आरक्षण का विरोध करने वालों के लिए सैलूनों से एक सबक, जहाँ दलित युवाओं ने जातिगत बाधाओं को दी चुनौती

मई में, पुरी जिले की सौरिया ग्राम पंचायत के अंतर्गत जोराकानी भोई सही के दृढ-संकल्पित दलित युवाओं के एक समूह ने उन सैलूनों में बाल कटवाने की मांग करके अपनी बात रखने का फैसला किया, जो पारंपरिक रूप से केवल उच्च जातियों की सेवा करते आए थे.

युवाओं का यह प्रयास विफल रहा और इसने छुआछूत की इस प्रथा के खिलाफ एक कानूनी लड़ाई को जन्म दे दिया—एक ऐसी प्रथा जो भारत द्वारा सभी के लिए समानता, स्वतंत्रता और न्याय की गारंटी देने वाले संविधान को अपनाने के 76 साल बाद भी जारी है.

बसंत कुमार मोहंती के अनुसार, यह घटना ऐसे समय में सामने आई है जब संपन्न वर्गों ने जाति-आधारित आरक्षण और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम को कमजोर करने की मांग को लेकर एक अभियान चला रखा है.

पास के घोड़ाड़िया बाजार में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) से आने वाले नाइयों द्वारा संचालित छह सैलून हैं. पारंपरिक रूप से, गांवों से होकर गुजरने वाले जुलूसों में मंदिरों की मूर्तियों को ले जाने वाली लकड़ी की पालकियों के आगे नाई ही अनुष्ठानिक दीपक पकड़ते आए हैं.

ट्यूशन पढ़ाकर अपना गुजारा करने वाले 26 वर्षीय स्नातक भगीरथी कांडी ने बताया कि सभी दुकानों ने उन्हें प्रवेश देने से मना कर दिया. भगीरथी ने कहा, "उन्होंने (नाइयों ने) कहा कि वे मंदिर में भगवान की सेवा करते हैं और यदि वे हमारे बाल काटेंगे तो उनकी जाति भ्रष्ट हो जाएगी. उन्होंने यह भी कहा कि इससे भगवान भी नाराज हो जाएंगे."

दलित युवाओं ने डेलांग पुलिस स्टेशन में एससी/एसटी एक्ट के तहत प्राथमिकी दर्ज कराई और सैलून मालिकों के नाम नामजद किए. भगीरथी ने बताया कि प्रभावशाली ब्राह्मण और खंडायत जातियों के लोगों ने दलितों को प्रवेश न देने के नाइयों के रुख का समर्थन किया है.

भगीरथी ने कहा, "उच्च जाति के लोगों ने पुलिस से मुलाकात की और नाइयों के खिलाफ कोई कार्रवाई न करने की मांग की. उन्होंने कहा कि दलितों के बाल काटने का मतलब होगा कि नाइयों का सामाजिक दर्जा नहीं रहेगा और वे धार्मिक आयोजनों में अपनी सेवाएं नहीं दे पाएंगे. हम आज भी इस छुआछूत का सामना कर रहे हैं."

30 वर्षीय नंदू कांडी ने कहा कि जब तक सैलून दलितों के लिए अपने दरवाजे नहीं खोल देते, तब तक यह लड़ाई जारी रहेगी.

दलितों द्वारा स्थापित मंगला मंदिर की ओर इशारा करते हुए नंदू ने कहा, "दलितों का बहिष्कार केवल सैलूनों तक सीमित नहीं है. हमें गांव के किसी भी त्योहार में शामिल होने की अनुमति नहीं है. हम अपने त्योहार खुद मनाते हैं."

नंदू ने आगे कहा, "ब्राह्मण पुजारी हमारे मंदिर में नहीं आते. हमारी जाति का एक परिवार वैष्णव गोसाईं (दलित पुजारी) है, वही मंदिर में अनुष्ठान करता है. होली या दिवाली पर हम आपस में ही खुशियाँ मना लेते हैं."

अधिकार कार्यकर्ता अक्षय बेहरा ने कहा कि जोराकानी के दलितों में लड़ाई लड़ने की हिम्मत इसलिए आई क्योंकि उनमें से कई युवा अब शिक्षित हैं.

बेहरा ने कहा, "अगर हम सवर्णों (उच्च जाति) से लड़ने में सक्षम हैं, तो यह आरक्षण की वजह से है जिसने हमें शिक्षित होने में मदद की. 25 दलित परिवारों में पाँच-छह स्नातक हैं. वे अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक हैं। नाइयों ने ब्राह्मणों और खंडायतों (एक ज़मींदार योद्धा जाति) के समर्थन से दलितों को कभी प्रवेश नहीं करने दिया था, लेकिन अब यह आगे नहीं चल सकता."

उन्होंने जाति-आधारित आरक्षण और एससी/एसटी एक्ट को खत्म करने के अभियान की आलोचना की.

बेहरा ने कहा, "पुलिस एफआईआर पर कुंडली मारे बैठी है. हालाँकि मामला एससी/एसटी एक्ट के तहत दर्ज किया गया है, फिर भी वे इसे कोई महत्व नहीं दे रहे हैं. केवल कानून होना ही काफी नहीं है, इसे ठीक से लागू किया जाना चाहिए. जो लोग जाति-आधारित आरक्षण को खत्म करने और एससी/एसटी एक्ट को रद्द करने की मांग कर रहे हैं, उन्हें घोड़ाड़िया आकर देखना चाहिए कि दलितों के खिलाफ छुआछूत और अत्याचार किस तरह जारी हैं."

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