संजय बारू | खुद के भीतर झांकें
‘द टेलीग्राफ’ में संजय बारू ने लिखा है कि जब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'अच्छे दिन', 'अमृत काल', '5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था' आदि का वादा किया है, उन्होंने चालाकी से ध्यान भविष्य पर केंद्रित रखा है और हुई प्रगति पर रिपोर्ट देने की परवाह नहीं की है. बारू के अनुसार, इस बार उनके स्वतंत्रता दिवस भाषण का सकारात्मक पहलू यह स्वीकारोक्ति है कि सरकार का असली काम विदेशों में झप्पियां पाने या पुरस्कार बटोरने के बजाय अपने देश के भीतर काम करना है. वैश्विक वातावरण प्रतिकूल हो चुका है और भारत तभी मजबूत हो सकता है जब वह अपनी आंतरिक जड़ों को सींचे. राष्ट्रीय शक्ति की असल नींव घरेलू स्थिरता, सामाजिक एकता, और देश की आंतरिक क्षमताओं में निवेश करने से ही मजबूत होती है.
वह लिखते हैं कि वर्ष 2026 के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस भाषण की सबसे अनूठी विशेषता मुख्यधारा के प्रिंट मीडिया में उसकी कम उपस्थिति रही. अधिकांश प्रमुख समाचार पत्रों के पहले पन्ने के ऊपरी हिस्से से यह भाषण लगभग नदारद था. प्रिंट मीडिया की सुर्खियों में केवल प्रधानमंत्री द्वारा इस्तेमाल किया गया शब्द 'बौद्धिक नक्सलवाद' ही जगह बना सका. पिछले 12 वर्षों से सत्ता में बनी हुई और अपने वैचारिक विरोधियों के खिलाफ राज्य तंत्र का पूरा इस्तेमाल करने वाली सरकार के प्रमुख की ओर से आई यह टिप्पणी काफी अजीब मानी गई.
विशेषज्ञों का मानना है कि 'दिमागी नक्सलियों' का यह संदर्भ असल में देश भर में हुए जेन ज़ी (युवा पीढ़ी) के स्वतःस्फूर्त विद्रोह (जुलाई 2026) को गलत तरीके से माओवादी साजिश के रूप में चित्रित करने का प्रयास था। वास्तव में, यह युवा आक्रोश माओवादी विचारधारा से नहीं, बल्कि मोदी सरकार की असंवेदनशीलता, अयोग्यता, भ्रष्टाचार और जवाबदेही से बचने की प्रवृत्ति के खिलाफ युवाओं के स्वाभाविक गुस्से का परिणाम था. हालांकि किसी सरकार द्वारा बुद्धिजीवियों की आलोचना सामान्य बात है, लेकिन केवल इस विवाद का सुर्खियों में रहना भाषण के फीकेपन को उजागर करता है.
अपने एक दशक से अधिक के कार्यकाल में प्रधानमंत्री मोदी ने अपने स्वतंत्रता दिवस भाषणों में हमेशा पड़ोसी देशों, विशेषकर पाकिस्तान और आतंकवाद का प्रमुखता से उल्लेख किया है. हालांकि, इस वर्ष का भाषण निम्नलिखित कारणों से आश्चर्यजनक रहा:
पाकिस्तान और पड़ोस पर सन्नाटा: इस बार भाषण में पाकिस्तान या अन्य पड़ोसी देशों का कोई खास उल्लेख नहीं था.
वैश्विक सम्मेलनों की अनदेखी: जहाँ जी-20 की मेजबानी का बखान पहले भाषणों में बढ़ा-चढ़ाकर किया गया था, वहीं इस वर्ष भारत द्वारा ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने के बावजूद भाषण में इसे नजरअंदाज कर दिया गया.
वैश्विक संघर्षों पर अस्पष्टता: यूरोप (यूक्रेन) और पश्चिम एशिया (मध्य पूर्व) के युद्धों का केवल सरसरी तौर पर जिक्र किया गया, लेकिन इन पर भारत के आधिकारिक दृष्टिकोण को स्पष्ट नहीं किया गया.
भाषण का मुख्य ध्यान बाहरी सुरक्षा के बजाय आंतरिक सुरक्षा पर केंद्रित था. इस दिशा में 'नागरिक सुरक्षा' बल के गठन की घोषणा की गई. यह कदम इशारा करता है कि सरकार अब बाहरी खतरों की तुलना में आंतरिक सुरक्षा को बड़ी चुनौती मान रही है (जैसा कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का मानना था).
हालाँकि, इस पहल पर यह सवाल भी खड़ा होता है कि क्या यह बल देश के सभी वर्गों और समुदायों का समावेशी प्रतिनिधित्व करेगा, या फिर यह सत्ताधारी दल और पुलिस के संरक्षण में पलने वाले असमाजिक तत्वों और बहुसंख्यकवादी एजेंडे को लागू करने का नया माध्यम बन जाएगा?
प्रधानमंत्री ने दुनिया की बड़ी शक्तियों द्वारा आर्थिक संबंधों, संसाधनों और भूगोल के 'हथियारीकरण' पर चिंता जताई. उन्होंने कहा कि आज पेट्रोल, डीजल, उर्वरक, दवाएं, सेमीकंडक्टर चिप्स और यहाँ तक कि भौगोलिक क्षेत्रों को भी साधन बनाकर दूसरों पर दबाव डाला जा रहा है.
इस प्रतिकूल वैश्विक वातावरण से भारत को सुरक्षित रखने के लिए उन्होंने 'आत्मनिर्भरता' का आह्वान किया. लेकिन, भाषण का एक कमजोर पक्ष यह रहा कि इसमें 2014 से लेकर अब तक के वादों का कोई ठोस रिपोर्ट कार्ड नहीं दिया गया. मसलन, 'मेक इन इंडिया' (2014 में घोषित), 'अच्छे दिन', 'अमृत काल', 'कम सरकार, अधिक शासन' और '5 ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था' जैसे वादों पर पिछले 12 वर्षों में क्या हासिल हुआ, इस पर प्रधानमंत्री चुप रहे.
बारू के मुताबिक, जब भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के दावे से फिसलकर वापस छठे स्थान पर आ गई, तो सरकार ने ध्यान बदलकर 2036 ओलंपिक की मेजबानी और 2047 तक 'विकसित भारत' के नए दीर्घकालिक वादों पर केंद्रित कर दिया.
(संजय बारू, फोरम फॉर नेशनल सिक्योरिटी स्टडीज के बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज के अध्यक्ष हैं. यह अंग्रेजी में उनके लेख का हिंदी में अनुदित सारांश है.)

