सरकार रीढ़ वाले जजों का सम्मान करती है… चंद्रचूड़ बहुत अधिक दब्बू थे; सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस कौल

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश, जस्टिस संजय किशन कौल की आने वाली आत्मकथा 'विदाउट फियर ऑर फेवर' ने न्यायपालिका और कार्यपालिका के संबंधों पर एक नई बहस छेड़ दी है.  पुस्तक के अनुसार, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) डी.वाई. चंद्रचूड़ न्यायिक नियुक्तियों के मामले में "सरकार के प्रति अत्यधिक दब्बू" थे. जस्टिस कौल का यह संस्मरण एक ऐसे समय में आया है जब सर्वोच्च न्यायालय की स्वतंत्रता और सरकार के साथ उसके संतुलन पर लगातार सवाल उठ रहे हैं.

नियुक्तियों में सरकार का अत्यधिक दखल और 'पूर्व-स्वीकृति'

ऋतु सरीन के मुताबिक, जस्टिस कौल (जो दिसंबर 2023 में सीजेआई के बाद सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश के रूप में सेवानिवृत्त हुए थे) ने अपनी किताब में खुलासा किया है कि सीजेआई चंद्रचूड़ अक्सर कॉलेजियम की औपचारिक बैठक से पहले ही सरकार की मंजूरी मांग लेते थे. एक बार तो उन्होंने एक अल्पसंख्यक-धर्म के न्यायाधीश उम्मीदवार की जाति और पृष्ठभूमि को लेकर सरकार के "अजीबोगरीब" सवालों को भी सामने रखा.

ऐसी ही एक घटना का जिक्र करते हुए कौल बताते हैं कि एक बार जब कॉलेजियम की बैठक में एक नया नाम अचानक जोड़ा गया और सीजेआई ने सरकार का रुख जानने की बात कही, तो उनका विवाद इतना बढ़ा कि वे बैठक से "वॉकआउट" कर गए. हालांकि, कुछ समय बाद सरकार को झुकना पड़ा और वह नाम पारित हो गया. कौल का मानना है कि यदि आप राजनीतिक वर्ग को थोड़ा भी अवसर देंगे, तो वे उसका लाभ उठाएंगे. उन्होंने यह भी लिखा कि सरकार उन जजों का बहुत सम्मान करती है जिनकी अपनी रीढ़ होती है और जो खुद का सम्मान करना जानते हैं.

कॉलेजियम प्रणाली की खामियां और एनजेएसी विवाद

जस्टिस कौल ने कॉलेजियम प्रणाली को "गंभीर रूप से अपूर्ण" बताया है, जिसमें अपारदर्शिता और सत्ता का केंद्रीकरण जैसी कमियां हैं. उनका मानना है कि 2015 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) को न्यायपालिका द्वारा तुरंत खारिज करने के बजाय उसे काम करने का एक मौका दिया जाना चाहिए था. राजनीतिक शाखा आज भी एनजेएसी की असफलता से पूरी तरह उबर नहीं पाई है, जिससे कई बार अप्रत्यक्ष दबाव देखने को मिलता है.

इसके बावजूद, कौल यह स्पष्ट करते हैं कि यदि कार्यपालिका के साथ दृढ़ता से पक्ष रखा जाए, तो वह अनुचित नहीं होती. उन्होंने कई ऐसे उदाहरण दिए हैं जहाँ उनके हस्तक्षेप के बाद दिल्ली और अन्य उच्च न्यायालयों के जजों की नियुक्ति और वरिष्ठता के मामलों में सरकार ने अंततः उनकी बात मानी.

मामलों का स्थानांतरण और व्यक्तिगत पछतावे

संस्मरण में न्यायिक पक्ष से जुड़े अन्य विवादों का भी जिक्र है.  उदाहरण के लिए, धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के फैसले पर पुनर्विचार से जुड़ी याचिकाओं को जब उनकी पीठ ने सूचीबद्ध किया, तो सरकार इसे लेकर असहज थी. बाद में वह मामला बिना किसी पूर्व सूचना के दूसरी पीठ को सौंप दिया गया. कौल ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि मामलों को इस आशंका से एक पीठ से दूसरी पीठ में नहीं ट्रांसफर किया जाना चाहिए कि कोई विशेष पीठ क्या फैसला दे सकती है. कौल ने इसमें यह बताया है कि डी.वाई. चंद्रचूड़ ने उनसे पीएमएलए के प्रमुख प्रावधानों को बरकरार रखने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार की मांग करने वाली याचिकाओं में "मध्यम मार्ग" अपनाने के लिए कहा था. 

इसी तरह, वरिष्ठ अधिवक्ताओं के पदनामों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्तियों को उनकी सेवानिवृत्ति के ठीक बाद तक टाल दिए जाने जैसी घटनाओं को उन्होंने अपने कार्यकाल के "व्यक्तिगत पछतावे" के रूप में रेखांकित किया है.

अदालत की सीमाएं और निष्पक्षता

राजनीतिक मामलों में अदालत की भूमिका पर बात करते हुए जस्टिस कौल ने स्पष्ट किया कि अदालत को विपक्ष की "रक्षात्मक कार्रवाई" का जरिया नहीं बनना चाहिए. उन्होंने राफेल लड़ाकू विमान सौदे का उदाहरण दिया, जहां उनकी पीठ ने याचिकाओं को खारिज कर दिया था.  उनका मानना है कि अदालत एक 'चेक एंड बैलेंस' (नियंत्रण और संतुलन) की व्यवस्था है, जिसे किसी भी लोकलुभावन दबाव में आए बिना अपने संवैधानिक दायरे में काम करना चाहिए.

1958 में एक कश्मीरी परिवार में जन्मे और दिल्ली विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त जस्टिस कौल ने अपने 22 वर्षों के लंबे न्यायिक कार्यकाल में कलात्मक स्वतंत्रता (एम.एफ. हुसैन और पेरुमल मुरुगन मामले), 'भूल जाने के अधिकार' (पुट्टास्वामी फैसला) और अनुच्छेद 370 जैसे कई ऐतिहासिक मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. उनके ये खुलासे न्यायपालिका के भीतर के उन अनकहे संघर्षों को सामने लाते हैं जो आमतौर पर जनता की नजरों से दूर रहते हैं.

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