श्रवण गर्ग | अमेरिका के हिंदू जो सुनना चाहते थे, वह भागवत ने नहीं कहा

‘हरकारा डीप डाइव’ के लाइव एपिसोड में निधीश त्यागी एवं वरिष्ठ पत्रकार श्रवण गर्ग मोहन भागवत के न्यूयॉर्क के मेडिसिन स्क्वायर गार्डन में दिए भाषण के उन पहलुओं पर चर्चा कर रहे हैं, जिन पर सार्वजनिक बहस अपेक्षाकृत कम हुई. भागवत ने कहा कि अगर कोई हिंदू यह सोचता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए, तो वह हिंदू नहीं हो सकता. लेकिन श्रवण गर्ग का सवाल है कि इस बयान में नया क्या है, क्योंकि 2018 में दिल्ली में भी भागवत इसी तरह की बात कह चुके हैं. फिर 2018 और 2026 के बीच भारत में मुसलमानों की स्थिति में क्या बदलाव आया, यह सवाल ज्यादा महत्वपूर्ण क्यों नहीं बनता.

चर्चा में श्रवण गर्ग इस बात पर जोर देते हैं कि भागवत के भाषण में भारत की प्राचीन संस्कृति, विविधता और आरएसएस के सेवा कार्यों का उल्लेख तो हुआ, लेकिन आधुनिक भारत की मौजूदा राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों पर लगभग कोई बात नहीं हुई. छात्रों के आंदोलनों, मुसलमानों के सामने मौजूद सवालों और देश के मौजूदा राजनीतिक माहौल जैसे मुद्दों पर भी उनकी चुप्पी को महत्वपूर्ण माना गया है. सवाल यह है कि अगर मुसलमान भारत में रहेंगे, तो क्या उन्हें समान अधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक सुरक्षा भी मिलेगी.

बातचीत में पूर्व चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी और मोहन भागवत के बीच हुई बैठकों का भी संदर्भ आता है. कुरैशी के अनुसार, भागवत आरएसएस को अधिक उदार बनाने की दिशा में लगातार प्रयास कर रहे हैं और संवाद के जरिए चीजों में सुधार की उम्मीद जताते रहे हैं. लेकिन श्रवण गर्ग का सवाल है कि इन दावों को भारत की जमीन पर होने वाली घटनाओं और राजनीतिक व्यवहार के साथ रखकर कैसे देखा जाए.

एपिसोड में 1996 के चरखी दादरी विमान हादसे का भी उल्लेख किया गया है, जिसका उदाहरण भागवत ने आरएसएस की सेवा भावना के तौर पर अपने भाषण में दिया. श्रवण गर्ग उपलब्ध विवरणों के आधार पर सवाल उठाते हैं कि घटना की पूरी तस्वीर क्या थी और क्या भागवत द्वारा पेश किया गया विवरण पर्याप्त था. इसी संदर्भ में यह सवाल भी उठाया गया कि यदि संघ सभी समुदायों के साथ समानता की बात करता है, तो मुसलमानों के खिलाफ होने वाली घटनाओं और बयानों पर उसकी स्पष्ट प्रतिक्रिया क्यों दिखाई नहीं देती.

पूरी बातचीत का केंद्रीय सवाल यही है कि मोहन भागवत ने अमेरिका में क्या कहा, उससे ज्यादा महत्वपूर्ण शायद यह है कि उन्होंने क्या नहीं कहा. क्या यह भाषण आरएसएस की वैश्विक छवि को मजबूत करने की कोशिश था, या इसके पीछे भारत की राजनीति, हिंदुत्व और संघ की भविष्य की भूमिका को लेकर कोई बड़ा संदेश छिपा है.

पूरी बातचीत यहां सुन सकते हैं. 

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