चेतावनी की बत्तियां जल रही हैं: भारत की विकास गाथा को महंगाई के बेरहम झटके का सामना करना पड़ रहा है
यदि आपको लग रहा है कि आपकी दिनचर्या से जुड़े सामान और सेवाएं अचानक महंगी हो गई हैं, तो आप बिल्कुल सही सोच रहे हैं. अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 102 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंचने के साथ ही आम जनता की जेब पर बोझ और बढ़ने वाला है. अगस्त में भारत की खुदरा मुद्रास्फीति (महंगाई दर) बढ़कर 4.82 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो जुलाई में 4.45 प्रतिशत थी. यह लगातार तीसरा महीना है जब महंगाई दर भारतीय रिजर्व बैंक के 4 प्रतिशत के मध्यम अवधि के लक्ष्य से ऊपर रही है.
परन बालकृष्णन के मुताबिक, भारत अपनी कुल तेल आवश्यकता का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात करता है. यही कारण है कि वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में होने वाली कोई भी बढ़ोतरी सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है.
इन्फोमेरिक्स रेटिंग्स के अर्थशास्त्री मनोरंजन शर्मा का कहना है कि "मूल्य वृद्धि का दबाव अब अधिक स्थायी रूप लेता दिख रहा है. खाद्य मुद्रास्फीति (महंगाई) के आंकड़े गरीब परिवारों की घटती क्रय शक्ति के वास्तविक नुकसान को पूरी तरह से नहीं दर्शा पाते."
खुदरा टोकरी में खाद्य पदार्थों की हिस्सेदारी एक तिहाई से अधिक है, और खाद्य मुद्रास्फीति जुलाई के 5.52 प्रतिशत से बढ़कर अगस्त में 5.95 प्रतिशत हो गई. वहीं, खाद्य और ईंधन को छोड़कर बाकी मदों वाली 'कोर इन्फ्लेशन' भी 3.9 प्रतिशत से बढ़कर 4.2 प्रतिशत दर्ज की गई. व्यक्तिगत देखभाल की लागत में 15.17 प्रतिशत, रेस्तरां व होटल खर्च में 8.38 प्रतिशत और परिवहन लागत में 4.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है.
थोक मूल्य सूचकांक के आंकड़े और भी अधिक चिंताजनक हैं, जहां वृद्धि दर लगभग 10 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है. थोक टोकरी में खाद्य व ईंधन श्रेणी में 22.9 प्रतिशत, खनिज तेल व पेट्रोलियम उत्पादों में 38.48 प्रतिशत, और कच्चे तेल व प्राकृतिक गैस में 34.41 प्रतिशत का उछाल आया. थोक दरों में यह भारी वृद्धि दर्शाती है कि कंपनियां फिलहाल बढ़ी हुई लागत का एक बड़ा हिस्सा खुद वहन कर रही हैं, लेकिन जल्द ही इसका बोझ अंतिम उपभोक्ताओं पर डाला जाएगा.
भविष्य की चुनौतियां और बाजार पर असर
सऊदी अरब के ऊर्जा ढांचे और जहाजों पर हालिया हमलों के कारण ब्रेंट क्रूड हाल ही में 107.70 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को छू चुका है. इसका असर शेयर बाजारों पर भी देखा गया, जहां निफ्टी और सेंसेक्स में गिरावट दर्ज की गई.
विश्व स्तर पर छह महीने से अधिक चले युद्ध के कारण ईंधन का भंडार घटा है. भारी तेल बिल के कारण भारत को अधिक डॉलर खर्च करने पड़ रहे हैं, जिससे भारतीय रुपया अपने रिकॉर्ड निचले स्तर के आसपास दबाव में है. इसके अतिरिक्त, देश के कुछ हिस्सों में कमजोर मानसून की स्थिति त्योहारी सीजन से ठीक पहले खाद्य आपूर्ति को प्रभावित कर सकती है.
ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स की मुख्य अर्थशास्त्री एलेक्जेंड्रा हरमन प्रसाद का मानना है कि आने वाले महीनों में महंगाई 5 प्रतिशत से ऊपर जा सकती है और वित्तीय वर्ष की अंतिम तिमाही तक आरबीआई की 6 प्रतिशत की ऊपरी सीमा को पार कर सकती है.
आरबीआई और ब्याज दरों का संभावित रुख
महंगाई के इस दबाव के कारण बॉन्ड मार्केट में 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड 7 प्रतिशत से ऊपर निकल गई है. अमेरिकी बॉन्ड यील्ड भी 2007 के संकट के बाद के उच्चतम स्तर (5.02%) पर है, जिससे अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने की संभावना बढ़ गई है.
कैपग्रो कैपिटल के अरुण मल्होत्रा का कहना है कि यदि अमेरिका दरें बढ़ाता है, तो भारत को भी अपनी मुद्रा की रक्षा के लिए दरों में बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है.
एसबीआई के अर्थशास्त्री सौम्य कांति घोष के अनुसार, यदि तेल की कीमतें ऊंची रहीं तो महंगाई 6.5 प्रतिशत तक पहुंच सकती है. उनका अनुमान है कि आरबीआई अक्टूबर और दिसंबर में दरों में 0.25-0.25 प्रतिशत की बढ़ोतरी कर सकता है.
कोटक महिंद्रा बैंक की मुख्य अर्थशास्त्री उपासना भारद्वाज का मानना है कि अक्टूबर में नीतिगत दरों में 50 से 75 आधार अंकों की वृद्धि की गुंजाइश बन सकती है.
हालांकि, चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारत की 7.8 प्रतिशत की मजबूत आर्थिक वृद्धि दर आरबीआई को मंदी के डर के बिना ब्याज दरें बढ़ाने का अवसर देती है. लेकिन आम नागरिकों के लिए इसका सीधा अर्थ यह होगा कि आने वाले समय में होम लोन, कार लोन और अन्य ऋणों की ईएमआई और महंगी हो जाएगी.

