‘द टेलीग्राफ’ में चंदन सिन्हा ने लिखा है कि सितंबर का महीना समाचार पत्रों की सुर्खियों के अलावा ओप-एड (विचार) पृष्ठों के लिए भी असाधारण रहा. इस एक ही महीने (5, 17 और 28 सितंबर) में देश के तीनों शीर्ष संवैधानिक पदों—राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी—के हस्ताक्षर से लेख प्रकाशित हुए. यदि इसमें केंद्रीय मंत्रियों, सांसदों और सेवारत सचिवों को जोड़ लें, तो यह संख्या और विशाल हो जाती है. पिछले एक दशक में निर्वाचित प्रतिनिधियों और सिविल सेवकों द्वारा समाचार पत्रों में ओप-एड लिखने का यह बढ़ता सिलसिला गहन विश्लेषण की मांग करता है.
उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री पहले भी लेख लिखते रहे हैं, लेकिन राष्ट्रपति का ओप-एड में आना नया है. ओप-एड लेखक के रूप में प्रधानमंत्री मोदी की गति अलग ही है. अकेले इस वर्ष उनके कम से कम नौ ओप-एड आ चुके हैं. 2014 के बाद से उनके 42 से अधिक पहचाने गए लेखों में से 33 लेख पिछले छह वर्षों में लिखे गए हैं. इनमें से 18 लेख विभूतियों की जयंतियों या पुण्यतिथियों पर श्रद्धांजलि स्वरूप हैं, जबकि अन्य लेख अंतरराष्ट्रीय संबंधों, संस्कृति और सुशासन पर आधारित हैं.
जब शीर्ष नेतृत्व आगे बढ़ता है, तो पूरी टीम उसका अनुसरण करती है. 2014 के बाद से केंद्रीय मंत्रियों के 100 से अधिक और सेवारत सचिवों के 55 से अधिक ओप-एड प्रकाशित हुए हैं. मंत्रियों में पीयूष गोयल (19 लेख), हरदीप पुरी और भूपेंद्र यादव (15-15 लेख) सबसे आगे हैं. मंत्रियों के लेखों को मुख्य रूप से चार श्रेणियों में बांटा जा सकता है: स्वयं के मंत्रालय की प्रशंसा, पूरी सरकार का अभिनंदन, प्रधानमंत्री को श्रद्धांजलि, और विपक्ष पर हमले.
भारत सरकार के सचिव भी पीछे नहीं हैं. पूर्व सचिव परमेश्वरन अय्यर ने 2017-2020 के दौरान 19 लेख लिखे. उन्होंने अपने एक लेख में "अनाम सिविल सेवक" की पारंपरिक अवधारणा के अंत की घोषणा की थी. उनके अनुसार, अब सचिव का दायित्व केवल नीतिगत सलाह तक सीमित न रहकर जनसंचार और मीडिया सहभागिता तक विस्तृत हो गया है.
सचिवों के लेखों की भी चार मुख्य श्रेणियां हैं: नीतियों का तथ्यात्मक विवरण, भावी चुनौतियां, सफलता का प्रदर्शन, और राजनीतिक कार्यपालिका के विचारों का समर्थन.
मंत्रियों का ओप-एड लिखना सहज रूप से स्वीकार्य माना जा सकता है क्योंकि वे राजनीतिक दल से जुड़े होते हैं और उन्हें अपने विचार व एजेंडा प्रस्तुत करने का अधिकार है. परंतु सिविल सेवकों का मामला भिन्न है. यद्यपि सचिवों के लिखने पर प्रतिबंध नहीं है, फिर भी उनके आधिकारिक विषयों पर लिखे लेख यह प्रश्न खड़ा करते हैं कि क्या वे व्यक्तिगत दृष्टिकोण व्यक्त कर रहे हैं या मंत्रालय का?
जब सचिवों के लेख केवल सफलताओं का गुणगान करते हैं या राजनीतिक नेतृत्व के बयानों को दोहराते हैं, तो उनके एकतरफा राजनीतिक समर्थन के रूप में देखे जाने का जोखिम बढ़ जाता है. किसी आधिकारिक वक्तव्य का किसी राजनीतिक दल या व्यक्तित्व से थोड़ा भी जुड़ाव उसे राजनीतिक प्रचार में बदल देता है.
ओप-एड पृष्ठ ऐसे लेखों को गंभीरता, पहुंच और विश्वसनीयता प्रदान करते हैं, जिन्हें बाद में सोशल मीडिया पर बड़े पैमाने पर प्रसारित किया जाता है. यह व्यवस्था राजनीतिक नेतृत्व के अनुकूल तो हो सकती है, किंतु सिविल सेवकों की निष्पक्षता, तटस्थता और स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न लगाती है.
अधिकारियों के ओप-एड का यह उभार समकालीन मीडिया की स्थिति पर भी सवाल उठाता है. क्या ऐसे व्याख्यात्मक लेखों की आवश्यकता इसलिए पड़ रही है क्योंकि मुख्यधारा की मीडिया प्रासंगिक प्रश्न पूछने में सक्षम नहीं रही? क्या समाचार पत्रों ने आधिकारिक सूचनाओं का सत्यापन छोड़ दिया है और वे केवल सरकार के दृष्टिकोण के प्रसारक मात्र बनकर रह गए हैं?
2014 से पहले स्थिति अलग थी. राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के ओप-एड लगभग अनसुने थे और मंत्रियों व सचिवों के समाचार पत्र लेख दुर्लभ थे. तो फिर क्या बदला? आज के संदर्भ में दो बातें बदली हैं: पहली, मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी ने सामग्री के प्रमाणक के रूप में पारंपरिक मीडिया और इसके प्रसारक के रूप में उभरते सोशल मीडिया दोनों की क्षमता को पहचाना; और दूसरा, उसने न केवल 'प्रत्यक्ष संचार' की रणनीति अपनाई, बल्कि मीडिया में पूरी तरह छा जाने की नीति अपनाई. आखिरकार, मीडिया में मौजूदगी केवल प्रचार, पहचान और सुदृढ़ीकरण नहीं है; यह दूसरों को जगह न देने की रणनीति भी है. उच्च सार्वजनिक अधिकारियों द्वारा समाचार पत्रों के लेखों में उल्लेखनीय वृद्धि इस रणनीति का केवल एक पहलू है.
हालाँकि, ‘प्रत्यक्ष संचार’ की इस आधुनिक रणनीति की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि अपने प्रारंभिक प्रसार और विश्वसनीयता के लिए यह आज भी सबसे पारंपरिक माध्यम—समाचार पत्र—पर ही निर्भर है.
(लेखक चंदन सिन्हा पश्चिम बंगाल कैडर के पूर्व आईएएस अधिकारी हैं. ये हिंदी में अनूदित और संपादित अंश हैं. अंग्रेजी में मूल लेख यहाँ पढ़ा जा सकता है.)

