति इतनी खराब हो जाए कि उसे नजरअंदाज करना मुश्किल हो. प्रधानमंत्री मोदी ने स्मार्ट सिटी, एक्सप्रेसवे, एम्स संस्थानों और क्षेत्रीय हवाई अड्डों के निर्माण पर विशेष जोर दिया. यह माना गया कि ऐसी बड़ी परियोजनाएं तेजी से देश की तस्वीर बदलेंगी और विकास के प्रतीक बनेंगी. लेकिन जब ये परियोजनाएं समय पर पूरी नहीं होतीं या निर्माण के तुरंत बाद संरचनात्मक समस्याओं का सामना करती हैं, तो यही बड़ी परियोजनाएं सरकार की कमजोर कड़ी बन जाती हैं.

गंगा एक्सप्रेसवे और नव-निर्मित नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट, जेवर को निर्माण की गुणवत्ता और निगरानी को लेकर गंभीर आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है.

अकेले उत्तर प्रदेश में कई नए हवाई अड्डे अब भी पूरी तरह संचालित नहीं हो सके हैं, जबकि निष्क्रिय पड़े इन ढांचों के रखरखाव पर लगातार बड़ी रकम खर्च की जा रही है.

निर्माण तकनीक से जुड़े जटिल तर्क जनता को तब प्रभावित नहीं करते, जब जमीन पर दिखाई देने वाली वास्तविक स्थिति उनसे अलग तस्वीर पेश करती हो.

शासन को लेकर असंतोष विदेश नीति और कूटनीतिक संबंधों तक भी फैला हुआ है. विश्लेषकों का अक्सर कहना है कि प्रधानमंत्री की सार्वजनिक छवि जो एक साधारण पृष्ठभूमि से 'चायवाला' होते हुए मुख्यमंत्री और फिर प्रधानमंत्री बनने की उनकी यात्रा पर आधारित है. कई बार औपचारिक कूटनीतिक प्रोटोकॉल की तुलना में व्यक्तिगत छवि को अधिक प्राथमिकता देती है.

विदेशी नेताओं के साथ बिना औपचारिकता के गले मिलना या आक्रामक ढंग से हाथ मिलाने जैसे प्रदर्शन कई बार पारंपरिक कूटनीति की अपेक्षित गंभीरता और संतुलन से अलग दिखाई दे सकते हैं.

इसी तरह, अमेरिका में एक कार्यक्रम के दौरान डोनाल्ड ट्रंप के समर्थन में "अबकी बार, ट्रंप सरकार" जैसे नारे का सार्वजनिक समर्थन पारंपरिक कूटनीतिक शिष्टाचार के अनुरूप नहीं माना गया. किसी देश के नेता द्वारा दूसरे देश के घरेलू चुनाव में खुलकर किसी पक्ष का समर्थन करना दूसरे पक्षों के साथ संबंधों को प्रभावित करने का जोखिम पैदा कर सकता है. इस स्तर की कूटनीति में तटस्थता बनाए रखना महत्वपूर्ण होता है.

इसके अलावा, ब्रिक्स समूह के आर्थिक प्रभाव के बढ़ने के साथ डॉलर के विकल्प या डॉलर पर निर्भरता कम करने को लेकर चर्चाओं ने वाशिंगटन का ध्यान आकर्षित किया. बदलते भू-राजनीतिक हालात में भारत पश्चिमी शक्तियों और पूर्वी गठबंधनों के बीच एक नाजुक संतुलन बनाए रखने की स्थिति में है.

चीन के बढ़ते क्षेत्रीय प्रभाव का मुकाबला करने के लिए अमेरिका के साथ भारत की रणनीतिक साझेदारी महत्वपूर्ण बनी हुई है. लेकिन पश्चिम एशिया के संकट के बीच आयोजित उच्च-स्तरीय कूटनीतिक यात्राओं जैसे हालिया नीतिगत कदमों ने भारत की गुटनिरपेक्ष विरासत और उसकी वर्तमान कूटनीतिक दिशा को लेकर सवाल उठाए हैं.

देश के भीतर विपक्ष की रणनीति भी बदल रही है.

वर्षों तक सत्तारूढ़ दल की मीडिया रणनीति राहुल गांधी की छवि को कमजोर करने पर केंद्रित रही और उन्हें लेकर कई नकारात्मक राजनीतिक नैरेटिव बनाए गए. लेकिन लगातार उन्हें निशाना बनाने की इस रणनीति ने अनजाने में उन्हें राजनीतिक विमर्श के केंद्र में बनाए रखा. इसका परिणाम यह हुआ कि ममता बनर्जी, अखिलेश यादव या शरद पवार जैसे अन्य विपक्षी नेता खुद को एकमात्र वैकल्पिक राष्ट्रीय चेहरा बनाने की स्थिति में पूरी तरह नहीं आ सके.

अब यह समीकरण बदल रहा है. जैसे-जैसे जनता के बीच राजनीतिक थकान बढ़ रही है, मतदाता पुराने राजनीतिक विवादों से आगे बढ़कर मौजूदा सरकार से आर्थिक और सामाजिक प्रदर्शन को लेकर जवाब मांग रहे हैं. जब सरकार से उसके कामकाज और उपलब्धियों का हिसाब मांगा जाता है, तो सत्तारूढ़ दल के लिए ठोस और प्रभावी जवाब देना कई बार चुनौतीपूर्ण हो जाता है.

क्या भाजपा सरकार के लिए समय समाप्त हो रहा है? संभवतः, लेकिन इसके लिए उसे किसी और को दोष देने की जरूरत नहीं होगी. मूल सवाल यह है कि क्या सरकार ने लगातार बुनियादी प्रशासनिक चुनौतियों और दीर्घकालिक राष्ट्र निर्माण पर पर्याप्त ध्यान दिया, या फिर उसने अक्सर प्रतिक्रियात्मक राजनीतिक प्रबंधन को प्राथमिकता दी.

नोटबंदी से लेकर बदलते नीतिगत लक्ष्यों तक, कई मौकों पर संरचनात्मक प्रशासनिक सुधारों की तुलना में तात्कालिक राजनीतिक रणनीति को प्राथमिकता दी गई. आगे बढ़ते हुए भारतीय मतदाता राजनीतिक प्रदर्शन के बजाय ठोस परिणामों की मांग कर सकता है.

यह काउंटरकरंट्स में प्रकाशित राजेंद्र यादव के मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी अनुवाद है. 

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