अपूर्वानंद | मनुस्मृति विवाद हिंदू एकता के मिथक को कैसे उजागर करता है
'फ्रंटलाइन' में प्रोफेसर अपूर्वानंद लिखते हैं कि राहुल गांधी ने पितृसत्ता पर हमला करते हुए जब “मनुस्मृति मानसिकता” की आलोचना की, तो इतने सारे हिंदू नाराज क्यों हो गए? इनमें वे हिंदू भी शामिल हैं, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस के आलोचक रहे हैं. हालांकि उनकी आपत्तियां अलग-अलग हैं.
कुछ लोगों का कहना है कि शायद ही किसी हिंदू परिवार में मनुस्मृति की प्रति मौजूद हो. कुछ कहते हैं कि उन्होंने जीवन में कभी किसी को मनुस्मृति का नाम लेते तक नहीं सुना. वहीं कुछ लोगों का तर्क है कि इस ग्रंथ में कई अच्छी बातें भी हैं, इसलिए इसे पूरी तरह खारिज करना उचित नहीं है.
लेकिन एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है, जिसकी नाराजगी अलग आधार पर है. उसे लगता है कि मनुस्मृति का उल्लेख करके राहुल गांधी ने हिंदुओं का अपमान किया है. उनका कहना है कि मनुस्मृति को हिंदू धार्मिक ग्रंथ माना जाता है. सवाल यह है कि यदि हिंदू परिवारों में इसका उल्लेख या इस्तेमाल सामान्य नहीं है, तो इसकी आलोचना को हिंदुओं का अपमान कैसे माना जा सकता है?
यह कहना भी सही नहीं होगा कि राहुल गांधी के बयान से सभी हिंदू नाराज हैं. इस नाराज समूह में दलितों की अनुपस्थिति साफ दिखाई देती है. तथाकथित पिछड़े समुदायों के लोग भी मनुस्मृति के बचाव में सामने नहीं आ रहे हैं. मौजूदा विवाद पर हो रही प्रतिक्रियाओं से पता चलता है कि हिंदू समाज के कौन से हिस्से इस ग्रंथ को अपना मानते हैं और कौन इससे कोई विशेष जुड़ाव नहीं रखते.
यदि राहुल गांधी के आलोचकों का तर्क स्वीकार भी कर लिया जाए, तब भी मनुस्मृति पर हमला हिंदुओं पर हमला नहीं कहा जा सकता. हिंदुओं का एक बड़ा वर्ग राहुल गांधी के समर्थन में खुलकर नहीं बोल रहा है, लेकिन वह उनसे असहमति भी नहीं जता रहा.
मनुस्मृति विवाद ने एक बार फिर उस सच्चाई को सामने ला दिया है, जिसे हम अक्सर देखना नहीं चाहते. हिंदू समाज कोई एकसमान समाज नहीं है. हिंदू एकता का दावा मुख्यतः दावा ही बना हुआ है. मुसलमानों को सामने रखकर राजनीतिक हिंदू एकता बनाई जा सकती है, क्योंकि मुसलमानों के खिलाफ संघर्ष में ही हिंदुत्व की पहचान गढ़ी जाती है.
लेकिन जिस ग्रंथ को सवर्ण हिंदुओं का एक हिस्सा अपना धार्मिक ग्रंथ मानता है, उसे दलित हिंदू अपने उत्पीड़न को सही ठहराने वाले सैद्धांतिक आधार के रूप में देखते हैं. सवर्ण समुदायों की महिलाएं भी मनुस्मृति के बचाव में बोलती दिखाई देती हैं, लेकिन दलित समुदायों की महिलाओं को इसका बचाव करने की कोई जरूरत महसूस नहीं होती.
इसलिए राहुल गांधी की टिप्पणी से सभी हिंदू आहत नहीं हुए. सवर्ण हिंदुओं का एक बड़ा हिस्सा मनुस्मृति के पक्ष में खड़ा हुआ, जबकि बाकी लोग या तो इसके विरोध में हैं या चुप हैं. इससे स्पष्ट है कि राजनीतिक हिंदू एकता कुछ समय के लिए बनाई जा सकती है, लेकिन भावनात्मक हिंदू एकता अभी दूर की बात है. सवाल यह है कि भावनात्मक एकता के बिना राजनीतिक एकता कितने समय तक टिक सकती है.
यह लेख मनुस्मृति पर कोई अकादमिक बहस नहीं है. राहुल गांधी भी ऐसी बहस नहीं कर रहे थे. यह स्वीकार करना होगा कि किसी भी प्राचीन ग्रंथ की संरचना जटिल होती है और उसमें कई स्तर होते हैं. जब बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर ने मनुस्मृति का दहन किया था, तब वे धर्मशास्त्र परंपरा में उसके ऐतिहासिक स्थान से परिचित थे.
लेकिन कुछ ग्रंथ अपनी मूल जटिलता से आगे बढ़कर कुछ विचारों के प्रतीक बन जाते हैं. श्रुति, स्मृति और संहिताओं के बीच मनुस्मृति का स्थान इसलिए अलग है, क्योंकि सामाजिक व्यवस्था और पदानुक्रम को सही ठहराने के लिए बार-बार इसी ग्रंथ का इस्तेमाल किया गया.
आरएसएस और संविधान
आरएसएस का संविधान सभा के गठन और संविधान निर्माण के प्रति विरोध दर्ज है. उसका तर्क था कि संविधान सभा ने मनु के कानूनों को अपनाने के बजाय पश्चिमी न्यायशास्त्र के सिद्धांतों को स्वीकार किया. विनायक दामोदर सावरकर, माधव सदाशिव गोलवलकर और आरएसएस के अनुसार मनुस्मृति भारतीय बुद्धि की स्वदेशी अभिव्यक्ति थी और उसे भारतीय संविधान का आधार बनना चाहिए था.
क्या आरएसएस और उसका राजनीतिक संगठन भारतीय जनता पार्टी यानी बीजेपी अब मनुस्मृति को लेकर अपना रुख बदल चुके हैं? क्या आरएसएस ने कभी मनु के कानूनों के समर्थन वाले अपने पुराने रुख को स्पष्ट रूप से वापस लिया है? इसका जवाब नहीं है.
आरक्षण को लेकर अलग-अलग समय पर आरएसएस के पदाधिकारियों के बदलते बयान उसकी मंशा पर सवाल खड़े करते हैं. संगठन ने कभी स्पष्ट रूप से ब्राह्मणवादी श्रेष्ठता को खारिज नहीं किया. आज भी वह जाति के पूर्ण विनाश की बात नहीं करता, बल्कि “समरसता” की बात करता है. इसका अर्थ है कि जाति व्यवस्था को बनाए रखते हुए सामाजिक सद्भाव की बात करना.
इस सोच में हर व्यक्ति को समाज में दी गई अपनी जगह से संतुष्ट रहने के लिए कहा जाता है. आरएसएस आंबेडकर को सम्मान देने के लिए मजबूर है, क्योंकि केवल सवर्ण वोटों के आधार पर वह बहुमत हासिल नहीं कर सकता. उसे दलित और वंचित जातियों के मतदाताओं तक भी पहुंचना पड़ता है.
संगठन लगातार हिंदू भाईचारे का मंत्र दोहराता है, लेकिन उसके भीतर जातिगत भेदभाव रोजमर्रा की वास्तविकता बना हुआ है. आरएसएस के एक सवर्ण सदस्य ने बताया कि संगठन में रोज एक मंत्र पढ़ा जाता है, जिसका अर्थ है कि सभी हिंदू भाई हैं, कोई हिंदू नीचा या inferior नहीं है, हिंदुओं की रक्षा करना सभी का कर्तव्य है और सभी हिंदू समान हैं.
लेकिन उसी सदस्य ने संगठन के भीतर का दूसरा अनुभव भी साझा किया. उसके अनुसार, तथाकथित निचली जातियों से आने वाले कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों को तथाकथित ऊंची जातियों के लोग अपमानित और भेदभाव का शिकार बनाते हैं. राष्ट्रवाद की भावना उन्हें इस अपमान को सहने के लिए मजबूर करती है. प्रचारक बनने और संगठन में ऊंचे पद हासिल करने को लेकर भी जातिगत राजनीति और भेदभाव मौजूद है.
आरएसएस के भीतर हर कोई जानता है कि उसकी वैचारिक प्रेरणा संविधान नहीं, बल्कि मनुस्मृति बनी हुई है.
संघ की सोच में महिलाएं
हिंदू महिलाओं को लेकर भी यही मानसिकता दिखाई देती है. आरएसएस के कई पदाधिकारियों के बयानों में हिंदू महिलाओं को समुदाय की संपत्ति और उसकी प्रतिष्ठा का वाहक माना जाता है. उनसे समुदाय की संख्या बढ़ाने की जिम्मेदारी भी जोड़ी जाती है. यही कारण है कि आरएसएस महिलाओं को विवाह के मामलों में पूरी स्वतंत्रता देने के पक्ष में नहीं दिखता. समय-समय पर हिंदू महिलाओं से अधिक बच्चे पैदा करने की अपील भी की जाती है.
इस सोच में महिला का महत्व परिवार की देखभाल करने, परिवार का आकार बढ़ाने और राष्ट्र निर्माण में योगदान देने तक सीमित कर दिया जाता है. उसका स्वतंत्र अस्तित्व और स्वतंत्र बुद्धि सहज रूप से स्वीकार नहीं की जाती. यही मनुस्मृति मानसिकता है.
इसलिए जब राहुल गांधी ने मनुस्मृति मानसिकता से बाहर निकलने की बात कही, तो उनका निशाना आरएसएस की इसी सोच पर था. सभी हिंदू मनुस्मृति मानसिकता वाले नहीं हैं. लेकिन जो लोग आरएसएस की समाज व्यवस्था की अवधारणा को स्वीकार करते हैं, उनके बारे में यह कहना कठिन है कि वे किसी न किसी रूप में मनुस्मृति मानसिकता से प्रभावित नहीं हैं, भले ही उन्हें इसका एहसास न हो.
अपूर्वानंद दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रोफेसर हैं. यह उनके अंग्रेजी लेख अनुदित अंश है.

