अरुण श्रीवास्तव | ‘तार्किक विसंगति’ का रहस्य: मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के हाथों मताधिकार छीनने का हथियार

विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत ‘तार्किक विसंगति’ (लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी) की श्रेणी एक एल्गोरिदम आधारित व्यवस्था या दक्षिणपंथी राजनीतिक औजार के रूप में सामने आई है. लेखक का आरोप है कि चुनाव आयोग ने इस व्यवस्था को बड़े पैमाने पर मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करने के लिए तैयार किया है. इसके जरिए उन मतदाताओं को निशाना बनाया जा रहा है, जिन्हें दक्षिणपंथी राजनीतिक शक्तियों का विरोधी माना जाता है. इस प्रक्रिया का उद्देश्य चुनावी नतीजों को प्रभावित करना और भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की राजनीतिक परियोजना को आगे बढ़ाना बताया गया है.

इस व्यवस्था के तहत चुनाव आयोग अपने केंद्रीकृत सॉफ्टवेयर नेटवर्क ईआरओनेट और स्वचालित डेटा-मिलान प्रणाली का इस्तेमाल कर मतदाताओं के पारिवारिक संबंधों का मिलान करता है. इस प्रक्रिया को ‘प्रोजेनी मैपिंग’ कहा जाता है. जब एल्गोरिदम को जैविक, गणितीय या लिपिकीय नियमों के अनुरूप कोई विसंगति दिखाई देती है, तो वह संबंधित रिकॉर्ड को ‘तार्किक विसंगति’ के रूप में चिह्नित कर देता है.

लेखक के अनुसार, इस सॉफ्टवेयर की छंटाई व्यवस्था ने मताधिकार से वंचित करने की एक ऐसी प्रक्रिया पैदा कर दी है, जिसमें मामूली लिपिकीय गलतियों के कारण लाखों वैध नागरिकों के नाम संदेह के दायरे में आ जाते हैं. उदाहरण के तौर पर, नामों की वर्तनी में मामूली अंतर को भी सॉफ्टवेयर विसंगति के रूप में चिह्नित कर सकता है. प्रारंभिक मानवीय जांच के बिना ऐसे स्वचालित सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल एक अपारदर्शी व्यवस्था को यह तय करने का अधिकार देता है कि कौन मतदाता सूची में बना रहेगा और किसका नाम हटाया जाएगा.

जब एआई किसी रिकॉर्ड को ‘तार्किक विसंगति’ के रूप में चिह्नित करता है, तो संबंधित व्यक्ति को नोटिस जारी कर अपनी नागरिकता और मतदाता होने की पात्रता साबित करने के लिए व्यक्तिगत सुनवाई में उपस्थित होने को कहा जाता है. इससे जिम्मेदारी राज्य के बजाय नागरिकों पर आ जाती है. कई लोगों के पास न तो जरूरी दस्तावेज होते हैं और न ही ऐसी कानूनी प्रक्रिया को समझने और उसका सामना करने के पर्याप्त संसाधन. इस तरह तकनीक का इस्तेमाल मतदान के अधिकार के सामने कृत्रिम बाधा खड़ी करता है. लेखक का दावा है कि पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, दिल्ली और तेलंगाना जैसे राज्यों में इससे मतदाताओं की संख्या सीमित करने का रास्ता तैयार हुआ है.

विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की स्वचालित प्रक्रिया पर सवाल उठाए. अदालत ने कहा कि इन मानकों के निर्धारण में मानवीय स्तर पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया है. लेखक का मानना है कि अदालत को मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से इस व्यवस्था की शुरुआत के समय ही इसके औचित्य और आधार के बारे में स्पष्टीकरण मांगना चाहिए था.

लेख में आरोप लगाया गया है कि ‘तार्किक विसंगति’ और फॉर्म 6 के बदले हुए इस्तेमाल के जरिए गरीबों, दलितों और अल्पसंख्यकों को मताधिकार से वंचित किया जा रहा है. मसौदा मतदाता सूची से बाहर किए गए लाखों पुराने मतदाताओं को दोबारा आवेदन करने के लिए फॉर्म 6 भरने को कहा जा रहा है. यह फॉर्म मुख्य रूप से पहली बार मतदाता बनने वाले लोगों के पंजीकरण के लिए है. इसमें आवेदक को यह घोषणा करनी होती है कि उसका नाम पहले कभी मतदाता सूची में दर्ज नहीं रहा और उसने पहले मतदान नहीं किया है. ऐसे में पहले से पंजीकृत मतदाताओं को यह घोषणा करने के लिए बाध्य करना उन्हें गलत जानकारी देने और कानूनी कार्रवाई के जोखिम में डाल सकता है.

लेखक सवाल उठाते हैं कि क्या इस प्रक्रिया का उद्देश्य केवल मतदाताओं को सूची से बाहर करना है या उन्हें आपराधिक कार्रवाई के दायरे में लाना भी है. फॉर्म 6 को लेकर कानूनी और राजनीतिक विवाद इसी कारण बढ़ा है. लेखक का आरोप है कि इससे मतदाता पंजीकरण की सामान्य प्रक्रिया को पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलने वाली बाधा में बदल दिया गया है. उनका दावा है कि इस व्यवस्था को एकतरफा तरीके से लागू किया गया, ताकि विपक्ष के समर्थक माने जाने वाले मतदाताओं को नुकसान पहुंचाया जा सके.

इस विवाद में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका भी सवालों के घेरे में है. लेखक का आरोप है कि अदालत ने चुनाव आयोग पर भरोसा किया, लेकिन आयोग ने इस भरोसे का गलत इस्तेमाल किया. आयोग ने अपनी व्यवस्था को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी से जुड़ा हुआ बताया, जिस पर अदालत ने नाराजगी जताते हुए कहा, “हमारे मुंह में अपने शब्द मत डालिए.” अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने इन बदलावों की वैधता पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया था. साथ ही, उसने उन प्रशासनिक रिकॉर्ड की मांग की, जिनसे यह पता चल सके कि डिजिटल बदलावों को मंजूरी किसने दी थी.

अदालत ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि केवल घर बदलने या घर-घर जाकर गणना के दौरान अनुपस्थित रहने वाले नागरिकों को नए मतदाताओं की तरह क्यों माना जा रहा है. उसने पता बदलने के लिए फॉर्म 8 या सरल सत्यापन प्रक्रिया अपनाने का निर्देश दिया.

शहर आधारित शोध संस्था साबर इंस्टीट्यूट के एक अध्ययन के अनुसार, कोलकाता की मतदाता सूची से एसआईआर के दौरान हर चार में से एक नाम हटा दिया गया. कोलकाता नगर निगम क्षेत्र की विधानसभा सीटों में एसआईआर से पहले 42,03,411 मतदाता थे. इनमें से 10,50,905 नाम हटा दिए गए, जो कुल मतदाताओं का लगभग 25 प्रतिशत है. हटाए गए नामों में 2,81,549 लोगों को मृत दर्ज किया गया, जबकि शेष 7,69,356 जीवित मतदाता थे. इनमें से लगभग 2.66 लाख मतदाताओं को न्यायिक जांच के दायरे में रखा गया. बाद की पूरक सूचियों में इनमें से 1,26,473 नाम हटा दिए गए. इन्हें ‘तार्किक विसंगति’ के आधार पर हटाए गए नाम बताया गया है.

लेखक का तर्क है कि यह व्यवस्था हिंदुत्व की राजनीति को आगे बढ़ाने का औजार बन गई है. उनके अनुसार, बीजेपी की चुनावी जीत के बावजूद 2024 के लोकसभा चुनाव ने संकेत दिया कि मौजूदा चुनावी व्यवस्था को उसकी सफलता की गारंटी नहीं माना जा सकता. उनका आरोप है कि इसी कारण दक्षिणपंथी राजनीतिक शक्तियां एसआईआर और स्वचालित एल्गोरिदम के जरिए अपने प्रतिकूल मतदाताओं के नाम हटाने की कोशिश कर रही हैं.

लेख में यह भी आरोप लगाया गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के निर्देश पर चुनाव आयोग इस स्वचालित व्यवस्था का इस्तेमाल विपक्ष के मजबूत क्षेत्रों और अल्पसंख्यक आबादी वाले जिलों में कर रहा है. पश्चिम बंगाल में लाखों नामों को चिह्नित किया गया या न्यायिक जांच के दायरे में रखा गया. हालांकि, एल्गोरिदम के सटीक मानदंड और मापदंड अब तक सार्वजनिक नहीं किए गए हैं. चुनाव आयोग और उसके समर्थकों का कहना है कि यह पुरानी और गलत मतदाता सूचियों को ठीक करने की निष्पक्ष और कानूनी प्रक्रिया है, जबकि लेखक इसे भ्रामक दावा मानते हैं.

28 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने ‘तार्किक विसंगति’ की श्रेणी की वैधता पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है. पश्चिम बंगाल में पहले दी गई अनुमति केवल अंतरिम व्यवस्था थी. इसके बावजूद लेखक का सवाल है कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने के बाद भी अदालत ने इस प्रक्रिया को रोकने के लिए तत्काल कदम क्यों नहीं उठाया.

लेख का निष्कर्ष है कि नुकसान पहले ही हो चुका है. करीब एक करोड़ मतदाताओं को 2026 के विधानसभा चुनाव में अपने संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल करने से वंचित होना पड़ा. लेखक को आशंका है कि ये मतदाता 2029 के लोकसभा चुनाव में भी अपने मताधिकार का इस्तेमाल नहीं कर पाएंगे. उनका आरोप है कि ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में चुनाव आयोग की भूमिका ने इस स्थिति को जन्म दिया है. न्यायमूर्ति बागची की यह टिप्पणी कि मतदाता अगली बार अपने संवैधानिक अधिकार का इस्तेमाल कर सकते हैं, इस सवाल को और गंभीर बनाती है कि क्या मतदान का अधिकार मौजूदा शासन व्यवस्था में वास्तव में प्रभावी और सुनिश्चित अधिकार रह गया है.

(अरुण श्रीवास्तव का यह लेख ‘काउंटरकरंट्स’ में प्रकाशित मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी में अनूदित सारांश है.)

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