हर्ष वी. पंत | काराकोरम पर नज़र बनाए रखें

चीन और पाकिस्तान के बीच रक्षा साझेदारी लंबे समय से रणनीतिक तालमेल, रक्षा-औद्योगिक सहयोग और साझा क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताओं पर टिकी रही है. हालांकि, हाल ही में संपन्न हुआ 'काराकोरम-2026' संयुक्त सैन्य अभ्यास इस द्विपक्षीय रिश्ते में एक नए और गंभीर अध्याय की शुरुआत का प्रतीक है. इस अभ्यास ने पारंपरिक सैन्य जुड़ाव के दायरे को बढ़ाते हुए इसे नियमित सेना के दस्तों तक विस्तारित कर दिया है.

14 से 22 अक्टूबर तक चीन के शिनजियांग उइघुर स्वायत्त क्षेत्र में कोरला के निकट स्थित एक सैन्य प्रशिक्षण केंद्र में आयोजित यह अभ्यास, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) और पाकिस्तान सेना की नियमित इकाइयों के बीच अपनी तरह का पहला संयुक्त प्रशिक्षण अभ्यास था.  इस अभ्यास का वास्तविक महत्व दोनों देशों की सेनाओं के बीच बढ़ते परिचालन संबंधी परिचय और आपसी तालमेल के क्रमिक विकास में है.

हर्ष वी. पंत के मुताबिक, आधिकारिक तौर पर इस अभ्यास को उच्च ऊंचाई वाले पर्वतीय इलाकों में आतंकवाद विरोधी अभियानों के रूप में प्रस्तुत किया गया था, लेकिन इसके दायरे में कई ऐसी सामरिक गतिविधियां शामिल थीं जो पारंपरिक युद्धक क्षमताओं का संकेत देती हैं. 'काराकोरम-2026' के दौरान मानवरहित हवाई वाहन (यूएवी) संचालन, लक्ष्य पहचान और गतिशीलता के दौरान गोलीबारी, लंबी दूरी की स्निपिंग, संयुक्त कमान प्रक्रियाएं, मिश्रित टुकड़ियां, कार्य-आधारित समूहन (टास्क बेस्ड ग्रुपिंग) और समन्वित लाइव-फोर्स युद्धाभ्यास का व्यापक अभ्यास किया गया.

विशेष रूप से, चीन ने अपने अत्याधुनिक हथियार और सैन्य उपकरण उपलब्ध कराए, जिनमें टाइप 191 राइफलें, टाइप 201 स्क्वाड मशीन गन, टाइप 11 बख्तरबंद असॉल्ट वाहन, टाइप 08 इन्फैंट्री फाइटिंग वाहन, आधुनिक तोपखाना और उन्नत ड्रोन-रोधी प्रणालियाँ शामिल थीं. यद्यपि यह अभ्यास सीधे तौर पर किसी एकीकृत स्थायी सैन्य कमान की स्थापना नहीं करता, फिर भी यह दोनों देशों के रक्षा संबंधों को अधिक व्यावहारिक धरातल पर ले जाने का स्पष्ट संकेत देता है.

इस संपूर्ण घटनाक्रम के तीन मुख्य रणनीतिक पहलू उभर कर सामने आते हैं: (1) नियमित सेनाओं की भागीदारी: अब तक 'वॉरियर' जैसी श्रृंखला के अभ्यासों में मुख्य रूप से विशेष बल ही भाग लेते थे.  'काराकोरम-2026' ने इस सहयोग को नियमित थल सेनाओं तक विस्तृत कर दिया है, जिससे पारंपरिक सैन्य तैयारियों पर अधिक व्यापक प्रभाव पड़ेगा. (2) संस्थागत ढांचे का विस्तार: रक्षा सहयोग का दायरा व्यापक हो चुका है. जहाँ 'वॉरियर' विशेष अभियानों पर केंद्रित है, 'शाहीन' वायु सेना और 'सी गार्जियन' समुद्री सुरक्षा को संभालती है, वहीं 'काराकोरम-2026' ने इसमें एक समर्पित थल-सेना का आयाम जोड़कर परिचालन क्षेत्रों में तालमेल को कई गुना बढ़ा दिया है.

तकनीकी एकीकरण और परिचालन सीख : पाकिस्तानी सैन्यकर्मियों को चीनी प्लेटफार्मों का प्रत्यक्ष अनुभव मिला है, जिससे भविष्य में उपकरणों की खरीद और एकीकरण सुगम होगा. दूसरी ओर, चीन को चुनौतीपूर्ण पहाड़ी इलाकों में अपने उपकरणों का परीक्षण करने और पाकिस्तान के आतंकवाद-विरोधी अनुभवों का लाभ उठाने का अवसर मिला है.

व्यावहारिक सुरक्षा आयाम और सीपीईसी की सुरक्षा : इस साझेदारी का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू क्षेत्रीय सुरक्षा है. अफगानिस्तान-पाकिस्तान क्षेत्र में चीनी कर्मियों और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) से जुड़े बुनियादी ढांचों को लगातार आतंकवादी खतरों का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे में निगरानी, ड्रोन संचालन और उच्च ऊंचाई वाले युद्ध कौशल में संयुक्त प्रशिक्षण दोनों देशों को साझा खतरों से निपटने का मंच प्रदान करता है. राजनीतिक विश्वास अब धीरे-धीरे साझा परिचालन प्रथाओं में तब्दील हो रहा है.

भारत के लिए रणनीतिक निहितार्थ और चिंताएं : भारत के दृष्टिकोण से 'काराकोरम-2026' का आकलन वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर चीन और नियंत्रण रेखा (एलओसी) व अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर पाकिस्तान की चुनौतियों के संदर्भ में किया जाना चाहिए. कोरला शिनजियांग में स्थित है, जो चीन के पश्चिमी सैन्य दृष्टिकोण का प्रमुख केंद्र है. इसके अलावा, काराकोरम क्षेत्र से इसकी भौगोलिक निकटता और विवादित शक्सगाम घाटी का मुद्दा इसके भू-राजनीतिक महत्व को और बढ़ा देता है, जिसे भारत लगातार खारिज करता आया है.

भारत के लिए मुख्य चिंता इंटरऑपरेबिलिटी (पारस्परिक परिचालन क्षमता) का विकास है. संयुक्त कमान प्रक्रियाएं और साझी सैन्य सामग्री दोनों सेनाओं के बीच की दूरियों को तेजी से कम कर रही है. जब भारत को अपने उत्तरी और पश्चिमी मोर्चों पर एक साथ दो-मोर्चे की चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, तब इस तरह के अभ्यास चीन और पाकिस्तान के बीच सैन्य समन्वय को बहुत आसान बना देते हैं.

भारत की आवश्यक प्रतिक्रिया और भावी रणनीति

इस भू-राजनीतिक चुनौती का मुकाबला करने के लिए भारत को अपनी रक्षा तैयारियों को चार स्तरों पर मजबूत करना होगा:

लॉजिस्टिक्स और उच्च ऊंचाई पर संचलन: उत्तरी और पश्चिमी दोनों थिएटरों में सभी मौसमों में काम करने वाले लॉजिस्टिक्स, मजबूत निगरानी तंत्र और सैनिकों की तीव्र गतिशीलता को उन्नत करना होगा.

ड्रोन-रोधी और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियाँ: ड्रोन और मानवरहित प्रणालियों के बढ़ते उपयोग को देखते हुए भारत को अपनी बहुस्तरीय वायु रक्षा, ड्रोन-रोधी क्षमताओं और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों को अत्यंत आधुनिक बनाना होगा.

पंत लिखते हैं कि भारत के लिए इस स्थिति से सबसे बड़ा सबक यह है कि चीन-पाकिस्तान संबंधों का मूल्यांकन केवल पारंपरिक हथियारों के लेन-देन या राजनयिक बयानों के आधार पर नहीं किया जा सकता. अब यह रिश्ता साझा परिचालन अनुभवों और तकनीकी अनुकूलता के क्रमिक विकास पर आधारित है. इसलिए, भारत की दीर्घकालिक प्रतिक्रिया में एक विश्वसनीय दो-मोर्चे की तैयारी, मजबूत संयुक्त युद्ध-क्षमताएं और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन का यथार्थवादी आकलन अनिवार्य रूप से शामिल होना चाहिए.

(हर्ष वी. पंत, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में अध्ययन और विदेश नीति के उपाध्यक्ष हैं और अंग्रेजी में उनका मूल लेख यहां पढ़ा जा सकता है.)

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