भारत में छात्र आंदोलन अब नीट पेपर लीक और शिक्षा के मुद्दे से आगे बढ़कर चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता तक पहुंच गए हैं. शिक्षा मंत्री का इस्तीफा हासिल करने के बाद प्रदर्शनकारी अब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं. कई कार्यकर्ताओं और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह आंदोलन मोदी सरकार के लिए निर्णायक झटका साबित हो सकता है.
हालांकि, इन प्रदर्शनों ने नरेंद्र मोदी की अचूक और सर्वशक्तिमान नेता वाली छवि को नुकसान पहुंचाया है, लेकिन क्या इनमें मौजूदा सरकार को गिराने की क्षमता है? इसकी संभावना कम दिखाई देती है. यह आंदोलन विपक्षी दलों के लिए एक ऐसे जाल में बदलता नजर आ रहा है, जिसका व्यापक सामाजिक आधार नहीं बन पाया है. इसका प्रभाव मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों, शिक्षित युवाओं और कार्यकर्ताओं तक सीमित है.
इसकी पहली वजह विपक्ष का ‘संविधान बचाओ’ और ‘लोकतंत्र बचाओ’ का नारा है. आम लोगों के लिए ये विचार कुछ हद तक अमूर्त हैं. संवैधानिक नैतिकता और सिद्धांतों की भाषा आम जनजीवन और जन आंदोलनों से सीधे जुड़ने में अक्सर सफल नहीं रही है. संविधान की मर्यादा बनाए रखने की मांग लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन इसमें कानूनी प्रावधानों और तकनीकी पहलुओं की जटिलता भी शामिल है. आम लोग अपनी रोजमर्रा की जिंदगी को सांस्कृतिक मूल्यों और सामाजिक अनुभवों के आधार पर समझते हैं.
चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए ये प्रदर्शन महत्वपूर्ण हैं, लेकिन चुनौती यह है कि इनकी मांगों को छोटे शहरों और ग्रामीण भारत के लोगों के दैनिक अनुभवों से कैसे जोड़ा जाए. लोकतंत्र और समानता जैसे आधुनिक विचारों को रोजमर्रा के सांस्कृतिक प्रतीकों से जोड़ने में महात्मा गांधी सफल रहे थे. उन्होंने संप्रभुता के सवाल को नमक बनाने और उसका उपभोग करने के अधिकार से जोड़ा. नमक स्वराज, सम्मान और अधिकार हासिल करने का प्रतीक बन गया. नमक जैसी सामान्य वस्तु ने जाति, वर्ग और ग्रामीण-शहरी विभाजन से परे लोगों को एकजुट किया.
‘वोट चोरी’ अभियान को समाज के हाशिये पर रहने वाले लोगों तक पहुंचाने के लिए मतदान के अधिकार को शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, रोजगार और जीवन की अन्य बुनियादी जरूरतों से जोड़ना होगा. विपक्षी दल और सामाजिक कार्यकर्ता अभी तक ऐसा राजनीतिक विमर्श तैयार नहीं कर पाए हैं, जो मतदान के अधिकार को कल्याणकारी नीतियों से जोड़ सके.
इस चुनौती की एक वजह यह भी है कि बीजेपी पहले से ही ऐसी कल्याणकारी योजनाएं लागू कर रही है, जिनका वादा विपक्ष भी करता है. इनमें मुफ्त राशन, महिलाओं के लिए मुफ्त बस पास और अन्य योजनाएं शामिल हैं. बीजेपी ने इन योजनाओं के साथ सड़कों और राजमार्गों जैसे बुनियादी ढांचे के निर्माण को भी जोड़ा है. नौकरशाही पर अपनी पकड़ और मजबूत संगठन के कारण सेवा वितरण के मामले में बीजेपी को कुछ बढ़त भी हासिल है.
आम लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए विपक्ष को केवल योजनाओं और तत्काल लाभ तक सीमित रहने के बजाय व्यापक सामाजिक बदलाव पर आधारित कल्याणकारी नीतियों की ओर बढ़ना होगा. इसके लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सामाजिक क्षेत्रों में बजट आवंटन बढ़ाना जरूरी है. सवाल यह है कि क्या विपक्ष नवउदारवादी सोच और तात्कालिक लाभ पर आधारित कल्याणकारी राजनीति से आगे बढ़ना चाहता है? फिलहाल ऐसा होता दिखाई नहीं देता. आर्थिक नीतियों को लेकर विपक्ष की सोच भी बीजेपी से बहुत अलग नहीं है. यही वजह है कि ‘वोट चोरी’ एक अलग-थलग मांग बनकर रह गई है.
बिहार में इसके संकेत दिखाई दिए. राहुल गांधी और तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले अभियान में बड़ी रैलियों और प्रदर्शनों के बावजूद विपक्ष को अपेक्षित चुनावी लाभ नहीं मिला. विपक्ष ने खराब स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाओं, बेरोजगारी तथा युवाओं में बढ़ते असंतोष के कारण पैदा हुई सत्ता-विरोधी भावना को प्रभावी ढंग से अपने पक्ष में नहीं किया. पिछले विधानसभा चुनाव में तेजस्वी यादव का 10 लाख नौकरियां देने का वादा बेहतर चुनावी परिणाम दिलाने में सहायक रहा था.
विपक्ष का तर्क है कि यदि चुनावी प्रक्रिया ही प्रभावित हो, तो बड़े वादे करने के बावजूद सत्ता में कैसे आया जा सकता है? इस तरह विपक्ष एक ऐसी दुविधा में फंस गया है, जिसमें यह तय करना मुश्किल हो रहा है कि पहले चुनावी प्रक्रिया को ठीक किया जाए या जनता के मुद्दों पर व्यापक समर्थन जुटाया जाए.
एसआईआर अभियान मतदाता सूची से नाम हटाने तक सीमित नहीं
दूसरी बात यह है कि बीजेपी ने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की पूरी कवायद को केवल चुनावी गड़बड़ी और मतदाता सूची में हेरफेर के जरिए चुनाव जीतने तक सीमित नहीं रखा है. इसके पीछे सामाजिक ध्रुवीकरण की एक व्यापक और गहरी रणनीति भी दिखाई देती है. हालिया आंकड़ों से संकेत मिलता है कि मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया समान रूप से नहीं हुई है. हटाए गए नामों में बड़ी संख्या मुसलमानों और दलितों की बताई गई है.
यही वजह है कि ‘वोट चोरी’ के खिलाफ लगातार अभियान चलाने के बावजूद विपक्ष उन लोगों को संगठित नहीं कर पाया, जिनके नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं. ऐसा करने के लिए बड़ी संख्या में मुसलमानों को सड़कों पर लाना होगा. इससे बीजेपी के हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण और तुष्टीकरण के आरोपों वाले राजनीतिक विमर्श को और बल मिल सकता है.
लेखक के अनुसार, बीजेपी उच्च जातियों और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के बीच अपना समर्थन मजबूत करते हुए मुसलमानों और दलितों को चुनावी प्रक्रिया से बाहर रखने की रणनीति पर काम करती दिखाई देती है. इस स्थिति में विपक्ष अपने कार्यकर्ताओं और अब जेन जी के सहारे आंदोलन को आगे बढ़ा रहा है, लेकिन इस गतिरोध से निकलने की उसके पास कोई स्पष्ट रणनीति नहीं है. नतीजतन, विपक्ष मतदाता सूची से नाम हटाए जाने की बात तो करता है, लेकिन प्रभावित लोगों की सामाजिक पहचान और संरचना पर खुलकर चर्चा नहीं करता.
इसका परिणाम यह है कि प्रदर्शन धीरे-धीरे विशेषाधिकार प्राप्त वर्गों तक सीमित आंदोलन बनते जा रहे हैं. लोकतांत्रिक संकट का विमर्श जंतर-मंतर तक सिमटकर रह गया है. आंदोलन का मौजूदा स्वरूप बीजेपी के लिए बड़ी राजनीतिक चिंता का कारण बनेगा या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि विपक्ष इसे आम लोगों की रोजमर्रा की समस्याओं और सामाजिक-आर्थिक अधिकारों से किस तरह जोड़ पाता है.
(अजय गुडावर्थी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर पॉलिटिकल स्टडीज में राजनीति विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर हैं. यह लेख ‘द प्रिंट’ में प्रकाशित उनके मूल अंग्रेजी लेख का हिंदी रूपांतरण है.)

