भारतीय वायुसेना कोई कुरियर सेवा नहीं, नीट के प्रश्नपत्र उसे क्यों नहीं ढोने चाहिए?

भारतीय सशस्त्र बलों का प्राथमिक दायित्व देश की संप्रभुता और सुरक्षा की रक्षा करना है. इसके साथ ही वे समय-समय पर नागरिक प्रशासन की सहायता भी करते हैं. देश ने अनेक बार देखा है कि सेना, नौसेना और वायुसेना ने कठिन परिस्थितियों में राहत और बचाव अभियानों को सफलतापूर्वक अंजाम दिया है. लेकिन कई बार ऐसे अनुरोध भी सामने आते हैं जो यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या सशस्त्र बलों की भूमिका और जिम्मेदारियों को सही ढंग से समझा जा रहा है.

नीट-यूजी 2026 री-टेस्ट के प्रश्नपत्रों को विभिन्न परीक्षा केंद्रों तक पहुंचाने के लिए भारतीय वायुसेना की मदद लेने के प्रस्ताव को भी इसी नजरिए से देखने की जरूरत है. प्रशासनिक अक्षमता के सवालों से अलग हटकर यह विचार करना आवश्यक है कि क्या यह वास्तव में नागरिक प्रशासन की सहायता का मामला है.

‘नागरिक प्रशासन की सहायता’

नागरिक प्रशासन की सहायता की भूमिका सबसे स्पष्ट रूप से आपदा राहत और मानवीय सहायता अभियानों में दिखाई देती है. बाढ़, दुर्घटनाओं और आपात स्थितियों में सशस्त्र बल नियमित रूप से यह जिम्मेदारी निभाते हैं. इसके अलावा राष्ट्र निर्माण से जुड़े कई कार्य भी ऐसे हैं जिन्हें केवल वायुसेना ही अंजाम दे सकती है.

उदाहरण के लिए, केवल भारतीय वायुसेना के पास ऐसे हेलिकॉप्टर हैं जो बुलडोजर और भारी निर्माण मशीनों को मैदानी क्षेत्रों से उठाकर उन पहाड़ी और दुर्गम इलाकों तक पहुंचा सकते हैं जहां सड़क संपर्क मौजूद नहीं है. पूर्वोत्तर भारत में सड़क नेटवर्क के विस्तार में वायुसेना के हेलिकॉप्टरों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है.

वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में भी वायुसेना ने कई महत्वपूर्ण अभियान चलाए हैं. बाघों के स्थानांतरण से लेकर नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से चीतों को भारत लाने तक, उसकी भूमिका निर्णायक रही है.

कई बार वायुसेना ने ऐसे कार्य भी किए हैं जो सामान्य तौर पर उसकी भूमिका का हिस्सा नहीं माने जाते. 1995 में पूर्ण चंद्रग्रहण के दौरान वैज्ञानिक अध्ययन के लिए तस्वीरें लेने के उद्देश्य से वायुसेना के विशेष विमान ने अत्यधिक ऊंचाई और गति पर उड़ान भरकर महत्वपूर्ण दृश्य सामग्री उपलब्ध कराई थी.

इन सभी मामलों में एक बात समान थी. नागरिक क्षेत्र के पास इन कार्यों को पूरा करने की क्षमता नहीं थी और वायुसेना ही एकमात्र व्यवहारिक विकल्प थी.

वायुसेना को शामिल करने की कोशिश

आपदा राहत और विशेष अभियानों में वायुसेना की भूमिका अक्सर लोगों को प्रभावित करती है. यही कारण है कि अनेक सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाएं भी अपने कार्यों के लिए वायुसेना की सेवाएं लेने की कोशिश करती हैं.

अक्सर ऐसे अनुरोधों की शुरुआत वायुसेना की प्रशंसा से भरे पत्रों से होती है, जिनमें यह कहा जाता है कि देश को उस पर गर्व है और फिर अनुरोध किया जाता है कि वह संबंधित काम निःशुल्क कर दे.

लेखक याद दिलाते हैं कि अतीत में वायुसेना से एक विशाल भित्ति चित्र के परिवहन का अनुरोध किया गया था. दावा किया गया कि उसे केवल वायुसेना का भारी परिवहन विमान ही ले जा सकता है. लेकिन जांच के बाद यह स्पष्ट हुआ कि देश में सड़क मार्ग से कंटेनर परिवहन की सुविधा उपलब्ध थी और अनुरोध को अस्वीकार कर दिया गया.

इसी तरह मैराथन प्रतियोगिताओं की हवाई फोटोग्राफी के लिए भी वायुसेना से मदद मांगी गई, जबकि नागरिक हेलिकॉप्टर किराए पर उपलब्ध थे. ऐसे मामलों में सैन्य संसाधनों का उपयोग उचित नहीं माना गया.

एक बुनियादी सवाल

नीट के प्रश्नपत्रों को विभिन्न शहरों तक पहुंचाने के लिए वायुसेना के विमानों के इस्तेमाल की संभावना एक बुनियादी सवाल खड़ा करती है. किसी भी ऐसे प्रस्ताव का मूल्यांकन तीन महत्वपूर्ण कसौटियों पर होना चाहिए.

पहला सवाल यह है कि क्या वायुसेना अपने मूल शांतिकालीन दायित्वों को प्रभावित किए बिना मानवबल और उपकरणों को इस कार्य के लिए उपलब्ध करा सकती है. सैन्य उपकरणों का जीवनकाल सीमित होता है और नागरिक कार्यों में उनका उपयोग उस जीवनकाल को कम करता है.

दूसरा सवाल सैन्य पेशेवर संस्कृति से जुड़ा है. सशस्त्र बलों का उद्देश्य युद्ध और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए तैयार रहना है. नागरिक गतिविधियों में अत्यधिक व्यस्तता उनकी युद्धक तैयारी, अनुशासन और पेशेवर दृष्टिकोण को प्रभावित कर सकती है.

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या इस कार्य के लिए नागरिक क्षेत्र में कोई विकल्प उपलब्ध नहीं है. यदि नागरिक संसाधनों के जरिए काम पूरा किया जा सकता है, तो वायुसेना को शामिल करने का औचित्य क्या है.

नागरिक उड्डयन मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत के पास 853 नागरिक विमान हैं. इसके अलावा राज्य सरकारों और निजी संचालकों के पास 458 विमान और हेलिकॉप्टर उपलब्ध हैं. इतने बड़े बेड़े के रहते यह कल्पना करना कठिन है कि नीट प्रश्नपत्रों के सुरक्षित परिवहन के लिए आवश्यक विमान उपलब्ध नहीं कराए जा सकते.

यदि ऐसा संभव नहीं है, तो यह देश की नागरिक विमानन क्षमता पर गंभीर सवाल खड़ा करेगा. परीक्षा प्रश्नपत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है. इसके लिए सैन्य संसाधनों का उपयोग अंतिम विकल्प होना चाहिए, पहला नहीं.

भारतीय वायुसेना की क्षमताएं सीमित और अत्यंत मूल्यवान संसाधन हैं. उन्हें उन कार्यों के लिए सुरक्षित रखा जाना चाहिए जिनका सीधा संबंध राष्ट्रीय सुरक्षा, आपदा राहत और ऐसे अभियानों से हो जिन्हें नागरिक क्षेत्र पूरा करने में सक्षम नहीं है. नीट प्रश्नपत्रों का परिवहन महत्वपूर्ण प्रशासनिक कार्य हो सकता है, लेकिन उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह ऐसा कार्य नहीं दिखता जिसके लिए भारतीय वायुसेना ही एकमात्र विकल्प हो.

लेखक एयर वाइस मार्शल मनमोहन बहादुर (सेवानिवृत्त) हैं और सेंटर फॉर एयर पावर स्टडीज़ के पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक रह चुके हैं. 

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