आसिम अली | परिवर्तन की घड़ी

"जो बंगाल आज सोचता है, भारत वह कल सोचेगा" — गोपाल कृष्ण गोखले के इस ऐतिहासिक कथन का सहारा लेकर बंगाली समाज लंबे समय से खुद को भारतीय राष्ट्रवाद का अग्रदूत मानता रहा है. हालांकि, वर्तमान समय में यह 'बंगाली विशिष्टता' फीकी पड़ती दिख रही है. पश्चिम बंगाल अब उसी हिंदुत्ववादी आधुनिकता की राह पर अग्रसर है, जिसके लक्षण सड़कों पर बुलडोजर, स्कूलों में 'वंदे मातरम' और बीफ पर प्रतिबंध जैसे कदमों में दिखाई देते हैं.

‘द टेलीग्राफ’ में आसिम अली लिखते हैं कि पिछले एक दशक में पूर्वी भारत (बंगाल, ओडिशा, असम और पूर्वोत्तर) में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नाटकीय उभार ने इस धारणा को ध्वस्त कर दिया है कि हिंदू राष्ट्रवाद केवल 'हिंदी पट्टी' तक सीमित है. इस विस्तार ने साबित किया है कि हिंदुत्व का मॉडल किसी विशेष सांस्कृतिक बनावट, आर्य समाज जैसी विरासत या मुगल काल के इतिहास की पृष्ठभूमि पर निर्भर नहीं है. यह उत्तर प्रदेश की तरह बंगाल में भी उतना ही प्रभावी हो चुका है. वास्तव में, हिंदू राष्ट्रवाद का यह उदय देश भर की राजनीतिक अर्थव्यवस्था में आए संरचनात्मक बदलावों और उससे उपजे 'राजनीतिक आधिपत्य के संकट' का एक व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करता है.

बंगाल में भाजपा के इस वैचारिक मॉडल को समाजशास्त्री पियरे बोर्दियू की 'रूढ़िवादी क्रांति' की अवधारणा से समझा जा सकता है. इसके तहत व्यवस्था में एक ऐसा आमूलचूल बदलाव दिखाया जाता है, जिससे ऊपर से तो सब कुछ बदला हुआ नजर आता है, लेकिन पृष्ठभूमि में पुराना ढांचा वैसा ही सुरक्षित रहता है. असम और ओडिशा के अनुभवों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि बंगाल में भी भाजपा वहां के पुराने संस्थागत और आर्थिक आधार को छेड़े बिना, केवल एक आक्रामक और तीव्र वैचारिक परिवर्तन को आगे बढ़ाएगी. इस प्रक्रिया को समझने के लिए बंगाल के वर्तमान राजनीतिक संकट और अर्थव्यवस्था के अंतर्संबंधों को देखना जरूरी है.

नवउदारवादी काल में बंगाल के भीतर एक 'दोहरी अर्थव्यवस्था' मजबूत हुई है. राज्य में एक विशाल अनौपचारिक अर्थव्यवस्था सक्रिय है, जो कुल आर्थिक उत्पादन का लगभग आधा हिस्सा बनाती है और गैर-कृषि क्षेत्र के 90% श्रमिकों को रोजगार देती है. 1990 के दशक के बाद हुए तीव्र शहरीकरण से रियल-स्टेट, निर्माण, परिवहन, सड़क-ठेकेदारी और रेत-खनन जैसे 'उच्च-किराया' वाले संदिग्ध उद्योगों का तेजी से विकास हुआ.  इन क्षेत्रों से निकलने वाले भारी मुनाफे और 'संरक्षण-क्लाइंट संबंधों' के जाल ने सभी राजनीतिक दलों के स्थानीय कैडर और नेताओं को वित्तीय व सांगठनिक शक्ति दी है.

टीएमसी के 15 वर्षों के शासन के बाद इसी आर्थिक पृष्ठभूमि से आधिपत्य का संकट पैदा हुआ. इसके परिणामस्वरूप दो गुटों में अंतर्विरोध बढ़ गया: पहला, अनौपचारिक क्षेत्र से जुड़ा प्रांतीय व्यापारिक वर्ग. दूसरा, राष्ट्रीय कॉर्पोरेट पूंजी और पेशेवर मध्यम वर्ग.

शिक्षाविदों (ज़ाद महमूद और सोहम भट्टाचार्य) के अनुसार, टीएमसी का लोकलुभावन शासन एक 'ऊपर-से-नीचे' वाले सामाजिक गठबंधन पर आधारित था. इसके शीर्ष पर गैर-ब्राह्मण अगड़ी जातियों या हाशिए के (सबॉल्टर्न) पृष्ठभूमि के राजनीतिक उद्यमी थे, जो कल्याणकारी योजनाओं के जरिए गरीबों और महिलाओं के बड़े वोट बैंक को संभालते थे. इस नए संभ्रांत वर्ग को 'गैर-आधिपत्यवादी व्यापारिक वर्ग' कहा गया, क्योंकि वाम मोर्चा के पुराने 'भद्रलोक' के विपरीत, इस वर्ग के पास समाज को देने के लिए कोई व्यापक सांस्कृतिक या नैतिक नेतृत्व नहीं था.

भाजपा ने चालाकी से 'भ्रष्टाचार' और 'रुकी हुई विकास परियोजनाओं' के नैरेटिव के जरिए पेशेवर मध्यम वर्ग और बड़े कॉर्पोरेट दिग्गजों को अपने पाले में कर लिया. इसके साथ ही, हिंदुत्व की राजनीति ने बंगाली 'भद्रलोक' को बंगाली हिंदू संप्रभुता के अग्रदूत के रूप में स्थापित करने का वादा किया—ठीक वैसे ही जैसे असम में अहोमियों और ओडिशा में ब्राह्मण-करण विशिष्ट वर्ग के सांस्कृतिक प्रभुत्व को पुनर्जीवित किया गया था.

जाति और वर्ग के अंतर्विरोधों को खारिज करके केवल एक एकीकृत 'हिंदू राजनीतिक विषय' को सामने रखकर भाजपा ने एंटोनियो ग्राम्शी के संदर्भ में 'आधिपत्यवादी नेतृत्व' हासिल किया है, जहां एक विशिष्ट वर्ग अपने विचारों को पूरे समाज का विचार बना देता है.

दिलचस्प बात यह है कि भद्रलोक को नैतिक नेतृत्व सौंपने के बाद भी नई व्यवस्था टीएमसी से विरासत में मिले पुराने संरक्षण नेटवर्क (सिंडिकेट आदि) को बनाए रखेगी. इसका सबसे बड़ा उदाहरण सुवेंदु अधिकारी का मुख्यमंत्री के रूप में उभरना है (जो भाजपा में आने से पहले कई घोटालों में नामजद थे). यह ठीक असम में हिमंत बिस्वा सरमा के प्रयोग जैसा है, जो पुरानी व्यवस्था के वित्तीय संचय तंत्र को चलाने में माहिर हैं.

वर्तमान संकट का दूसरा पहलू पारंपरिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व का पतन है, जो अब केवल 'राजनीतिक दलाली' बनकर रह गया है. हिंदुत्व ने इसका समाधान एक करिश्माई नेता और एकीकृत हिंदू समाज के सीधे जुड़ाव में खोजा है. इसके विपरीत, टीएमसी जैसा क्षेत्रीय दल एक सुसंगत उप-राष्ट्रीय (बंगाली) पहचान खड़ी करने में विफल रहा. टीएमसी का गठबंधन अलग-अलग स्वार्थों (व्यापारिक वर्ग, अल्पसंख्यक, लाभार्थी समूह) पर टिका था, जिन्हें वह एक साझा वैचारिक सूत्र में नहीं पिरो सकी. दार्शनिक अर्नेस्टो लाक्लाउ के शब्दों में, टीएमसी 'समानता की श्रृंखला' बनाने में असमर्थ रही. उदाहरण के लिए, उसने मुस्लिम समुदाय को उनके वर्ग आधारित शोषण के बजाय केवल धार्मिक पहचान के आधार पर जोड़ा.

इसके विपरीत, भाजपा ने विभिन्न हाशिए के समूहों की मांगों (जैसे नमशूद्रों के लिए नागरिकता, राजवंशियों के लिए स्वायत्तता) को 'मुस्लिम विरोधी' मोर्चे के तहत एकजुट कर एक मजबूत 'समानता की श्रृंखला' बना दी है. इसके अलावा, भाजपा ग्राम्शी द्वारा प्रतिपादित विचारधारा की 'भौतिकता' को समझती है. वह अपनी विचारधारा को कानूनों, नागरिक प्रक्रियाओं और प्रशासनिक दिनचर्या में शामिल करना जानती है, जैसा कि असम में 'बांग्लादेशी मुस्लिम अप्रवासी' की श्रेणी बनाकर संसाधनों और नागरिकता के अधिकारों को नियंत्रित करने में किया गया.

इस प्रकार, आधिपत्य के इस संकट का हिंदू राष्ट्रवादी समाधान आर्थिक ढांचे को बदलने में नहीं, बल्कि जन-सहमति के ढांचे को नए सिरे से गढ़ने में है. सब कुछ बदलने के दिखावे के बीच पुराने आर्थिक और सामाजिक विशेषाधिकारों को सुरक्षित रखना ही बंगाल के इस 'परिवर्तन' और 'रूढ़िवादी क्रांति' का वास्तविक सार है.

(आसिम अली एक राजनीतिक शोधकर्ता और स्तंभकार हैं. हमने यहां उनके लंबे लेख के हिंदी में अनुदित संपादित अंश प्रस्तुत किए हैं)

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