शनिवार, 31 अक्टूबर को कोलकाता में एक अनोखा जुलूस देखने को मिला, जब राजनीतिक झंडों के बजाय हाथों में किताबें लिए हज़ारों पुस्तक प्रेमी सड़कों पर उतर आए. "लेट्स वॉक फॉर बुक्स" नाम से आयोजित इस मार्च का आयोजन पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा उत्सव के दौरान भाजपा कार्यकर्ताओं और पुलिस द्वारा वामपंथी विचारधारा से जुड़ी पुस्तक स्टॉलों में की गई कथित तोड़फोड़ के विरोध में किया गया था. जुलूस में शामिल बड़े बैनरों पर "किताबें मत जलाओ, उन्हें पढ़ो" और "किताबें बनाम बुलडोजर" जैसे संदेश लिखे हुए थे.
अनिंद्य हाजरा के मुताबिक, एक बुजुर्ग अखबार विक्रेता ने कहा कि वे किताबों के प्रति अपने प्रेम के कारण इस मार्च में शामिल हुए हैं. उन्होंने बताया कि भले ही आर्थिक तंगी के कारण वे अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए, लेकिन उन्हें हमेशा पढ़ने का शौक रहा और उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि उनकी बेटी अपनी शिक्षा पूरी करे.
जुलूस के लिए पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर एक अपील चलाई जा रही थी. प्रतिभागियों से अपने साथ एक किताब लाने का आग्रह करने वाली इस अपील में कहा गया था कि पूरे राज्य में किताबें 'बर्बर' हमलों का सामना कर रही हैं. बंगाल में दुर्गा पूजा उत्सव के दौरान मेलों, संगीत, नाटक और कविता कार्यक्रमों के साथ-साथ पुस्तक स्टॉल भी लंबे समय से परंपरा का हिस्सा रहे हैं.
अपील में कहा गया कि इस वर्ष कई पुस्तक स्टॉलों में कथित तौर पर तोड़फोड़ की गई, उनके आयोजकों के साथ मारपीट की गई, और किताबों को सड़कों पर फेंककर पैरों तले रौंदा गया. जादवपुर में केंद्रीय बलों की मदद से पुस्तक स्टॉलों को ध्वस्त करने का प्रयास किया गया. नई छपी किताबों को हटाने के लिए कोलकाता नगर निगम के कचरा ट्रक को भी लाया गया था. अपील में इन घटनाओं को बंगाल की सांस्कृतिक परंपराओं पर हमला बताया गया और चेतावनी दी गई कि किताबों पर लगातार हो रहे हमले राज्य की प्रतिष्ठा और मूल्यों को नुकसान पहुंचा सकते हैं.
राजनीतिक झंडों, बैनरों और दलीय नारों वाले जुलूसों की आदी हो चुकी इस नगरी में यह प्रदर्शन बिल्कुल अलग और खास था. प्रतिभागी हाथों में किताबें लिए गीत गाते हुए चल रहे थे. उन्होंने तुर्की कवि नाज़िम हिकमत के गीत का बंगाली अनुवाद "वे हमें गाने नहीं देते" (दे डोन्ट लेट अस सिंग), साथ ही रवींद्रनाथ टैगोर का "बाध भेंगा दाओ" गाया. जुलूस में अंतर्राष्ट्रीय विरोध गीत भी शामिल थे, जिनमें "वी शैल ओवरकम" और इसका बंगाली संस्करण "हम होंगे कामयाब" (आमरा कोरबो जॉय) विशेष रूप से गूंजा.

