“हमें जंगल में फेंक दिया गया”: रेसकोर्स के विस्थापित परिवारों की रोजी-रोटी और बच्चों की पढ़ाई पर संकट

‘मकतूब मीडिया’ की रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली के रेसकोर्स इलाके में करीब 717 घरों को तोड़े जाने के कई महीने बाद वहां रहने वाले परिवारों को रोजी-रोटी, बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं से जुड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. इन परिवारों को उत्तर-पश्चिमी दिल्ली के सावदा घेवरा में बसाया गया है, जो उनके पुराने घरों से लगभग 40 से 45 किलोमीटर दूर है. निवासियों का कहना है कि विस्थापन ने उनकी आजीविका छीन ली है और उन्हें बुनियादी सुविधाओं के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है.

29 अक्टूबर 2025 को भूमि एवं विकास कार्यालय (एलएंडडीओ) ने जनवरी 2024 में दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) के साथ किए गए संयुक्त सर्वेक्षण के आधार पर बेदखली और पुनर्वास के नोटिस जारी किए थे. भाई राम कैंप, डीआईडी कॉलोनी और मस्जिद कैंप के निवासियों को दो श्रेणियों में बांटा गया. कुछ परिवारों को दिल्ली शहरी आश्रय सुधार बोर्ड (डूसिब) की नीति के तहत पुनर्वास के योग्य माना गया और 15 दिनों के भीतर सावदा घेवरा में आवंटित फ्लैटों में जाने का निर्देश दिया गया. बाकी परिवारों को पुनर्वास के अयोग्य बताते हुए सरकारी जमीन पर उनका कब्जा अनधिकृत करार दिया गया और घर खाली करने को कहा गया.

निवासियों ने दिल्ली स्लम एवं झुग्गी-झोपड़ी पुनर्वास तथा पुनर्स्थापन नीति, 2015 का हवाला देते हुए कहा कि वैकल्पिक आवास पुराने स्थान पर या पांच किलोमीटर के दायरे में दिया जाना चाहिए. हालांकि, नीति में विशेष परिस्थितियों में डूसिब की पूर्व अनुमति से इससे अधिक दूरी पर पुनर्वास का प्रावधान भी है. केंद्र सरकार और डूसिब ने अदालत में दलील दी कि जमीन का इस्तेमाल रक्षा संबंधी बुनियादी ढांचे के विस्तार और मजबूती के लिए जरूरी है.

25 अगस्त 2026 को दिल्ली हाई कोर्ट ने विस्थापन को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज कर दीं और निवासियों को सावदा घेवरा में आवंटित आवासों में जाने का निर्देश दिया. हालांकि, अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार पर जोर देते हुए अधिकारियों को पुनर्वास संबंधी निर्देशों का पालन करने को कहा. घरों का सामान पहुंचाने की व्यवस्था करने और पुनर्वास की निगरानी के लिए सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी मनमोहन शर्मा की अध्यक्षता में समिति गठित की गई. 28 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने भी अधिकारियों को हाई कोर्ट के निर्देशों का शीघ्र पालन करने और वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराने को कहा.

निवासियों के मुताबिक, नए स्थान पर पहुंचने के बाद कई लोगों का काम छूट गया है. रेसकोर्स में घोड़ों की देखभाल का काम करने वाले सलीम ने बताया कि विस्थापन के बाद उनका रोजगार पूरी तरह बंद हो गया है. भाई राम कैंप के प्रधान राकेश बंसल ने कहा कि निकटतम अस्पताल लगभग 15 किलोमीटर दूर है, जबकि पहले सफदरजंग अस्पताल तक दस मिनट में पहुंचा जा सकता था. उन्होंने दावा किया कि कम से कम तीन लोगों की दिल का दौरा पड़ने से उचित इलाज मिलने से पहले मौत हो चुकी है. बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित हुई है. कुछ बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं, जबकि कई को पुराने स्कूलों तक पहुंचने के लिए सुबह पांच बजे उठना पड़ता है और लगभग दो घंटे यात्रा करनी पड़ती है.

मस्जिद कैंप की प्रधान शाइस्ता खान ने आरोप लगाया कि मुस्लिम होने के कारण उन्हें पुराने इलाके के पास किराये पर घर नहीं मिला. उन्होंने पुनर्वास सर्वेक्षण में गड़बड़ियों का भी आरोप लगाया. कई परिवारों को फ्लैट नहीं मिले और वे अब भी आवास की तलाश में हैं. निवासियों ने नए फ्लैटों की खराब हालत, इंटरनेट की समस्या और परिवहन पर बढ़ते खर्च की शिकायत की है. कुछ परिवारों ने पुराने इलाके के पास किराये पर रहना चुना, जिससे उन पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ा.

इस बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आधिकारिक आवास के पास स्थित ऐतिहासिक रेसकोर्स मस्जिद पर भी ध्वस्तीकरण का खतरा मंडरा रहा है. एलएंडडीओ ने परिसर को अनधिकृत बताते हुए इमाम को छह दिनों के भीतर जगह खाली करने का निर्देश दिया है. हालांकि, मस्जिद और उससे लगा कब्रिस्तान दिल्ली प्रशासन की 1977 की राजपत्र अधिसूचना में वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज हैं और मस्जिद को नई दिल्ली नगरपालिका परिषद ने विरासत संपत्ति के रूप में मान्यता दी है. 7 अक्टूबर को मस्जिद की बिजली और पानी की आपूर्ति काट दी गई तथा नमाजियों की आवाजाही सीमित कर दी गई. दिल्ली वक्फ बोर्ड ने आवश्यक सेवाएं बहाल करने और मस्जिद की सुरक्षा की मांग की है.

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