'द हिंदू' के मुताबिक, प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने सोमवार, 2 नवंबर 2026 को मीडिया कारोबारी सुभाष चंद्रा के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज किया. उन पर आरोप है कि उन्होंने अपनी संपत्ति का बढ़ा-चढ़ाकर मूल्यांकन पेश करके एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड (एलआईसीएचएफएल) से कर्ज लिया और बाद में उसका भुगतान नहीं किया. इस कथित ऋण धोखाधड़ी के कारण कंपनी को 1,322 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है.
अधिकारियों के अनुसार, ईडी ने धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की प्राथमिकी के आधार पर यह मामला दर्ज किया है. एलआईसीएचएफएल की शिकायत पर सीबीआई पहले ही इस मामले में प्राथमिकी दर्ज कर चुकी है. सुभाष चंद्रा की ओर से इस मामले पर प्रतिक्रिया का इंतजार है.
एलआईसीएचएफएल ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया है कि सुभाष चंद्रा ने दो ऋणों की मंजूरी और राशि जारी कराने के लिए अपनी संपत्ति से जुड़े प्रमाणपत्र जमा किए थे. इन दोनों ऋणों की कुल राशि 980 करोड़ रुपये थी. कंपनी के मुताबिक, अगस्त में दर्ज शिकायत में कहा गया था कि इन ऋणों के भुगतान में चूक के कारण उसे 1,322 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ.
शिकायत के अनुसार, पहला ऋण 500 करोड़ रुपये का था, जो वसंत सागर प्रॉपर्टीज प्राइवेट लिमिटेड को दिया गया था. पैन इंडिया इंफ्राप्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड इस ऋण में सह-ऋणकर्ता थी. यह ऋण कंपनी के अधिग्रहण, अतिरिक्त वित्तपोषण और कारोबार के विस्तार के लिए मंजूर किया गया था. इसके लिए सुभाष चंद्रा ने 28 मार्च 2018 को निरंतर गारंटी दी थी.
दूसरा ऋण 480 करोड़ रुपये का था, जो डिजिटल सब्सक्राइबर मैनेजमेंट एंड कंसल्टेंसी सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड को दिया गया था. स्पिरिट इंफ्रा पावर एंड मल्टी वेंचर्स प्राइवेट लिमिटेड इस ऋण में सह-ऋणकर्ता थी. यह ऋण किराये से होने वाली आय को आधार बनाकर मंजूर किया गया था. इसके लिए भी सुभाष चंद्रा ने गारंटी दी थी.
एलआईसीएचएफएल के मुताबिक, सुभाष चंद्रा द्वारा जमा कराया गया पहला संपत्ति प्रमाणपत्र डीजीएम एंड कंपनी ने 28 मार्च 2018 को जारी किया था. इसमें उनकी कुल संपत्ति करीब 59,000 करोड़ रुपये बताई गई थी. वहीं, दूसरे ऋण के लिए जमा कराया गया प्रमाणपत्र चार्टर्ड अकाउंटेंट फर्म एमपीजे एंड कंपनी ने 6 जुलाई 2018 को जारी किया था. इसमें उनकी संपत्ति का मूल्य 40,562 करोड़ रुपये बताया गया था.
सीबीआई की प्राथमिकी के मुताबिक, बाद में दोनों ऋणों का भुगतान नहीं किया गया. दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता, 2016 के तहत हुई कार्यवाही के दौरान सुभाष चंद्रा ने एलआईसीएचएफएल को दिए गए प्रमाणपत्रों में दर्शाई गई संपत्ति के मूल्य से इनकार किया था. प्राथमिकी में कहा गया है कि उन्होंने वर्ष 2024 में अपनी संपत्ति का मूल्य 31.79 करोड़ रुपये और वर्ष 2017-18 में अधिकतम 40,000 करोड़ रुपये बताया था.
सीबीआई की प्राथमिकी में आरोप लगाया गया है कि सुभाष चंद्रा ने कर्ज लेने वाली कंपनियों और उनके अधिकारियों एवं निदेशकों के साथ मिलीभगत करके एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस को धोखा दिया. प्राथमिकी के अनुसार, कथित तौर पर फर्जी दस्तावेज तैयार करके उनकी संपत्ति का मूल्य बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया, ताकि ऋण मंजूर कराया जा सके. सीबीआई ने यह भी आरोप लगाया है कि ऋण के रूप में मिली रकम का दुरुपयोग किया गया.
एलआईसीएचएफएल उन ऋणदाताओं में शामिल है, जिन्होंने राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) में उस समाधान योजना का विरोध किया था, जिसे हाल ही में राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) ने मंजूरी दी थी. इस योजना के तहत सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत संपत्ति से करीब 22,006 करोड़ रुपये के दावों के मुकाबले लेनदारों को केवल लगभग 6.5 करोड़ रुपये मिलने का प्रावधान था.
फिलहाल, ईडी ने सीबीआई की प्राथमिकी के आधार पर मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों की जांच शुरू कर दी है. सुभाष चंद्रा पर लगाए गए आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी.

