प्रधानमंत्री जी, मुफ्त कोचिंग से मुख्य समस्या का समाधान नहीं होता है
अजीत रानाडे ने लिखा है कि प्रधानमंत्री द्वारा स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग प्रदान करने की घोषणा भारतीय शिक्षा क्षेत्र की एक बड़ी विषमता और चुनौती को रेखांकित करती है. सरकार की यह पहल गरीब और वंचित वर्ग के प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को समान अवसर प्रदान करने की दिशा में एक सराहनीय प्रयास है, जिससे वित्तीय तंगी के कारण प्रतियोगी परीक्षाओं की दौड़ से बाहर होने वाले छात्रों को राहत मिल सकती है. लेकिन, यह कदम समस्या का स्थायी समाधान करने के बजाय केवल उसके लक्षणों का इलाज करता है. असली सवाल यह है कि आखिर देश में कोचिंग प्रणाली इतनी अपरिहार्य क्यों बन गई है?
निजी कोचिंग बनाम सार्वजनिक शिक्षा ढांचे की चर्चा करते हुए रानाडे कहते हैं कि भारत में कोचिंग उद्योग के तीव्र विकास की तुलना बोतलबंद पानी के व्यापार से की जा सकती है. जिस तरह लोग नल के पानी की गुणवत्ता पर अविश्वास के कारण बोतलबंद पानी खरीदते हैं, ठीक उसी तरह मुख्यधारा की स्कूली और कॉलेज शिक्षा की असफलताओं के कारण अभिभावक अपने बच्चों को निजी कोचिंग में भेजने के लिए विवश हैं. राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (2025) के आँकड़े दर्शाते हैं कि 27% स्कूली बच्चे तथा सीनियर सेकेंडरी स्तर पर 37% छात्र निजी ट्यूशन का सहारा ले रहे हैं.
इसके विपरीत, 'असर' (एएसईआर) 2024 की रिपोर्ट सरकारी शिक्षा के गिरते स्तर का खुलासा करती है, जहाँ कक्षा 5 के केवल 44.8% छात्र ही कक्षा-2 का पाठ पढ़ने में सक्षम थे और एक-तिहाई से कम बच्चे बुनियादी गणित का भाग हल कर पाते थे. एक तरफ बुनियादी शिक्षा की यह दयनीय स्थिति है, वहीं दूसरी तरफ केवल परीक्षा पास कराने पर केंद्रित एक अत्यधिक परिष्कृत कोचिंग उद्योग खड़ा हो गया है.
शिक्षा प्रणाली का यह संकट 'डमी स्कूलों' के रूप में स्पष्ट दिखाई देता है. छात्र औपचारिक रूप से स्कूलों में दाखिला लेते हैं, लेकिन अपना सारा समय जेईई और नीट जैसी परीक्षाओं की कोचिंग में बिताते हैं. स्कूल महज कागजी खानापूर्ति बनकर रह गए हैं और कोचिंग संस्थान अध्ययन के मुख्य केंद्र बन चुके हैं. यहाँ छात्र 8 से 15 घंटे की कड़ी तैयारी के बावजूद मौलिक और व्यावहारिक ज्ञान (जैसे जीव विज्ञान का प्रैक्टिकल) में पिछड़ जाते हैं. यहाँ शिक्षा का स्थान केवल परीक्षा पास करने की रणनीतियों और शॉर्टकट ने ले लिया है.
अभाव का संकट और चयन की अंधी दौड़
कोचिंग के बढ़ते प्रभाव के पीछे सबसे बड़ा कारण 'अभाव' है. उदाहरण के लिए, जेईई मुख्य में 16 लाख से अधिक उम्मीदवार बैठते हैं, जबकि आईआईटी जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं में बेहद सीमित सीटें उपलब्ध हैं. मेडिकल और सरकारी नौकरियों में भी यही स्थिति है. जब सीमित अवसरों के लिए लाखों अभ्यर्थी प्रतिस्पर्धा करते हैं, तो परीक्षा ज्ञान का परीक्षण न होकर केवल अभ्यर्थियों को छांटने का जरिया बन जाती है. इस प्रतिस्पर्धी कतार में आगे बढ़ने के लिए परिवार अत्यधिक धन, समय और ऊर्जा बर्बाद करते हैं, जबकि इससे समाज में कुल अवसरों की संख्या नहीं बढ़ती.
परीक्षाओं की निष्पक्षता और मूल्यांकन की खामियाँ
लाखों छात्रों के मूल्यांकन के लिए बहुविकल्पीय प्रश्नों (एमसीक्यूज़) पर आधारित मानकीकृत परीक्षण प्रणाली अपनाई जाती है. यद्यपि यह व्यवस्था वस्तुनिष्ठ और त्वरित होती है, परंतु यह वास्तविक शिक्षण के स्थान पर केवल 'पैटर्न पहचान' और विकल्पों को हटाने की कला को बढ़ावा देती है. इसके अलावा, परीक्षा की शुचिता भंग होने या पेपर लीक होने जैसी घटनाएँ छात्रों के विश्वास को पूरी तरह से तोड़ देती हैं. राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 ने रटंत प्रणाली और उच्च-जोखिम वाली परीक्षाओं के बजाय वैचारिक समझ पर जोर दिया था, परंतु अवसरों की कमी के कारण स्थितियाँ वैसी ही बनी हुई हैं.
अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य और दीर्घकालिक समाधान
जापान और दक्षिण कोरिया जैसे विकसित देशों में मजबूत स्कूली शिक्षा के बावजूद प्रतियोगी कोचिंग का प्रचलन है, जो विशिष्ट संस्थानों की अंधी दौड़ का परिणाम है. दूसरी ओर, फिनलैंड और जर्मनी जैसे देश राष्ट्रीय परीक्षणों का दबाव कम करके व्यावसायिक तथा तकनीकी शिक्षा के कई रास्ते प्रदान करते हैं, जिससे छात्रों को सम्मानजनक अवसर मिलते हैं.
भारत में वास्तविक सुधार के लिए ये कदम उठाने आवश्यक हैं: सरकारी स्कूलों और विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता तथा क्षमता में व्यापक विस्तार किया जाए, परीक्षाओं को केवल कोचिंग-आधारित रटंत प्रणाली के बजाय वास्तविक वैचारिक ज्ञान और समझ परखने योग्य बनाया जाए, व्यावसायिक और तकनीकी शिक्षा को सामाजिक प्रतिष्ठा प्रदान की जाए और केवल कुछ सरकारी या प्रतिष्ठित सीटों पर निर्भरता खत्म करने के लिए व्यापक और सुरक्षित रोजगार के नए अवसर पैदा किए जाएं.
कुलमिलाकर डिजिटल बुनियादी ढांचे के माध्यम से मुफ्त कोचिंग प्रदान करना एक अस्थायी सुधारात्मक कदम हो सकता है. परंतु स्थायी समाधान केवल तब संभव है जब शिक्षा और रोजगार प्रणाली को इतना सुदृढ़ बनाया जाए कि परिवारों को निजी कोचिंग का सहारा ही न लेना पड़े. बोतलबंद पानी को सस्ता करने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह सुनिश्चित करना है कि नल का पानी पूरी तरह से पीने योग्य और भरोसेमंद हो.
(रानाडे प्रख्यात अर्थशास्त्री हैं. यह ‘द ट्रिब्यून’ में प्रकाशित उनके लेख का हिंदी में अनुदित सारांश है.)

