नई दिल्ली का कश्मीर मॉडल अब पूरे भारत में फैल रहा है, संवैधानिक सुरक्षा कमजोर हो रही है
'आर्टिकल-14' में प्रकाशित हरिंदर बावेजा की रिपोर्ट के मुताबिक, कश्मीर में वर्षों से इस्तेमाल किए गए निगरानी, इंटरनेट बंदी, बल प्रयोग और कठोर राज्य कार्रवाई के तरीके अब देश के दूसरे हिस्सों में भी दिखाई देने लगे हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, जिन उपायों को कभी कश्मीर जैसे संघर्षग्रस्त क्षेत्र के लिए असाधारण कदम माना जाता था, वे धीरे-धीरे असहमति और संवैधानिक अधिकारों को सीमित करने के व्यापक तौर-तरीकों में बदल रहे हैं.
इसका ताजा उदाहरण जम्मू-कश्मीर में जमानत पर रिहा लोगों के पैरों में जीपीएस आधारित एंकल मॉनिटर लगाए जाने का है. रिपोर्ट के अनुसार, जम्मू-कश्मीर की निचली अदालतों में कुछ मामलों में आरोपियों की जमानत की शर्त के रूप में ऐसे इलेक्ट्रॉनिक ट्रैकिंग उपकरण लगाए गए हैं. इससे उनके वास्तविक समय के स्थान की निगरानी की जा सकती है. रिपोर्ट इसे निजता के अधिकार से जुड़ा गंभीर सवाल मानती है, खासकर तब जब सुप्रीम कोर्ट पहले ही आरोपी की लगातार जीपीएस निगरानी के खिलाफ फैसला दे चुका है.
यह व्यवस्था केवल कश्मीर तक सीमित रहने का भी सवाल नहीं है. भीमा-कोरेगांव मामले में भी जमानत की शर्त के तौर पर जीपीएस आधारित निगरानी का इस्तेमाल किया गया था. कार्यकर्ताओं वर्नन गोंसाल्वेस, अरुण फरेरा और शोमा सेन को जांच अधिकारी के साथ अपना स्थान साझा करने का निर्देश दिया गया था. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने जीपीएस निगरानी के खिलाफ फैसला दिया.
कहानी और धारणा
5 अगस्त 2019 को जम्मू-कश्मीर का विशेष संवैधानिक दर्जा खत्म किए जाने और राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों में बांटे जाने के बाद घाटी में व्यापक सुरक्षा व्यवस्था लागू की गई थी. इसके साथ लंबे समय तक कर्फ्यू और कई तरह की पाबंदियां भी लगीं.
अब केंद्र सरकार कश्मीर में सामान्य स्थिति लौटने की बात करती है. अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर की श्रीनगर यात्रा और जम्मू-कश्मीर को भारत का "महत्वपूर्ण हिस्सा" बताना इसी बदलती अंतरराष्ट्रीय धारणा का संकेत माना गया. उन्होंने कश्मीर की खूबसूरती की भी चर्चा की और अमेरिका की यात्रा सलाह की समीक्षा के संकेत दिए.
लेकिन सवाल यह है कि क्या पर्यटन को सामान्य स्थिति का अकेला पैमाना माना जा सकता है. कश्मीर में पर्यटन बड़ी संख्या में लोगों की आजीविका का आधार है, लेकिन शांति और सामान्य स्थिति का आकलन केवल पर्यटकों की संख्या से नहीं किया जा सकता.
अप्रैल 2025 में पहलगाम में पर्यटकों की हत्या ने यह भी दिखाया कि घाटी में सुरक्षा स्थिति कितनी तेजी से बदल सकती है. हमले ने खुफिया तंत्र और सामान्य स्थिति को लेकर किए जा रहे दावों पर सवाल खड़े किए.
कश्मीरियों के लिए यह पूरा घटनाक्रम केवल सुरक्षा या पर्यटन का विषय नहीं है. लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष, राजनीतिक फैसलों और संवैधानिक अधिकारों में बदलाव ने लोगों के भीतर असुरक्षा की भावना पैदा की है. रिपोर्ट का तर्क है कि 2019 में सड़कों पर खींची गई कंसर्टिना तार की भौतिक सीमाएं अब लोगों के मन में डर और चिंता की मानसिक सीमाओं में बदल गई हैं.
प्रयोगों की प्रयोगशाला
कश्मीर में राज्य की असाधारण शक्तियों के इस्तेमाल के कई उदाहरण सामने आए हैं. 2017 में फारूक अहमद डार नाम के एक शॉल कारोबारी को सेना के एक अधिकारी ने पत्थरबाजी से बचाव के लिए सेना की जीप के आगे मानव ढाल के रूप में बांध दिया था. डार उस दिन उपचुनाव में वोट डालने गए थे.
पुलिस रिपोर्ट के अनुसार डार मतदान कर चुके थे और बाद में उन्हें सेना ने पकड़कर जीप पर बांधा था. रिपोर्ट में उनके गलत तरीके से हिरासत में रखे जाने का भी उल्लेख था. सेना ने मामले की जांच शुरू की, लेकिन जांच पूरी होने से पहले ही संबंधित अधिकारी को सेना प्रमुख की ओर से प्रशस्ति पत्र मिल गया था.
यह घटना इस सवाल को सामने लाती है कि कानून-व्यवस्था की चुनौती से निपटने के नाम पर राज्य की ताकत की सीमाएं क्या होनी चाहिए. रिपोर्ट के मुताबिक, कश्मीर में व्यक्ति के अधिकारों की तुलना में सुरक्षा से जुड़े व्यापक आंकड़े और राजनीतिक संदेश अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं.
2024 के विधानसभा चुनाव में जम्मू-कश्मीर में 66.38 प्रतिशत मतदान हुआ. राजनीतिक दलों ने अनुच्छेद 370 की बहाली और राज्य का दर्जा वापस दिलाने का वादा किया था. केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने भी राज्य का दर्जा बहाल करने की बात कही थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 2024 के चुनाव से पहले राज्य का दर्जा बहाल करने का भरोसा दिया था.
इसके बावजूद पिछले महीने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने नई दिल्ली में राज्य का दर्जा बहाल करने की मांग को लेकर प्रदर्शन किया. इससे यह सवाल फिर उठा कि केंद्र सरकार अपने पुराने आश्वासन पर आगे कब बढ़ेगी.
नई दिल्ली की बढ़ती शक्तियां
जम्मू-कश्मीर में उपराज्यपाल के पास निर्वाचित मुख्यमंत्री की तुलना में सुरक्षा और प्रशासन से जुड़े कई महत्वपूर्ण अधिकार हैं. मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला सुरक्षा व्यवस्था पर सीधे नियंत्रण नहीं रखते.
सुरक्षा तंत्र के पास पासपोर्ट रोकने, सरकारी कर्मचारियों को कारण बताए बिना हटाने, लोगों को हिरासत में लेने और गिरफ्तार करने जैसी शक्तियां हैं. पहलगाम हमले के बाद संदिग्ध लोगों से जुड़े घरों को गिराने की कार्रवाई ने भी दंडात्मक राज्य कार्रवाई पर बहस को बढ़ाया.
रिपोर्ट उत्तर प्रदेश में बुलडोजर कार्रवाई से भी इसकी तुलना करती है, जहां आरोपियों के मुकदमे शुरू होने से पहले ही उनके घर गिराए जाने के मामले सामने आए हैं.
मीडिया के साथ व्यवहार में भी ऐसी समानताएं दिखाई देती हैं. कश्मीर में पत्रकारों को उनकी रिपोर्टों के कारण पुलिस थानों में बुलाए जाने के उदाहरण सामने आए हैं. वहीं दिल्ली में पत्रकारों को व्हाट्सऐप समूहों के माध्यम से खबरों और रिपोर्टिंग की दिशा को लेकर निर्देश दिए जाने के आरोप लगते रहे हैं.
कश्मीर में संदिग्ध ओवरग्राउंड वर्कर्स यानी आतंकियों के समर्थकों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाती रही है. कई लोगों को घाटी से बाहर की जेलों में भेजे जाने की बात सामने आई है. इसी तरह गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम कानून यानी यूएपीए के तहत गिरफ्तारी और लंबे समय तक जेल में रहने के मामले भी कश्मीर तक सीमित नहीं हैं.
लोकतंत्र को कमजोर करने की प्रक्रिया
इंटरनेट बंदी कश्मीर में राज्य की शक्ति के इस्तेमाल का एक प्रमुख उदाहरण रही है. रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 तक कश्मीर में इंटरनेट बंदी और व्यवधान दुनिया के किसी भी अन्य क्षेत्र की तुलना में अधिक रहे थे. इंटरनेट बंद करने का इस्तेमाल सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के नाम पर किया गया, लेकिन इसका असर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामान्य नागरिक जीवन पर भी पड़ा.
इसी तरह प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पैलेट गन का इस्तेमाल भी कश्मीर में लंबे समय से विवाद का विषय रहा है. दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन के इस्तेमाल ने यह सवाल फिर खड़ा किया कि क्या कश्मीर में अपनाए गए कठोर सुरक्षा उपाय अब दूसरे हिस्सों में भी पहुंच रहे हैं.
2016 में बुरहान वानी की मौत के बाद हुए व्यापक प्रदर्शनों के दौरान पैलेट गन से बड़ी संख्या में लोग घायल हुए थे. इंडियन जर्नल ऑफ ऑप्थैल्मोलॉजी की एक अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार, उस वर्ष चार महीने के भीतर कश्मीर के अस्पतालों में पैलेट से आंखों में चोट लगने वाले 777 मरीज भर्ती हुए थे.
इन घटनाओं को एक साथ देखने पर सवाल केवल कश्मीर की स्थिति का नहीं रह जाता. सवाल यह है कि किसी लोकतंत्र में सुरक्षा के नाम पर राज्य को कितनी शक्ति दी जा सकती है और उस शक्ति की संवैधानिक सीमाएं कौन तय करेगा.
कश्मीर में विकसित किए गए निगरानी और नियंत्रण के कई तरीकों का दूसरे हिस्सों में इस्तेमाल होना इस बहस को और महत्वपूर्ण बनाता है. जीपीएस निगरानी, इंटरनेट बंदी, कठोर कानूनी कार्रवाई, प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग और प्रशासनिक शक्तियों का विस्तार अगर सामान्य राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों में भी इस्तेमाल होने लगे, तो इसका असर नागरिक स्वतंत्रताओं पर पड़ सकता है.
रिपोर्ट का केंद्रीय तर्क यही है कि न्याय केवल संघर्षग्रस्त क्षेत्रों के लिए जरूरी नहीं है. कश्मीर हो, दिल्ली हो या उत्तर प्रदेश, एक लोकतांत्रिक समाज में नागरिकों के अधिकार और संवैधानिक सुरक्षा समान रूप से महत्वपूर्ण हैं. कश्मीर में आजमाए गए ये "टूलकिट" और "प्लेबुक" इसलिए चिंता का विषय हैं क्योंकि अगर असाधारण उपाय धीरे-धीरे सामान्य शासन का हिस्सा बन जाएं, तो यह केवल एक क्षेत्र की स्वतंत्रता को नहीं बल्कि पूरे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर कर सकता है.

