आकलन करने में चूक गई भाजपा : संघ परिवार युवाओं की आवाज क्यों नहीं सुन सका?

‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में आकाश जोशी का यह लेख विश्लेषण करता है कि कैसे अत्यधिक केंद्रीकरण, ध्रुवीकरण और जमीनी संवाद के अभाव के कारण एक विशाल राजनीतिक व सामाजिक नेटवर्क (संघ परिवार) भी युवाओं के आक्रोश (जेन-ज़ीका विरोध प्रदर्शन) को समय रहते भांपने और सुलझाने में असमर्थ रहा.

जोशी के लेख का सारांश कहता है कि दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक महीने से अधिक चले छात्र-युवा विरोध-प्रदर्शनों और तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बावजूद भाजपा का चुनावी और राजनीतिक दबदबा कायम है. संसद में सबसे बड़ी पार्टी होने के साथ-साथ कई राज्यों में इसकी व इसके सहयोगियों की सरकारें हैं। भाजपा की यह सफलता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े व्यापक "संघ परिवार" (जैसे—बीएमएस, एबीवीपी, भाजयुमो, विभिन्न थिंक टैंक और एनजीओ) के सामाजिक व सांस्कृतिक प्रभाव पर टिकी है.

इतना विशाल वैचारिक और संगठनात्मक ढांचा होने के बावजूद संघ परिवार युवाओं और प्रदर्शनकारियों के असंतोष के स्तर का आकलन करने में नाकाम रहा. आंदोलनकारियों व भूख हड़ताल पर बैठे नेताओं से संवाद स्थापित करने के लिए सरकार या संगठन के पास कोई विश्वसनीय मध्यस्थ उपलब्ध नहीं था. दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और भाजयुमो के अध्यक्ष जैसे युवा नेता भी इस संकट के दौरान प्रदर्शनकारियों से संवाद स्थापित करने में विफल रहे.

सत्तारूढ़ व्यवस्था और आंदोलनकारियों के बीच इस दूरी के चार मुख्य कारण हैं:

कैडर और नेतृत्व के बीच संवाद की कमी: 12 साल सत्ता में रहने के कारण पार्टी कार्यकर्ताओं की जनभावनाओं को मापने की क्षमता घटी है और अति-केंद्रीकृत कमान के कारण जमीनी फीडबैक ऊपर तक नहीं पहुँच पाता.

सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण: शीर्ष नेतृत्व के अलावा अन्य नेताओं के पास स्वतंत्र विश्वसनीयता या प्रभाव का अभाव है.

ध्रुवीकरण और संवाद का अभाव: विरोधियों, छात्रों और असंतुष्टों का दानवीकरण (जैसे "राष्ट्रविरोधी" या "अर्बन नक्सल" कहना) किए जाने से सद्भावपूर्ण बातचीत का मध्यस्थ रास्ता (मिडिल ग्राउंड) खत्म हो गया.

वास्तविक समस्याओं की अनदेखी: शिक्षा, बेरोजगारी और संरचनात्मक असमानताओं जैसी बुनियादी समस्याओं पर ध्यान देने के बजाय आत्म-मुग्धता और केवल प्रचार (प्रोपेगैंडा) पर अत्यधिक भरोसा किया गया.

संवैधानिक और संस्थागत संस्थाओं (जैसे चुनाव आयोग) की निष्पक्षता पर उठते सवालों और कमजोर विपक्ष के बीच, जनता के लिए 'सड़कें' ही लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का प्रमुख माध्यम बन गई हैं. हालांकि विपक्ष के लिए इसे सत्ता परिवर्तन का बड़ा मोड़ मानना जल्दबाजी होगी, लेकिन इस घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सरकार की अजेयता का भ्रम अब टूट रहा है.

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