बाबरी मस्जिद विध्वंस की आलोचना ‘राष्ट्र-विरोधी’ नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा है कि यह राय रखना कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद को नहीं गिराया जाना चाहिए था, किसी व्यक्ति को ‘राष्ट्र-विरोधी’ नहीं बनाता. अदालत ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों को अलग-अलग विचार और राय रखने का अधिकार है और केवल विचारों के आधार पर उनके मौलिक अधिकारों को प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता.

‘स्क्रोल’ के मुताबिक, जस्टिस माधव जामदार ने सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) के दो सदस्यों फिरोज अब्दुल वहाब खान और मोहम्मद रफीक गुलाम रसूल अंसारी के खिलाफ जारी निर्वासन आदेशों को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की. इन आदेशों के तहत दोनों को एक साल तक मुंबई में प्रवेश करने से प्रतिबंधित किया गया था.

याचिकाकर्ताओं ने 3 दिसंबर 2025 को मुंबई पुलिस द्वारा जारी निर्वासन आदेशों को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. ये आदेश 2024 और 2025 में दर्ज तीन एफआईआर के आधार पर जारी किए गए थे. मामले वक्फ संशोधन विधेयक के खिलाफ प्रदर्शन, चेंबूर-गोवंडी इलाके में सीमेंट गोदामों से कथित वायु प्रदूषण के विरोध और बाबरी मस्जिद विध्वंस से जुड़े प्रदर्शन से संबंधित थे.

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ केवल इसलिए चुनिंदा कार्रवाई नहीं की जा सकती क्योंकि वे एक धर्म विशेष से आते हैं. कोर्ट ने यह भी गौर किया कि एक एफआईआर में कई विपक्षी दलों के कार्यकर्ता प्रदर्शन में शामिल थे, लेकिन राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी या शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के सदस्यों के खिलाफ निर्वासन की कार्रवाई नहीं की गई.

बाबरी मस्जिद से संबंधित एफआईआर पर अदालत ने राज्य सरकार के उस तर्क पर सवाल उठाया, जिसमें कहा गया था कि इस मुद्दे पर लगाए गए नारे समाज में दरार पैदा कर सकते हैं. कोर्ट ने कहा कि इस आशंका को साबित करने के लिए राज्य की ओर से कोई ठोस सामग्री पेश नहीं की गई.

मुख्य लोक अभियोजक ने अदालत में तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं की विरोध प्रदर्शनों में भागीदारी सामाजिक सौहार्द बिगाड़ सकती है और शांति भंग होने का खतरा पैदा कर सकती है. हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि केवल ‘काल्पनिक आशंकाओं’ के आधार पर नागरिकों के मौलिक अधिकारों को सीमित नहीं किया जा सकता.

जस्टिस जामदार ने यह भी दोहराया कि निर्वासन एक असाधारण कार्रवाई है, क्योंकि इससे किसी नागरिक के स्वतंत्र रूप से आवागमन के मौलिक अधिकार पर रोक लगती है. इसलिए ऐसी कार्रवाई करते समय कानून में निर्धारित आवश्यकताओं का सख्ती से पालन किया जाना जरूरी है.

6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद को कारसेवकों ने गिरा दिया था. इसके बाद देश के कई हिस्सों में सांप्रदायिक हिंसा हुई थी. बाद में इसी विवादित स्थल पर राम मंदिर का निर्माण हुआ और 22 जनवरी 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा हुई.

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