पूर्व नौकरशाहों और पर्यावरणविदों ने सीजेआई की टिप्पणियों पर आपत्ति जताई, पक्षपात का लगाया आरोप

अखिल भारतीय और केंद्रीय सेवाओं के पूर्व लोक सेवकों के एक समूह ने गुजरात में पीपावाव बंदरगाह विस्तार परियोजना के लिए पर्यावरणीय मंजूरी से जुड़ी एक सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत द्वारा की गई टिप्पणियों पर गहरी चिंता व्यक्त की है.

जितेंद्र चौबे के अनुसार, पूर्व नौकरशाहों के संगठन 'कॉन्स्टिट्यूशनल कंडक्ट ग्रुप' ने 71 लोगों द्वारा हस्ताक्षरित एक पत्र जारी किया है, जिसमें कहा गया है कि मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणियाँ पूर्वाग्रह और पक्षपात को दर्शाती हैं, जो कि चिंताजनक है.

यह टिप्पणियाँ 26 नवंबर, 2025 को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) (पश्चिमी क्षेत्र) के उस आदेश के खिलाफ अपील के दौरान की गईं, जिसमें पीपावाव बंदरगाह विस्तार परियोजना के लिए पर्यावरणीय और तटीय विनियमन क्षेत्र (सीआरजेड) की मंजूरियों को बरकरार रखा गया था.

यद्यपि मुख्य न्यायाधीश ने संकेत दिया कि सुप्रीम कोर्ट एनजीटी के आदेश में हस्तक्षेप करने का इच्छुक नहीं है, लेकिन उन्होंने पर्यावरण संबंधी याचिकाकर्ताओं पर अपमानजनक टिप्पणी करते हुए कहा, “हमें भारत में कोई एक ऐसी परियोजना दिखाइए जहाँ पर्यावरण कार्यकर्ता कहें कि हम इस परियोजना का स्वागत करते हैं; देश अच्छी प्रगति कर रहा है, हम इस परियोजना का स्वागत करते हैं.”

सेवानिवृत्त नौकरशाहों का तर्क है कि इस तरह की टिप्पणियाँ नागरिकों के भीतर डर पैदा करती हैं और उन्हें चुप कराती हैं. अपने पत्र में उन्होंने चिंता व्यक्त की कि ये मौखिक टिप्पणियाँ, भले ही औपचारिक (लिखित) न हों, बड़े पैमाने पर मीडिया में रिपोर्ट की जा सकती हैं और ऐसे निर्णयों को प्रभावित कर सकती हैं जो देश में पर्यावरण और संरक्षण के सुरक्षा उपायों को कमजोर करते हैं. साथ ही, यह निचली अदालतों को भी इसी तरह का रवैया अपनाने के लिए प्रभावित कर सकती हैं.

अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस के अवसर पर, प्रमुख पर्यावरणविदों और जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं ने भी मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर उनसे उन नागरिकों के बारे में की गई अपनी अपमानजनक टिप्पणियों को वापस लेने का आग्रह किया, जो पर्यावरण से जुड़े मुकदमों के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं.

दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में कर्नाटक, ओडिशा, उत्तराखंड, हरियाणा और राजस्थान सहित विभिन्न राज्यों के पर्यावरणविदों और कार्यकर्ताओं ने भारत के प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) को लेकर अपनी गंभीर चिंताएं व्यक्त कीं. उन्होंने देश भर के नागरिकों और नागरिक समाज (सिविल सोसाइटी) समूहों की ओर से मुख्य न्यायाधीश को एक पत्र सौंपा, जिसमें अदालत में उनकी हालिया मौखिक टिप्पणियों के संबंध में गंभीर चिंताएं व्यक्त की गई थीं.

बैंगलोर के 'यूनाइटेड कंजर्वेशन मूवमेंट' के प्रबंध न्यासी (मैनेजिंग ट्रस्टी) जोसेफ हूवर ने कहा, "भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणियों ने हमें गहरी पीड़ा पहुँचाई है."

ओडिशा के प्रसिद्ध पर्यावरण कार्यकर्ता और ग्रीन नोबेल पुरस्कार विजेता प्रफुल्ल सामंतरा ने टिप्पणी की, "हम वैधता को खत्म करने (गंभीरता कम करने) के साधन के रूप में 'पर्यावरणविद्' शब्द के इस तरह लापरवाही से किए जाने वाले इस्तेमाल पर कड़ी आपत्ति जताते हैं."

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