‘आप’ के दो चेहरे: दिल्ली में सेंसरशिप के खिलाफ चिल्लाती है, पंजाब में मीडिया का दमन करती है
‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ ने लिखा है कि आम आदमी पार्टी ने पंजाब में पत्रकारों को चुप कराने का एक नया तरीका खोज निकाला है—कॉपीराइट कानून! इसने राज्य सरकार की आलोचना करने वाले फेसबुक पेजों और पोस्टों को हटाने के लिए बौद्धिक संपदा (आईपी) के दावों का इस्तेमाल किया है. उनका दावा है कि वे पत्रकार नहीं हैं क्योंकि उनके पास पत्रकारिता की डिग्री नहीं है.
दिल्ली में 'आप' सेंसरशिप का रोना रोती है, लेकिन पंजाब में वह वही पुराना रवैया अपना रही है. पार्टी ने ऐसी सामग्री पर भी अपने कॉपीराइट का दावा किया है जो उसकी अपनी भी नहीं है—जिसमें श्री अकाल तख्त की प्रेस विज्ञप्तियां, राज्य विधानसभा की तस्वीरें और एआई छवियां शामिल हैं.
‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ में शिवनारायण राजपुरोहित की यह रिपोर्ट पंजाब में आम आदमी पार्टी सरकार द्वारा स्वतंत्र पत्रकारों और स्थानीय डिजिटल समाचार प्लेटफॉर्मों के विरुद्ध डिजिटल सेंसरशिप और कॉपीराइट स्ट्राइक के उपयोग की विस्तृत पड़ताल प्रस्तुत करती है. दिल्ली में प्रेस की स्वतंत्रता और डिजिटल सेंसरशिप का विरोध करने वाली 'आप' पर पंजाब में आलोचकों की आवाज दबाने के लिए बौद्धिक संपदा अधिकारों का सहारा लेने का गंभीर आरोप लगा है.
राजपुरोहित की रिपोर्ट का सारांश कहता है कि अक्टूबर से अप्रैल 2026 के बीच पंजाब की सत्तारूढ़ पार्टी ने पत्रकारों द्वारा अपलोड की गई कम से कम 48 वीडियो और पोस्ट पर कॉपीराइट स्वामित्व का दावा ठोका. इसके परिणामस्वरूप कुल 30 लाख से अधिक फॉलोअर्स वाले पांच प्रमुख फेसबुक पेजों—आरएमबी टेलीविजन, लोक आवाज टीवी, मनिंदरजीत सिद्धू, रतनदीप सिंह धालीवाल और परमीत सिंह बिडोवाली—को हटा दिया गया.
'आप' ने जिन सामग्रियों पर कॉपीराइट का दावा किया, उनमें श्री अकाल तख्त साहिब की प्रेस विज्ञप्तियां, विपक्षी विधायकों की तस्वीरें, मुख्यमंत्री भगवंत मान की पुरानी पोस्ट, एआई-जनरेटेड छवियां, विधानसभा कार्यवाही के विजुअल्स और सरकारी अधिसूचनाएं शामिल थीं. इनमें से अधिकांश सामग्री पर पार्टी का कोई कानूनी मालिकाना हक नहीं था.
'द रिपोर्टर्स कलेक्टिव' द्वारा मेटा से सवाल किए जाने के बाद कंपनी ने माना कि पेजों और सामग्रियों को "गलती से" हटाया गया था. जून 2026 में पांच में से चार पेजों को बहाल कर दिया गया, जबकि 'मनिंदरजीत सिद्धू' का पेज पंजाब पुलिस के कानूनी नोटिस के कारण ब्लॉक रहा.
मनिंदरजीत सिंह सिद्धू (लोक आवाज टीवी एंड मनिंदरजीत सिद्धू): फरीदकोट से संचालित इन पेजों पर 'आप' ने कम से कम 20 कॉपीराइट स्ट्राइक दर्ज कराए. विधानसभा में विरोध प्रदर्शन की तस्वीरों और बठिंडा में किसानों पर पुलिस कार्रवाई से जुड़े वीडियो पोस्ट करने पर पुलिस नोटिस के माध्यम से पेज हटवाए गए.
रतनदीप सिंह धालीवाल: 19 कॉपीराइट स्ट्राइक मिलने के बाद 2.7 फरवरी को इनका 3.24 लाख फॉलोअर्स वाला पेज बंद हुआ. अकाल तख्त की एक साधारण प्रेस विज्ञप्ति (जिसमें कोई फोटो भी नहीं थी) पर भी 'आप' ने फोटो कॉपीराइट का दावा ठोका था. इसके अतिरिक्त, आप विधायकों के आगामी चुनावों में टिकट कटने की रिपोर्टिंग करने पर उनके खिलाफ पुलिस जांच शुरू कराई गई.
परमीत सिंह बिडोवाली (पंजाब इनसाइड टीवी): इनके पेज पर अकाल तख्त की विज्ञप्तियों और भगवंत मान के रीट्वीट को शेयर करने पर स्ट्राइक भेजी गई. अब कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए वे मान या अन्य नेताओं के चेहरों को काला करके या एआई स्केच का उपयोग करके समाचार प्रसारित कर रहे हैं.
जस ग्रेवाल (आरएमबी टेलीविजन): 14 लाख फॉलोअर्स वाले इस पेज को 2022 की एक पुरानी चुनावी सूची पोस्ट करने पर मिली स्ट्राइक के कारण हटाया गया था.
राजनीतिक विरोधाभास और सरकारी रुख
दिल्ली में 'आप' संयोजक अरविंद केजरीवाल अक्सर केंद्र सरकार पर मीडिया नियंत्रण और "गोदी मीडिया" बनाने का आरोप लगाते हैं. हालाँकि, पंजाब के स्थानीय पत्रकारों का कहना है कि राज्य में स्थिति और भी विकट है, जहाँ आलोचनात्मक आवाज उठाने पर सीधा दमन किया जाता है.
दूसरी ओर, आप-पंजाब के मीडिया प्रभारी बलतेज पन्नू ने इन कार्यवाहियों का बचाव करते हुए दावा किया कि जिन लोगों के पेज हटाए गए हैं, वे "पत्रकार नहीं हैं" क्योंकि उनके पास औपचारिक डिग्रियां नहीं हैं. हालाँकि, भारतीय कानून में पत्रकारिता के लिए किसी औपचारिक डिग्री की बाध्यता नहीं है, और पड़ताल में पाया गया कि प्रभावित तीन पत्रकारों के पास पत्रकारिता की डिग्रियां उपलब्ध थीं.
कॉपीराइट कानून के दुरुपयोग पर कानूनी व तकनीकी पहलू
फेयर यूज़ का उल्लंघन: 1957 के भारतीय कॉपीराइट अधिनियम की धारा 52 के तहत, समकालीन घटनाओं की रिपोर्टिंग, समीक्षा और जनहित की आलोचना के लिए सरकारी सामग्री या सार्वजनिक बयानों का उपयोग कॉपीराइट का उल्लंघन नहीं माना जाता. कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, किसी मुख्यमंत्री या जनप्रतिनिधि के ट्वीट को टिप्पणी के साथ शेयर करना 'फेयर यूज़' के दायरे में आता है.
स्वचालित सिस्टम और प्लेटफॉर्म्स की लाचारी: डिजिटल अधिकार विशेषज्ञों (जैसे निखिल पाहवा और एसएफएलसी) के अनुसार, सूचना प्रौद्योगिकी नियम 2021 के तहत कानूनी देयता से बचने के लिए मेटा और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म शिकायत मिलते ही बिना गहन जांच के सामग्री हटा देते हैं. यह पहली बार है जब किसी राजनीतिक दल द्वारा इस पैमाने पर सेंसरशिप के हथियार के रूप में कॉपीराइट स्ट्राइक का इस्तेमाल किया गया है.
अंकुश और पेजों को हटाए जाने के कारण डिजिटल मीडिया आउटलेट्स को भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा है, क्योंकि उनकी आय का आधा हिस्सा फेसबुक से आता था. इसके विरोध में 'चंडीगढ़ प्रेस क्लब' ने बार-बार विज्ञप्तियां जारी कीं और राज्यपाल को ज्ञापन सौंपा. पत्रकारों ने 'प्रेस दी आजादी बहाल करो संघर्ष कमेटी' का गठन कर राज्यभर में कई विरोध प्रदर्शन आयोजित किए हैं और उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है.
यह मामला दर्शाता है कि कैसे डिजिटल युग में बौद्धिक संपदा कानूनों और प्लेटफॉर्म्स की स्वचालित नीतियों का दुरुपयोग करके सत्ता में बैठे दल स्वतंत्र पत्रकारिता को दबाने और अपनी आलोचना को मिटाने का नया तरीका अपना रहे हैं.

